Saturday, 13 February 2021

एक ग़ज़ल-ये गंगा माँ निमन्त्रण के बिना सबको बुलाती है

 


चित्र -साभार गूगल 


एक ग़ज़ल-

हमारी आस्था चिड़ियों को भी दाना खिलाती है


गले में क्रॉस पहने है मगर चन्दन लगाती है

सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है


ये नाटक था यहाँ तक आ गए कैसे ये मायावी

सुपर्णखा बनके जैसे राम को जोगन रिझाती है


कोई बजरे पे कोई रेत में धँसकर नहाता है

ये गंगा माँ निमन्त्रण के बिना सबको बुलाती है


सनातन संस्कृति कितनी निराली और पुरानी है

हमारी आस्था चिड़ियों को भी दाना खिलाती है


खिलौने आ गए बाजार से लेकिन हुनर का क्या

मेरी बेटी कहाँ अब शौक से गुड़िया बनाती है


वो राजा क्या बनेगा अश्व की टापों से डरता है

उसे दासी महल में शेर का किस्सा सुनाती है


ये हाथों की सफ़ाई है इसे जादू भी कहते हैं

नज़र से देखने वालों को यह अन्धा बनाती है


खिले हैं फूल जब तक तितलियों से बात मत करना

जरूरत पेड़ से गिरते हुए पत्ते उठाती है


कवि/शायर जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल


कवि /शायर जयकृष्ण राय तुषार

Thursday, 11 February 2021

एक ग़ज़ल-आज के दुष्यन्त को सब स्मरण हो जाएगा

 

चित्र साभार गूगल

एक ग़ज़ल-

स्वर्ग सा इस देश का वातावरण हो जाएगा


छल, कपट,और लोभ का यदि संवरण हो जाएगा

स्वर्ग सा इस देश का वातावरण हो जाएगा


प्रकृति का सौंदर्य कम कर आपने सोचा कभी

बाँध से नदियों के जल का अपहरण हो जाएगा


पंचवटियों में नया सोने का मृग फिर भेजकर

वह बहुत खुश था कि फिर सीताहरण हो जाएगा


तोतली भाषा है बच्चे की अभी मत टोकिए

कल यही  पाणिनि का सुन्दर व्याकरण हो जाएगा


आप अब तक पढ़ रहे दुष्यन्त का "साये में धूप"

कल हमारा शेर सबका उद्धरण हो जाएगा


झील,पर्वत,वन,नदी,बादल की पूजा कीजिए

फिर से धरती का सुखद वातावरण हो जाएगा


अब न राजा,ऋषि, न अँगूठी न शाकुन्तल वही

आज के दुष्यन्त को सब स्मरण हो जाएगा


जब कभी आतंक असुरों का बढ़ेगा देखना

राम या तो कृष्ण का फिर अवतरण हो जाएगा


आप पश्चिम के ही दर्शन में अगर डूबे रहे

वेद,गीता,उपनिषद का विस्मरण हो जाएगा


आप मानेंगे अगर अपने बुजुर्गों की सलाह

आपकी भी बात का कल अनुसरण हो जाएगा


कवि/शायर जयकृष्ण राय तुषार

चित्र -साभार गूगल 


Monday, 8 February 2021

एक प्रेमगीत-झुकी नज़रें गुलमोहर ,मुस्कान वाले दिन

 

चित्र-साभार गूगल

एक प्रेमगीत-

चिट्ठियाँ पढ़ते हुए सुनसान वाले दिन


झुकीं नज़रें

गुलमोहर

मुस्कान वाले दिन ।

याद हैं

अब भी 

मुलेठी पान वाले दिन।


पुस्तकों के

बीच में

तस्वीर रखकर देखना,

राह चलते

आदमी पर

एक कंकड़ फेंकना,

चिट्ठियाँ

पढ़ते हुए

सुनसान वाले दिन ।


आईने को

देखकर

हँसना स्वगत रोना,

मेज पर ही

सिर टिकाकर

देर तक सोना,

याद हैं

सहगल,रफ़ी

अनजान वाले दिन ।


टूटते तारे

हवा में

चाँदनी रातें,

बिना बोले

खिड़कियाँ

करती रहीं बातें,

माँ की

चिन्ताएं, नज़र

लोबान वाले दिन ।

कवि-जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल


एक ग़ज़ल-माँ का वह चूल्हा-धुँआ हर शाम होना चाहिए

 

