Thursday, 29 March 2012

एक गीत-मुल्क हमारा रब ही सिर्फ़ चलाता है

चित्र गूगल से साभार 
मुल्क हमारा रब ही सिर्फ़ चलाता है 
राजा 
करता वही 
उसे जो भाता है |
कवि 
कविता लिखता 
जनगीत न  गाता है |

राजधर्म के 
सब दरवाजे 
बन्द मिले ,
सरहद के 
भीतर कसाब -
जयचन्द मिले ,
बन्दी 
पृथ्वीराज 
सिर्फ़ पछताता है |

गोदामों 
के बाहर 
गेहूँ सड़ता है ,
नेता 
रोज तिलस्मी 
भाषण पढ़ता है ,
कर्ज
चुकाने में 
किसान मर जाता है |

उनकी 
दूरंतो 
अपनी नौचन्दी है ,
संसद से 
मत सच 
कहना पाबन्दी है ,
संविधान 
बस अपना 
भाग्यविधाता है |

पौरुष है 
लड़ने का पर 
हथियार नहीं है ,
सिर पर 
पगड़ीवाला 
अब सरदार नहीं है ,
मुल्क 
हमारा रब ही 
सिर्फ़ चलाता है |
[मेरी यह कविता आज [31-03-2012 ] अमर उजाला काम्पैक्ट में प्रकाशित है सिर्फ़ इलाहाबाद संस्करण के आलावा|साभार अमर उजाला | ]

Saturday, 3 March 2012

एक गीत होली -रँग -गुलालों वाला मौसम

पेन्टिंग -गूगल से साभार 
सभी ब्लॉगर मित्रों और पाठकों को होली की शुभकामनाएँ 
रंग -गुलालों वाला मौसम 
रंग -गुलालों-
वाला मौसम 
कोई मेरा गाल छू गया |
खुली चोंच से 
जैसे कोई पंछी 
मीठा ताल छू गया |

दूर हुई 
तनहाई मन की 
हम भी खिलने लगे फूल से ,
हुए डहेलिया 
और मोगरे कल तक 
थे जो दिन बबूल से ,
एक हवा का 
झोंका आया 
मुझे रेशमी बाल छू गया |

जाने क्या 
हो गया चैत में 
लगी देह परछाई बोने ,
पीले हाथ 
लजाती ऑंखें 
भरे दही गुड़ पत्तल -दोने ,
सागर 
खोया था लहरों में 
एक अपरिचित पाल छू गया |

छन्द प्रेम के 
रंग भींगते 
एक गीत के माने कितने ,
इस मौसम में 
लिखना मुश्किल 
हैं गोकुल ,बरसाने कितने ,
होरी गाना 
मैं भी भूला 
जाने कब करताल छू गया |

हुआ साँवला 
रंग सुनहरा 
देह कटार ,नयन में सपने ,
कामरूप का 
जादू -टोना 
इस मौसम में सब हैं अपने ,
कविता को 
वनलता सेन का 
हरा -भरा बंगाल छू गया |
चित्र -गूगल से साभार 
[वनलता से बांग्ला की चर्चित कवयित्री हैं ]

Tuesday, 28 February 2012

एक कविता -लोकभाषा में -देखा पंचो आँख खोलि के गाँव -शहर फगुनाइल बा

चित्र -गूगल से साभार 
एक कविता लोकभाषा में -
देखा पंचो आँख खोलि के गाँव -शहर फगुनाइल बा 
अमवैं के जिन दोष मढ़ा 
मनवां सबकर बौउराइल बा |
देखा पंचो आँख खोलि के 
गाँव -शहर फगुनाइल बा |

हँसी -ठिठोली ,बिरहा -चैता 
ढोलक ,झांज ,मजीरा हउवै,
चिलम ,तमाखू ,भाँग ओसारे 
बोलत केहू जोगीरा हउवै .
जेके कहै मोहल्ला सांवर 
ओहू क रंग सोन्हाइल बा |

लाज -शरम सब भूलि गईल बा 
होली कै मदहोशी देखा ,
देवर भउजी के पटकत बा 
भईया कै ख़ामोशी देखा ,
बुढऊ दादा कै गुस्सा भी 
फागुन में नरमाइल बा |

