Friday, 29 January 2021

एक ग़ज़ल-मैंने जो दी है किताबें उन्हें सादा रखना

 

चित्र साभार गूगल

एक ग़ज़ल-

मैंने जो दी है किताबें उन्हें सादा रखना


ख़्वाब मत देखना,और मुझको दिखाना भी नहीं

खुल गयी आँख मेरी नींद अब आना भी नहीं


मैंने जो दी है किताबें उन्हें सादा रखना

मोर के पंख ,कोई फूल सजाना भी नहीं


आँख में कितना है पानी जरा देखूँ उसके

मेरे आने की ख़बर उसको बताना भी नहीं


दिल भी शीशे सा कई टुकड़ों में बिखरा हैं कहीं

अब गले मिलना नहीं हाथ दबाना भी नहीं


बेटियों उड़ती रहो  तेज परिंदो की तरह

कितनी मुश्किल हो ये रफ़्तार घटाना भी नहीं


कवि/शायर जयकृष्ण राय तुषार

चित्र -साभार गूगल 


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