Monday, 11 February 2013

एक गीत -यह जरा सी बात पूरे शहर को खलने लगी है

चित्र -गूगल से साभार 
एक गीत -यह जरा सी बात 
फिर गुलाबी 
धूप -तीखे 
मोड़ पर मिलने लगी है |
यह 
जरा सी बात पूरे 
शहर को खलने लगी है |

रेशमी 
जूड़े बिखर कर 
गाल पर सोने लगे हैं ,
गुनगुने 
जल एड़ियों को 
रगड़कर धोने लगे हैं ,
बिना माचिस 
के प्रणय की 
आग फिर जलने लगी है |

खेत में 
पीताम्बरा सरसों 
तितलियों को बुलाये ,
फूल पर 
बैठा हुआ भौंरा 
रफ़ी के गीत गाये ,
सुबह -
उठकर, हलद -
चन्दन देह पर मलने लगी है |

हवा में 
हर फूल की 
खुशबू इतर सी लग रही है ,
मिलन में 
बाधा अबोली 
खिलखिलाकर जग रही है ,
विवश होकर 
डायरी पर 
फिर कलम चलने लगी है |

कुछ हुआ है 
ख़्वाब दिन में 
ही हमें आने लगे हैं ,
पेड़ पर 
बैठे परिन्दे 
जोर से गाने लगे हैं ,
सुरमई 
सी शाम 
अब कुछ देर से ढलने लगी है |
चित्र -गूगल से साभार 

Sunday, 27 January 2013

आधुनिक सिनेमा और उर्दू शायरी के कबीर पद्मश्री निदा फ़ाज़ली और उनकी दो ग़ज़लें

सम्पर्क -09869487139
भारत सरकार द्वारा मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली को गणतन्त्र दिवस के मौके पर पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया जाना केवल निदा फ़ाज़ली का सम्मान नहीं वरन यह भारतीय संस्कृति ,हमारी गंगा -जमुनी तहजीब को भी सम्मान मिला है |निदा फ़ाज़ली आधुनिक उर्दू शायरी के कबीर हैं | निदा फ़ाज़ली चाहे अदब हो या सिनेमा शायरी को कभी हल्का नहीं होने देते हैं |निदा साहब भाषा की सहजता के भी कायल हैं |हम सभी कलमकार उनको पद्मश्री दिए जाने पर उन्हें सलाम और प्रणाम करते हैं |उनका परिचय हमारे सुनहरी कलम से ब्लॉग पर मौजूद है |हम उनके सम्मान स्वरूप उनकी दो चर्चित ग़ज़लें आपके साथ साझा कर रहे हैं |  

पद्मश्री निदा फ़ाज़ली जी की दो ग़ज़लें -

एक [पाकिस्तान से लौटकर लिखी गई ग़ज़ल ]
इन्सान तो हैवान यहाँ भी है वहां भी 
अल्लाह निगहबान यहाँ भी है वहां भी 

खूंख्वार दरिन्दों के फ़क़त नाम अलग हैं 
शहरों में बयाबान यहाँ भी है वहां भी 

रहमान की कुदरत हो या भगवान की मूरत 
हर खेल का मैदान यहाँ भी है वहां भी 

हिन्दू भी मज़े में हैं मुसलमाँ भी मज़े में 
इन्सान परेशान यहाँ भी है वहां भी 

उठता है दिलो-जां से धुआं दोनों तरफ़ ही 
ये मीर 'का दीवान यहाँ भी है वहां भी 
दो 
सफ़र में धूप तो होगी ,जो चल सको तो चलो 
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो 

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता 
मुझे गिरा के अगर तुम संभल सको तो चलो 

हर इक सफ़र को है महफूज़ रास्तों की तलाश 
हिफ़ाज़तों की रिवायत बदल सको तो चलो 

यही है ज़िन्दगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें 
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो 

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं 
तुम अपने आपको खुद ही बदल सको तो चलो 

Wednesday, 16 January 2013

एक गीत -फिर नया दिनमान आया

चित्र -गूगल से साभार 
एक गीत -फिर नया दिनमान आया 
पर्वतों का 
माथ छूकर 
टहनियों का 
हाथ छूकर 
फिर नया दिनमान आया |
नया संवत्सर 
हमारे घर 
नया मेहमान आया |

सूर्यमुखियों के 
खिले चेहरे 
हमें भी दिख रहे हैं ,
कुछ नई 
उम्मीद वाले 
गीत हम भी लिख रहे हैं ,
ज़ेहन में 
भुला हुआ फिर से 
कोई उपमान आया |