मिश्राइन -मिश्रा कै जोड़ी 
इतर लगा के महकत हउवै,
आसमान से बदरी गायब 
मद्धिम सूरज टहकत हउवै,
मौसम के अदलाबदली से 
नदियौ कुछ गरमाइल बा |

कई वियाह मुहल्ला में हौ 
रोज नउनिया आवत हउवै,
उपरहिता के काटि चिकोटी 
हँसि -हँसि नाच नचावत हउवै,
पत्रा भूलल, पोथी भूलल 
मंतर कई भुलाइल बा |

टाट -भात हौ मेल -जोल हौ 
पाहुन -परजा न्यौता हउवै ,
एक हाथ में पान सोपारी 
दूसरे हाथ सरौता हउवै,
लोकरंग उत्सव कै सपना 
सबके आंख समाइल बा |
चित्र -गूगल से साभार 
[यह मेरी पुरानी कविता है जिसमें कुछ सुधार किया गया है एक भोजपुरी कवि गोष्ठी के लिए लिखी गयी थी |मैं लोकभाषा में लिख तो सकता हूँ लेकिन लिखता नहीं |यहाँ इस कविता को आप तक पहुँचाने का उद्देश्य मात्र मनोरंजन है और विलुप्त होती परम्पराओं की जानकारी देना मात्र है |हमारे शहरी मित्रों को इसे समझने में कठिनाई होगी ,फिर भी आपका स्नेह  अपेक्षित है ]

Sunday, 26 February 2012

एक गीत -फूल देकर गया कोई

चित्र -गूगल से साभार 
फूल देकर गया कोई चाय देने के बहाने 
आम के 
नन्हें टिकोरे 
हो गए कितने सयाने |
झील ,पर्वत ,
घाटियाँ सब 
हो गए इनके ठिकाने |

कसमसाकर 
खुले जूड़े ,हरे -
वन ,सिवान महके ,
गांछ पर 
सोये पलाशों के 
हृदय प्रेमाग्नि दहके ,
फूल देकर 
गया कोई 
चाय देने के बहाने |

एक चिड़िया 
सुबह दरपन को 
निहारे ,चोंच मारे ,
मौसमों के 
रंग बदले 
और चढ़ने लगे पारे ,
पेड़ के 
कोटर बहेलिए 
आ गए तोते चुराने |

अजनबी ने 
पता पूछा 
हम उसी के हो गए ,
गाँव की 
जानी हुई 
पगडंडियों में खो गए ,
दिन अबोले 
कनखियों से 
लगे  फिर हमको बुलाने |
चित्र -गूगल से साभार 

Friday, 10 February 2012

साक्षात्कार : कवि /आलोचक डॉ० प्रेमशंकर से हिन्दी नवगीत पर बातचीत

कवि /आलोचक डॉ० प्रेमशंकर 
सम्पर्क -09455004790
परिचय -
वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी पूर्ण कालीन अध्यक्ष के पद को सुशोभित कर रहे डॉ० प्रेम शंकर हिन्दी नवगीत विधा के अप्रतिम कवि हैं |डॉ० प्रेम शंकर न केवल कवि हैं बल्कि हिन्दी के उद्भट विद्वान और महत्वपूर्ण लेखक हैं |नवगीत लेखन में जब यह कवि प्रेम को अभिव्यक्त करता है तो नितांत ताजे बिम्बों प्रतीकों से कविता का एक अप्रतिम रूप हमारे सामने आता है |शहरी भाव बोध से लेकर ग्रामीण अंचल की खूबसूरती इनकी कविताओं की विशेषता है |डॉ० प्रेम शंकर कविता के भाव ,शिल्प ,समकालीन सोच के साथ नए -प्रतीकों और प्रयोगों के साथ एक सधे हुए कुम्हार की तरह कविता के घड़े को सुघर बनाते हैं |डॉ० प्रेम शंकर की कविता बेडरूम से निकलकर उनकी कल्पना की सहचरी नहीं बनती बल्कि उनके जीवन के व्यापक अनुभव और दृष्टिकोण से छनकर ताजा खिली धूप बनकर हरियाली के उपर फ़ैल जाती है |यह धूप कभी जाड़े की गुनगुनी होती है तो कभी वैशाख की दोपहरी जैसी कड़क होती है |हिन्दी के इस महान कवि विचारक का जन्म अपनी विश्वसनीयता के लिए प्रसिद्ध तालों के शहर, मशहूर शायर शहरयार और गोपाल दास नीरज के शहर अलीगढ़ में 01-11-1943 को हुआ था |शिक्षा -डॉ० प्रेम शंकर ने प्रथम श्रेणी में हिन्दी में स्नातकोत्तर उपाधि हासिल कर प्रयोगवाद और व्यक्तिवाद पर एम० फ़िल० और आधुनिक हिन्दी कविता में व्यक्तिवाद पर पी० एच० डी० की उपाधि हासिल किया |इन्हें धर्मरत्न की उपाधि सन 1955में प्रदान की गयी |पुस्तकें और प्रकाशन -हिन्दी और उसकी उपभाषाएं,नयी गन्ध [नवगीत संग्रह ],दलितों का चीखता आभाव [कविता संकलन ]अपनी शताब्दी से उपेक्षित [कविता संकलन ]कविता रोटी की भूख तक [कविता संकलन ]इसके अतिरिक्त भी कई शोध पत्र और पुस्तकें इनके द्वारा सम्पादित की गयीं हैं |कई महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित कर चुके डॉ० प्रेम शंकर लाल बहादुर राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी मसूरी में प्रोफेसर एवं समन्वयक [हिन्दी एवं प्रादेशिक भाषाएं ]भी रह चुके हैं |डॉ० प्रेमशंकर का विस्तृत परिचय उनके ब्लॉग पर देखा जा सकता है   http://drpremshanker.blogspot.com/|स्वभाव से विनम्र और मृदुभाषी डॉ० प्रेम शंकर जी से हिन्दी नवगीत के कुछ विन्दुओं पर की गयी बातचीत यहाँ प्रस्तुत है -