चित्र साभार गूगल

एक ग़ज़ल-

माँ का वह चूल्हा-धुँआ हर शाम होना चाहिए


इश्क़ के आगाज़ का अंजाम होना चाहिए 

हर बड़े शायर को कुछ बदनाम होना चाहिए


शायरी में इश्क़ ,खुशबू,हुस्न की बातें थीं कल

अब ग़ज़ल में कुछ सबक,पैग़ाम होना चाहिए


बाद मरने के, लबों पर हैं निराला और मज़ाज

कुछ तो जिंदा शायरों पे काम होना चाहिए


प्रेम भी जीवन का दर्शन है मगर इक शर्त पर

इसमें राधा,गोपियाँ,इक श्याम होना चाहिए


हर किले में दर्ज है शाहों,महाराजों के नाम

दर्ज तो कारीगरों का नाम होना चाहिए


घी, नमक,रोटी खिला देती थी अक्सर प्यार से

माँ का वह चूल्हा,धुँआ, हर शाम होना चाहिए


कैक्टस,गमले हरेक घर में,कटे पुरखों के पेड़

वन में कुछ हो, बाग़ में तो आम होना चाहिए

कवि /शायर जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल


कवि/ शायर 

जयकृष्ण राय तुषार

Sunday, 7 February 2021

एक गीत-नदियों में कंचन मृग सुबहें वो शाम कहाँ

 

बुरांस

एक गीत-

नदियों में कंचन मृग सुबहें वो शाम कहाँ


नदियों में

कंचन मृग 

सुबहें वो शाम कहाँ ?

धुन्ध की

किताबों में

सूरज का नाम कहाँ ?


दुःख की

छायाएं हैं

पेड़ों के आस-पास,

फूल,गंध

बासी है

शहरों का मन उदास,

सिर थामे

बैठा दिन

ढूंढेगा बाम कहाँ ?


अल्मोड़ा

कौसानी

हाँफती मसूरी है,

प्यार भरा

रिश्ता भी

प्रकृति से जरूरी है,

पंचवटी में

आये फिर

जटायु,राम कहाँ ?


शिलाखण्ड

टूट रहे

अनगिन विस्फोटों से,

हिमगिरि

के मुखमण्डल

भरे हुए चोटों से,

इन बुरांस

फूलों  का दर्द 

पढ़े पाम कहाँ ? 


कवि जयकृष्ण राय तुषार

सभी चित्र साभार गूगल



Saturday, 6 February 2021

देवगंगा हो हमारी या तुम्हारी नर्मदा हो

 

काशी गंगा घाट

एक गीत-

देवगंगा हो हमारी या तुम्हारी नर्मदा हो


देव गंगा हो 

हमारी या

तुम्हारी नर्मदा हो ।

घाट पर

उत्सव मनाती

संस्कृति यह सर्वदा हो ।


कुम्भ ,छठ हो

या चतुर्थी

चौथ का जलता दिया हो,

पुण्य सबको

मिले चाहे

पत्र का वह हाशिया हो,

अमावस्या

पंचमी का 

चाँद हो या प्रतिपदा हो ।


सदानीरा को

बचाना है 

भगीरथ प्यार से,

स्वच्छता की

शपथ लें हम

आज ही हरिद्वार से,

उसे क्यों

धूमिल करें

जो देवकुल की सम्पदा हो।


रहे काशी

या त्रिवेणी

या होशंगाबाद हो,

हमें लौकिक

और वैदिक

मन्त्र तो कुछ याद हो,

विश्व का

मंगल करें

नदियाँ न कोई आपदा हो।

कवि-जयकृष्ण राय तुषार


सभी चित्र साभार गूगल




Saturday, 30 January 2021

एक ग़ज़ल -आकाशवाणी को समर्पित एक ग़ज़ल -रेडियो भी तो परिंदो सी उड़ानों में रही

आकाशवाणी इलाहाबाद के वर्तमान
और कुछ सेवानिवृत्त अधिकारी 


एक ग़ज़ल -आकाशवाणी को समर्पित एक ग़ज़ल -

रेडियो भी तो परिंदो सी उड़ानों में रही  


नज़्म में ,गीत में ,गज़लों में फ़सानों में रही 

रेडियो भी तो परिंदो सी उड़ानों में रही 


इसके परिधान का हर रंग लुभाता है हमें 

बांसुरी ,तबला ये करताल ,पियानों में रही 


इसके होठों पे हरेक भाषा ,विभाषा ,बोली 

ज्ञान- विज्ञान ,कला सारे घरानों में रही 


चुलबुली ,शोख ,हसीना ये पुजारिन भी यही 

औरतों ,बच्चों ,बुजुर्गों में ,जवानों में रही 


जंग की बात हो ,सरहद हो या मौसम की ख़बर 

खेल में,मेलों में ,बाज़ार,दुकानों में रही 


सबकी उम्मीद है ये सबका भरोसा भी यही 

डाक्टर बनके ये रोगी के ठिकानों में रही 


लेखकों ,कवियों ,कलाकारों की महफ़िल है यही

सात सुर, जादुई बंदिश लिए कानों में रही 


कहकहे ,रंग भी अभिनय के, निराले इसके 

बनके निर्गुण ,कभी बिरहा ये किसानों में रही 


कवि /शायर  -जयकृष्ण राय तुषार 

चित्र -साभार गूगल 

चित्र -साभार गूगल रेडियो 

Friday, 29 January 2021

एक ग़ज़ल-मैंने जो दी है किताबें उन्हें सादा रखना

 