पेड़ पर 
ऊंघते परिन्दे 
जाग कर उड़ने लगे हैं ,
नए मांझे 
फिर पतंगों की
तरफ बढ़ने लगे हैं ,
घना कोहरा 
चीरकर मन में 
नया  अरमान  आया |

नई किरणों 
से नई आशा 
नई उम्मीद जागे ,
पत्तियों के 
साथ ताज़े फूल 
गूँथे नए धागे ,
खुशबुओं का 
शाल ओढ़े 
फिर नया पवमान आया |

खूंटियों पर 
टंगे कैलेन्डर 
हवा में झूलते हैं ,
हम इन्हीं 
को देखकर 
बीता हुआ कल भूलते हैं ,
चलो मिलकर 
पियें काफ़ी 
किचन से फ़रमान आया |
[यह गीत दिनांक 28-01-2013 को दैनिक जागरण के सप्तरंग पुनर्नवा साहित्यिक पृष्ठ पर प्रकाशित हो गया है |हम सम्पादक व सुप्रसिद्ध कथाकार राजेन्द्र राव जी के विशेष आभारी हैं ]
चित्र -गूगल से साभार 

Friday, 21 December 2012

एक गीत नववर्ष के आगमन पर -खूंटियों पर टंगे कैलेण्डर नये हैं

चित्र -गूगल से साभार 
नया वर्ष शांति और समृद्धि लाए  ,भ्रष्टाचार आतंक और अत्याचार मिटाए |

एक गीत -खूंटियों पर टंगे कैलेण्डर नये हैं 
दुधमुंहा 
दिनमान पूरब के 
क्षितिज से आ रहा है |
नया संवत्सर 
उम्मीदों की 
प्रभाती गा रहा है |

डायरी के 
गीत बासी हुए 
उनको छोड़ना है ,
अब नई 
पगडंडियों की 
ओर रुख को मोड़ना है ,
एक अंतर्द्वंद 
मन को 
आज भी भटका रहा है |

फिर हवा में 
फूल महकें 
धूप में आवारगी हो ,
पर्व -उत्सव 
के सुदिन लौटें 
मिलन में सादगी हो ,
नया मौसम 
नई तारीखें 
नशा सा छा रहा है |

गर्द ओढ़े 
खूटियों पर 
टंगे कैलेण्डर नये हैं ,
विदा लेकर 
अनमने से 
कुछ पुराने दिन गये हैं ,
तितलियों के 
पंख फूलों से 
कोई सहला रहा है |

फिर समय की 
सीढियों पर 
हो कबीरा की लुकाठी ,
स्वस्ति वाचन
करें निर्भय
मंदिरों में वेदपाठी ,
फिर
जलोटा के सुरों में
भजन संगम गा रहा है |
संगम इलाहाबाद -चित्र गूगल से साभार 

Wednesday, 19 December 2012

एक गीत -स्याह चांदनी चौक हो गया

चित्र -गूगल से साभार 
क कविता -स्याह चांदनी चौक हो गया 
[यह सिर्फ़ एक कविता नहीं जनाक्रोश है ]
यमुना में 
गर चुल्लू भर 
पानी हो दिल्ली डूब मरो |
स्याह 
चाँदनी चौक हो गया 
नादिरशाहों तनिक डरो |

नहीं राजधानी के 
लायक 
चीरहरण करती है दिल्ली ,
भारत माँ 
की छवि दुनिया में 
शर्मसार करती है दिल्ली ,
संविधान की 
क़समें 
खाने वालों कुछ तो अब सुधरो |

तालिबान में ,
तुझमें क्या है 
फ़र्क सोचकर हमें बताओ ,
जो भी 
गुनहगार हैं उनको 
फांसी के तख्ते तक लाओ ,
दुनिया को 
क्या मुंह 
दिखलाओगे नामर्दों शर्म करो |

क्रांति करो 
अब अत्याचारी 
महलों की दीवार ढहा दो ,
कठपुतली 
परधान देश का 
उसको मौला राह दिखा दो ,
भ्रष्टाचारी 
हाकिम दिन भर 
गाल बजाते उन्हें धरो |

गोरख पांडे का 
अनुयायी 
चुप क्यों है मजनू का टीला ,
आसमान की 
झुकी निगाहें 
हुआ शर्म से चेहरा पीला ,
इस समाज 
का चेहरा बदलो 
नुक्कड़ नाटक बन्द करो |

गद्दी का 
गुनाह है इतना 
उस पर बैठी बूढी अम्मा ,
दु:शासन हो 
गया प्रशासन 
पुलिस तन्त्र हो गया निकम्मा ,
कुर्सी 
बची रहेगी केवल 
इटली का गुणगान करो |