हिन्दी  के सुपरिचित  नवगीतकार, कवि, आलोचक एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी  अध्यक्ष  डा0 प्रेमशंकर से हिन्दी नवगीत पर  जयकृष्ण राय तुषार की बातचीतः-

प्र0-  डा0 प्रेमशंकर जी हिन्दी में नवगीत का उद्भव किन कारणों से हुआ और हिन्दी  नवगीत  अपने उद्देश्य में कहाँ तक सफल रहा ?
उ0      स्वतंत्रता के उपरान्त जीवन-मूल्यों के बदलाव के कारण युवा पीढ़ी मोह-भंग से आक्रान्त हो रही थी। हिन्दी साहित्य अपनी दिशा तलाश रहा था। हिन्दी कविता की ऐसी ही स्थिति थी। प्रणय सम्बंधी गीतों और स्वतन्त्रता के गीतों के उपरान्त गीत एक नयी दिशा अन्वेषित कर रहा था । सन 1958 में श्री राजेन्द्रप्रसाद सिंह के अंकन के द्वारा नवगीत को अभिहित किया गया। यद्यपि, नवगीत जैसे अनेक गीत इससे पूर्व भी लिखे जा रहे थे, तथापि नवगीत अपने नव युगबोध, नयी रोमानियत एवं नये भावबोध को लेकर विकसित हुआ। आज इस दृष्टि से देखा जाये तो नवगीत पूर्ण सफल है, प्रयोगवाद  एवं नयी कविता के छन्दमुक्त नीरस वातावरण से ऊब कर लय और छन्द की बेजोड़ जुगलबन्दी ने उस समय के युवावर्ग को नवगीत के लिए प्रेरित कर दिया। यही नवगीत की सफलता का रहस्य है।

प्र0 -    हिन्दी गीत के बासीपन और अतिशय प्रेमालाप की जड़ता को तोड़ने में नवगीत सफल रहा है। आम आदमी गीत का विषय बना, जीवन की विसंगतियाँ गीत का विषय बनी, परन्तु आप हिन्दी नवगीत की उपेक्षित स्थिति को जानते हैं अब नये नवगीतकार लगभग नहीं आ रहे हैं। क्या यह नवगीत का प्रस्थान-विन्दु है?
उ0      हाँ ! यह ठीक है कि गीत के बासीपन और स्थूल प्रेमालाप की भोगवादी जड़ता को तोड़कर नयी रोमानियत दी। इसमें नवगीतकार नायिका का सौंन्दर्य-चित्रण दूर से विविध प्रकार से कर रहा है। यहाँ हालावादियों की तरह स्थिति नहीं है | नायिका को रीतिकालीन स्थूल भोगवाद से नहीं जोड़ा। यह सत्य है कि पिछले कई दशको से नवगीत को कविता, कहानी, नाटक की भाँति महत्व न देकर केवल हाशिए पर रखने का प्रयास ही होता रहा है। हमारे समय में एक गोष्ठियों में आठ-दस नवगीतकार होते थे। परन्तु अब नवगीतकारों को अन्वेषित करना पड़ता है। यद्यपि, यह नवगीत का प्रस्थान-बिन्दु नहीं है, तथापि आज पत्र-पत्रिकाओं में नवगीत बहुतायत में प्रकाशित हो रहे हैं। जनमानस का मन नये गीतों की तरफ नया रूझान पैदा कर रहा है। यह नवगीत के लिए सुखद स्थिति है।

