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| चित्र -गूगल से साभार |
एक कविता लोकभाषा में -
देखा पंचो आँख खोलि के गाँव -शहर फगुनाइल बा
अमवैं के जिन दोष मढ़ा
मनवां सबकर बौउराइल बा |
देखा पंचो आँख खोलि के
गाँव -शहर फगुनाइल बा |
हँसी -ठिठोली ,बिरहा -चैता
ढोलक ,झांज ,मजीरा हउवै,
चिलम ,तमाखू ,भाँग ओसारे
बोलत केहू जोगीरा हउवै .
जेके कहै मोहल्ला सांवर
ओहू क रंग सोन्हाइल बा |
लाज -शरम सब भूलि गईल बा
होली कै मदहोशी देखा ,
देवर भउजी के पटकत बा
भईया कै ख़ामोशी देखा ,
बुढऊ दादा कै गुस्सा भी
फागुन में नरमाइल बा |
मिश्राइन -मिश्रा कै जोड़ी
इतर लगा के महकत हउवै,
आसमान से बदरी गायब
मद्धिम सूरज टहकत हउवै,
मौसम के अदलाबदली से
नदियौ कुछ गरमाइल बा |
कई वियाह मुहल्ला में हौ
रोज नउनिया आवत हउवै,
उपरहिता के काटि चिकोटी
हँसि -हँसि नाच नचावत हउवै,
पत्रा भूलल, पोथी भूलल
मंतर कई भुलाइल बा |
टाट -भात हौ मेल -जोल हौ
पाहुन -परजा न्यौता हउवै ,
एक हाथ में पान सोपारी
दूसरे हाथ सरौता हउवै,
लोकरंग उत्सव कै सपना
सबके आंख समाइल बा |
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| चित्र -गूगल से साभार |
[यह मेरी पुरानी कविता है जिसमें कुछ सुधार किया गया है एक भोजपुरी कवि गोष्ठी के लिए लिखी गयी थी |मैं लोकभाषा में लिख तो सकता हूँ लेकिन लिखता नहीं |यहाँ इस कविता को आप तक पहुँचाने का उद्देश्य मात्र मनोरंजन है और विलुप्त होती परम्पराओं की जानकारी देना मात्र है |हमारे शहरी मित्रों को इसे समझने में कठिनाई होगी ,फिर भी आपका स्नेह अपेक्षित है ]

