Friday, 26 February 2021

एक ग़ज़ल -मोहब्बत भी नशा इसको न मजबूरी बना लेना

 

चित्र -साभार गूगल 

एक ग़ज़ल -

मोहब्बत भी नशा इसको न मजबूरी बना लेना

मोहब्बत भी नशा इसको न मजबूरी बना लेना  

अँगीठी तेज हो जाए तो कुछ दूरी बना लेना 


तुम्हारे साथ मिलकर मैं यमन का राग गाऊँगा 

अभी से शाम का मंज़र ये सिंदूरी बना लेना 


तवे की रोटियों का स्वाद ढाबों में नहीं मिलता 

मगर जब भूख हो  रोटी को तन्दूरी बना लेना 


ये जंगल ,आग ,बारिश ,धूप ,आँधी से है बाबस्ता 

यहाँ जब सैर करना खुद को कस्तूरी बना लेना 


जिसे मैं ख़्वाब में देखा उसे वैसा ही रहने दो 

तुम अपने चित्र में इस दौर की नूरी बना लेना 


नशे की  बोतलों को अलमारी में सजाना मत 

जरूरी हो तो अपने लब को अंगूरी बना लेना 


समन्दर की तहों में यदि तुम्हें भी शोध करना है 

समन्दर के किनारों से अभी दूरी बना लेना 

जयकृष्ण राय तुषार 


चित्र -साभार गूगल 




17 comments:

  1. किस शेर की तारीफ़ करूँ..समझ नहीं आया..लाजवाब ग़ज़ल..शब्द और लय दोनों की निरंतरता की बेजोड़ अभिव्यक्ति..मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है..

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    1. हार्दिक आभार आपका ।सादर अभिवादन

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    2. बहुत खूब । अंगूरी बना लेना ज़बरदस्त है ।

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  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (२७-०२-२०२१) को 'नर हो न निराश करो मन को' (चर्चा अंक- ३९९०) पर भी होगी।

    आप भी सादर आमंत्रित है।
    --
    अनीता सैनी

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  3. बहुत सुंदर रचना

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  4. बहुत सुंदर

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  5. "मोहब्बत भी नशा इसको न मजबूरी बना लेना

    अँगीठी तेज हो जाए तो कुछ दूरी बना लेना"

    क्या बात है !बहुत खूब,सादर नमन आपको

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  6. बहुत शानदार गजल
    वाह

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    1. हार्दिक आभार आदरणीय |सादर प्रणाम

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  7. वाह अभिनव प्रयोग ।
    सुंदर सृजन।

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