प्र0-  नवगीत को मंचीय कवियों के छल-छद्म और पलायन से नुकसान पहुँचाया गया है परन्तु आज हिन्दी नवगीत की आलोचना विकसित नहीं हो सकी है। इस संदर्भ में क्या प्रयास होने चाहिए?
उ0- नवगीत ने अनेक विरोध सहे हैं जैसे,- मंचीय कवियों का छल-छदम और पलायन, छन्दमुक्त कविता के लगभग चालीस काव्य आन्दोलन, अगीत एवं हिन्दी में ग़जल की घुसपैठ आदि। आज नवगीत पुनः आलोचकों की दृष्टि को लुभा रहा है। इसका कारण है अब नवगीत नये ‘रूप’ और ‘कान्टेण्ट’ में युगबोध और भावबोध को व्यक्त कर रहा है। यही इसका निष्कंटक मार्ग है। 

 प्र0- आप कविता और राजनीति दोनों में कागजी लेखन में जन और जन-सम्बंधों की बातें करते हैं, किन्तु वास्तविक धरातल पर दोनों ही आम आदमी से बहुत दूर होते जा रहे हैं। ऐसा क्यों?
उ0-    आज मानवीय जीवन में गति, व्यस्तता, परिस्थिति, विसंगति, अनुभूति आदि के कारण  कवि, नवगीतकार एंव लेखक आम आदमी से दूर विदेशी दर्शन से प्रभावित होकर लिख रहे हैं।

प्र0-  हिन्दी नवगीत में हिन्दी गीत/नवगीत में तुकान्त के कारण हम बंध जाते हैं तुकान्त का हिन्दी गीत नवगीत में क्या महत्व है?
उ0-    गेय रचनाओं में तुकान्त एवं लय महत्वपूर्ण है। छन्द और अलंकार उनके बहुत उपयोगी अंग है जिन पर गीत/नवगीत नयी-नयी धुनी और लय गुंजायमान होता है। हिन्दी गीतकार और नवगीतकार अपनी अनुभूतियों को मीठे बताशे की तरह अपनी अनुभूतियों में घोलकर अभिव्यक्ति के माध्यम से प्रस्तुत करता है। तब तुक, लय, छन्द विविध रूपों में श्रोता और पाठक को आकर्षित करते हैं।
प्र0-   आज हिन्दी नवगीत में समानान्तर दोहे और ग़जलें लिखी और सराही जा रही हैं क्या इससे नवगीत को कोई नुकसान की संभावना है?
उ0-    ऐतिहासिक साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाय तो दिल्ली के मुगलिया तलवारों में फारसी की ग़जलों के साथ-साथ सवैया की धूम भी मची थी। आज भी हिन्दी में सवैया का अपना स्थान है। उसी प्रकार नवगीत को दोहे और ग़जल से कोई हानि नहीं है, अपितु नवगीत और स्थापित हो रहा है।

प्र0-   आप उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष हैं भविष्य में लेखकों कवियों और साहित्य के संदर्भ में आपके मन में क्या है? 
उ0-    सरकारी योजनाओं में मन नहीं चलता है। जो सरकारी होता है उसमें योजनाबद्ध रूप से समय और वित्त की उपलब्धता देखी जाती है यह  अत्यन्त आवश्यक है। मेरी लेखकों, कवियों, और साहित्य की प्रति पूर्ण आस्था है वे मानवीय गरिमा को सुरक्षित रखते हुए दिशा- निर्देश करने वाला साहित्य रचते रहेंगें और राष्ट्र को आगे बढ़ाने में योगदान देगें। मुझे पूर्ण विश्वास है। 

Friday, 3 February 2012

एक गज़ल -किताबों में दबे फूलों का मुरझाना लिखा जाए

चित्र -गूगल से साभार 
किताबों में दबे फूलों का मुरझाना लिखा जाए 
तुझे जलती हुई लौ ,मुझको परवाना लिखा जाए 
ये दिल कहता है इक अच्छा सा अफ़साना लिखा जाए .