चित्र साभार गूगल

एक ग़ज़ल-

मैंने जो दी है किताबें उन्हें सादा रखना


ख़्वाब मत देखना,और मुझको दिखाना भी नहीं

खुल गयी आँख मेरी नींद अब आना भी नहीं


मैंने जो दी है किताबें उन्हें सादा रखना

मोर के पंख ,कोई फूल सजाना भी नहीं


आँख में कितना है पानी जरा देखूँ उसके

मेरे आने की ख़बर उसको बताना भी नहीं


दिल भी शीशे सा कई टुकड़ों में बिखरा हैं कहीं

अब गले मिलना नहीं हाथ दबाना भी नहीं


बेटियों उड़ती रहो  तेज परिंदो की तरह

कितनी मुश्किल हो ये रफ़्तार घटाना भी नहीं


कवि/शायर जयकृष्ण राय तुषार

चित्र -साभार गूगल 


Monday, 25 January 2021

एक ग़ज़ल देश के नाम -कहीं से लौट के आऊँ तुझी से प्यार रहे

 

तिरंगा -जय हिन्द जय भारत वन्देमातरम 
गणतन्त्र  की पूर्व  पर संध्या पर  देशवासियों   

को जयहिंद और शुभकमनाएं 

एक ग़ज़ल देश के नाम -

कहीं से लौट के आऊँ तुझी से प्यार रहे 


हवा ,ये फूल ,ये खुशबू ,यही गुबार रहे 

कहीं से लौट के आऊँ तुझी से प्यार रहे 


मैं जब भी जन्म लूँ गंगा तुम्हारी गोद रहे 

यही तिरंगा ,हिमालय ये हरसिंगार रहे 


बचूँ तो इसके मुकुट का मैं मोरपंख बनूँ 

मरूँ  तो नाम शहीदों में ये शुमार रहे 


ये मुल्क ख़्वाब से सुंदर है जन्नतों से बड़ा 

यहाँ पे संत ,सिद्ध और दशावतार रहे 


मैं जब भी देखूँ लिपट जाऊँ पाँव को छू लूँ 

ये माँ का कर्ज़ है चुकता न हो उधार रहे 


भगत ,आज़ाद औ बिस्मिल ,सुभाष भी थे यहीं 

जो इन्क़लाब लिखे सब इन्हीं के यार रहे 


आज़ादी पेड़ हरा है ये मौसमों से कहो 

न सूख पाएँ परिंदो को एतबार रहे 


तमाम रंग नज़ारे ये बाँकपन ये शाम 

सुबह के फूल पे कुछ धूप कुछ 'तुषार 'रहे 


कवि /शायर -जयकृष्ण राय तुषार 

चित्र -साभार गूगल 

चित्र -साभार गूगल -भारत के लोकरंग 


Sunday, 24 January 2021

एक ग़ज़ल -उसकी शोहरत ने कभी शाख पे रहने न दिया

 

चित्र -साभार गूगल 

एक ग़ज़ल -

उसकी शोहरत ने कभी शाख पे रहने न दिया 


उसकी शोहरत ने कभी शाख पे रहने न दिया 

फूल को कुछ कभी हालात ने कहने न दिया 


प्यास पी जाती है दरिया  क्या ,समुंदर भी सुना 

बाँध ने स्वर्ग की गंगा को भी बहने न दिया 


ख़ुदकुशी करना बुरी बात उसे भी था पता 

पर किसी बात ने जिंदा उसे रहने न दिया 


अबकी बरसात ने कोशिश की गिराने की बहुत 

सिर्फ़ इक पेड़ ने  दीवार को  ढहने न दिया 


भूलती है कहाँ उस रात की किस्सागोई 

उसने कुछ भी न कहा, मुझको भी कहने न दिया 


कवि /शायर -जयकृष्ण राय तुषार 

चित्र -साभार गूगल 

एक गीत -मोगरे का फूल जूड़े में

  चित्र साभार गूगल  एक गीत -मोगरे का फूल जूड़े में  मोगरे का फूल  जूड़े में  सजाती है.  नदी  हँसकर  ज़िन्दगी का गीत गाती है. धूप -छाँही  सफऱ मे...