Sunday, 21 February 2021

एक गीत-नीड़ तो मैं टहनियों पर ही बनाऊँगा

 

चित्र साभार गूगल

एक गीत-नीड़ तो मैं टहनियों पर ही बनाऊँगा


नीड़ तो मैं

टहनियों पर

ही बनाऊँगा ।

गीत

लेकिन सिर्फ़

माटी के सुनाऊँगा ।


हम परिंदे

आग और

तूफ़ान से खेले,

बाज के

पंजे

हवा के बीच में झेले,

वक्त की

हर चोट पर

मरहम लगाऊँगा ।


छाँह मिलनी

चाहिए

रेतों, पठारों को,

चाहिए

कितना हरापन

हरसिंगारों को,

देखना

मैं धूप को

दरपन दिखाऊँगा ।


युगों से

भटका हुआ

मन चाँद-तारों में,

है असल

संजीवनी

चीड़ों-चिनारों में,

स्वप्न में 

परियाँ नहीं

तुमको बुलाऊँगा ।

कवि जयकृष्ण राय तुषार


चित्र साभार गूगल



कवि जयकृष्ण राय तुषार

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