तेरी तस्वीर मेरे मुल्क हर जानिब से है अच्छी 
तुझे कश्मीर ,शिमला या कि हरियाना लिखा जाए .


अदब की अंजुमन में अब न श्रोता हैं ,न दर्शक हैं 
गज़ल किसके लिए ,किसके लिए गाना लिखा जाए .


जो शायर मुफ़लिसों की तंग गलियों से नहीं गुजरा 
वो कहता है गज़ल में जाम -ओ -पैमाना लिखा जाए .


ये दरिया ,झील ,पर्वत ,वादियों को छोड़कर आओ 
किताबों में दबे फूलों का मुरझाना लिखा जाए .


मुझे बदनामियों का डर है ,तुमसे कुछ नहीं कहता 
शहर को छोडकर जाऊँ तो दीवाना लिखा जाए .


बहुत सच बोलकर मैं हो गया तनहा जमाने में 
किसे अपना करीबी किसको बेगाना लिखा जाए .


बदलते दौर में शहजादियों का जिक्र मत करना 
किसी मजदूर की बेटी को  सुल्ताना लिखा जाए .


शहर का हाल अब अच्छा नहीं लगता हमें यारों 
अब अपनी डायरी में कुछ तो रोजाना लिखा जाए .
चित्र -गूगल से साभार 

Friday, 27 January 2012

एक गीत -हो गया अपना इलाहाबाद, पेरिस ,अबू धाबी


चित्र -गूगल से साभार 
बसन्त पर्व पर मंगलकामनाओं के साथ -
एक गीत -हो गया अपना इलाहाबाद, पेरिस,अबू धाबी 
शरद में  
ठिठुरा हुआ मौसम 
लगा होने गुलाबी  |
हो गया 
अपना इलाहाबाद 
पेरिस ,अबू धाबी  |

देह से 
उतरे गुलाबी -
कत्थई ,नीले पुलोवर ,
गुनगुनाने लगे 
घंटों तक 
घरों के बन्द शावर ,
लाँन में 
आराम कुर्सी पर 
हुए ये दिन किताबी |

घोंसलों से 
निकल आये 
पाँव से चलने लगे ,
ये परिन्दे 
झील ,खेतों में 
हमें मिलने लगे ,
चुग नहीं 
पाते अभी दानें 
यही इनकी खराबी |

स्वप्न देखें 
फागुनी -
ऑंखें गुलालों के ,
लौट आये  ,
दिन मोहब्बत 
के रिसालों के ,
डाकिये 
फिर खोलकर 
पढ़ने लगे हैं खत जबाबी |

खनखनाती 
चूड़ियाँ जैसे 
बजें संतूर ,
सहचरी को 
कनखियों से 
देखते मजदूर 
सुबह 
नरगिस, दोपहर 
लगने लगी परवीन बाबी |
चित्र -गूगल से साभार 

Wednesday, 25 January 2012

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर -एक देश गान

चित्र -गूगल से साभार 
गणतन्त्र दिवस की पूर्व संध्या पर 
जब तक न प्रलय हो धरती पर  
जब तक सूरज पवमान रहे |
जनगण मन और तिरंगे की 
आभा में हिन्दुस्तान रहे |

चरणों में हिन्द महासागर 
सीने में यमुना -गंगा हो ,
बाँहों में सतलज ,ब्रह्मपुत्र 
मन में कश्मीर ,कलिंगा हो ,
मथुरा ,गोकुल ,वृन्दावन में 
मुरली की मोहक तान रहे |

गिरिजाघर में माँ मरियम हों 
गुरुग्रंथ रहे गुरुद्वारों में ,
हो बिहू ,भांगड़ा कुचिपुड़ी 
हर मौसम में त्योहारों में ,
तेरे मन्दिर गीता ,मानस 
हर मस्जिद में कुरआन रहे |

हम भगत सिंह के वंशज हैं 
ईमान हमारा बना रहे ,
बापू के सत्य अहिंसा का भी 
छत्र शीश पर तना रहे ,
जब कभी देश पर संकट हो 
पहले मेरा बलिदान रहे |

उत्तर से दक्षिण ,पूरब से -
पश्चिम फैली हरियाली हो ,
भुखमरी ,गरीबी हटो दूर !
हर हाथ शहद की प्याली हो ,
भारत माँ तेरी मिटटी का 
हर इक तिनका बलवान रहे |,
चित्र -गूगल से साभार 

Sunday, 27 November 2011

एक गीत -खुली किताबों में

चित्र -गूगल से साभार 
 चलो मुश्किलों का हल ढूँढें खुली किताबों में 
बीत रहे हैं 
दिन सतरंगी 
केवल  ख़्वाबों में |
चलो मुश्किलों 
का हल ढूँढें 
खुली  किताबों में |

इन्हीं किताबों में 
जन- गण -मन 
तुलसी की चौपाई ,
इनमें ग़ालिब -
मीर ,निराला 
रहते हैं परसाई ,
इनके भीतर 
जो खुशबू वो 
नहीं  गुलाबों में |

इसमें कई 
विधा के गेंदें  -
गुड़हल खिलते हैं ,
बंजर  मन  
को इच्छाओं  के  
मौसम मिलते हैं |
लैम्पपोस्ट में 
पढ़िए या फिर 
दफ़्तर, ढाबों में |

तनहाई से 
हमें किताबें 
दूर भगाती हैं ,
ज्ञान अगर 
खुद सो जाए 
तो उसे जगाती हैं ,
इनमें  जो 
परवाज़ ,कहाँ 
होती सुर्खाबों में ?

इनको पढ़कर 
कई घराने 
गीत सुनाते हैं ,
इनकी  जिल्दों में 
जीवन के रंग 
समाते हैं ,
ये न्याय सदन ,
संसद के सारे 
प्रश्न -जबाबों में |


चित्र -गूगल से साभार 
[इलाहाबाद में विगत दिनों पुस्तक मेले में भ्रमण के दौरान मन में यह विचार आया कि क्यों न पुस्तकों के संदर्भ में कोई कविता /गीत लिखा जाए |यह गीत इसी विचार की देन है |पुस्तकें वास्तव में हमें रास्ता दिखाती हैं ,ये अन्धेरे में जलती हुई मशाल होती हैं |हमारी सही मायने में दोस्त होती हैं |पुस्तकें वक्त का आईना होती हैं |हम कवि /लेखक इनके बिना अपने अस्तित्व की कल्पना ही नहीं कर सकते हैं |]

Thursday, 24 November 2011

एक गीत -प्रकृति का हर रंग माँ पहचानती है

चित्र -गूगल से साभार 
प्रकृति का हर रंग माँ पहचानती है 
शीत का मौसम 
ठिठुरती काँपती है |
बड़े होने तक -
हमें माँ ढांपती  है |

हरा है स्वेटर मगर 
मैरून  बुनती है ,
नज़र धुँधली है मगर 
माँ  कहाँ सुनती है ,
कभी कंधे तो  -
कभी कद नापती है |

रात -दिन बिखरा हुआ 
माँ घर सजाती है ,
बाद्य यंत्रों के बिना 
निर्गुण सुनाती है ,
पढ़ नहीं सकती 
कथाएं बाँचती है |

जानती रस्में -
प्रथाएं जानती है ,
प्रकृति का हर रंग 
माँ पहचानती है ,
सीढियाँ चढ़ते -
उतरते हाँफती है |


पिता कम्बल और 
हम हैं शाल ओढ़े ,
भाग्य में उसके 
अँगीठी और मोढ़े ,
माँ हमारा मन 
परखती -जाँचती है |

एक चिड़िया की तरह 
माँ घोंसला बुनती ,
वह हमारा सुर सुगम -
संगीत सा सुनती ,
उत्सवों में संग 
बहू के नाचती है |
चित्र -गूगल से साभार 

एक पुरानी ग़ज़ल -पत्रा में लग्न खूब थे

  चित्र साभार गूगल  एक पुरानी ग़ज़ल - पत्रा में लग्न खूब थे  सूखे में कहीं बाढ़ में फसलें थी धान की  फिर भी अमीन लाये हैं नोटिस लगान की  पत्रा ...