Tuesday, 18 December 2012

एक गीत -सूरज लगा सोने पहाड़ों में

चित्र गूगल से साभार 
एक गीत -सुबह अब देर तक सूरज लगा सोने पहाड़ों में 
सुबह अब 
देर  तक सूरज 
लगा सोने पहाड़ों में |
हमें भी 
आलसी, मौसम 
बना देता है जाड़ों में |

गुलाबी होंठ 
हाथों में 
लिए काफी जगाते हैं ,
लिहाफों में 
हम बच्चों की 
तरह ही कुनमुनाते हैं ,
न चढ़ती है 
न खुलती 
सिटकिनी ऊँचे किवाड़ों में |

कुहासे में 
परिंदे राह 
मीलों तक भटक जाते ,
कभी गिरकर के 
पेड़ों की 
टहनियों में अटक जाते ,
कोई कुश्ती में 
धोबी पाट 
दिखलाता अखाड़ों में |

नदी में 
चोंच से
लड़ते हुए पंछी लगे तिरने ,
गगन में 
सूर्य के घोड़े 
कुहासे में लगे घिरने ,
हवा का 
शाल पश्मीना 
चिपक जाता है ताड़ों में |

किसी को भी 
बुलाओ तो 
नहीं अब सुन रहा कोई ,
नया आलू 
अंगीठी में 
पलटकर भुन रहा कोई ,
खनक 
वैसी नहीं अब 
रात में बजते नगाड़ों में |

Thursday, 13 December 2012

एक गीत -शायद मुझसे ही मिलना था

चित्र -गूगल से साभार 
एक गीत -शायद मुझसे ही मिलना था  
बहुत दिनों से 
गायब कोई पंछी 
ताल नहाने आया |
चोंच लड़ाकर 
गीत सुनाकर 
फिर -फिर हमें रिझाने आया |

बरसों से 
सूखी टहनी पर 
फूल खिले ,लौटी हरियाली ,
ये उदास 
सुबहें फिर खनकीं 
लगी पहनने झुमके ,बाली ,
शायद मुझसे 
ही मिलना था 
लेकिन किसी बहाने आया |

धूल फांकती 
खुली खिड़कियाँ 
नये -नये कैलेण्डर आये ,
देवदास के 
पागल मन को 
केवल पारो की छवि भाये ,
होठों में 
उँगलियाँ फंसाकर 
सीटी मौन बजाने आया |

सर्द हुए 
रिश्तों में खुशबू  लौटी 
फिर गरमाहट आई ,
अलबम खुले 
और चित्रों को 
दबे पांव की आहट भाई ,
कोई पथराई 
आँखों को 
फिर से ख़्वाब दिखाने आया |

दुःख तो 
बस तेरे हिस्से का 
सबको साथी गीत सुनाना ,
कोरे पन्नों 
पर लिख देना 
प्यार -मोहब्बत का अफ़साना ,
मैं तो रूठ गया था 
ख़ुद से 
मुझको कौन मनाने आया |
चित्र -गूगल से साभार 

Tuesday, 20 November 2012

कुशल चित्रकार और कवयित्री वाजदा खान की कवितायेँ

कुशल चित्रकार और कवयित्री वाजदा खान
सम्पर्क -09868744499
कोई अच्छा कवि हो सकता है तो कोई एक कुशल चित्रकार |दोनों ही हुनर विरले लोगों को ही मिलते हैं |ये दोनों ही हुनर मिले हैं चित्रकार ,कवयित्री वाजदा खान को |वाजदा खान समकालीन हिंदी कविता की एक महत्वपूर्ण कवयित्री हैं | वाजदा खान का जन्म 15 जून 1969को ग्राम -बढ़नी ,सिद्धार्थनगर [उ० प्र० ]में हुआ था |यह  कवयित्री एक कुशल और लब्धप्रतिष्ठ चित्रकार /पेंटर भी है |वाजदा खान जिस तरह स्त्री मनोभावों को अपनी पेंटिंग्स में चित्रित करती हैं उसी तरह अपनी कविताओं में भी बड़े सलीके से उन्हें अभिव्यक्त करती हैं |नया ज्ञानोदय ,हंस ,वागर्थ ,बहुवचन ,साक्षात्कार ,साहित्य अमृत ,आजकल ,पाखी और देश की अन्य प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में इनकी कविताएँ प्रकाशित होती रहती हैं |वाजदा खान की कुछ कविताओं का कन्नड़ में अनुवाद भी हुआ है |देश के कई सम्मानित काव्य मंचों पर इनका काव्य पाठ भी हो चुका है |वाजदा खान की पेंटिंग्स की एकल और सामूहिक प्रदर्शनियां देश की विख्यात कलादीर्घाओं में आयोजित  हो चुकी हैं |देश की कई कार्यशालाओं में भाग ले चुकी वाजदा खान को भारत के संस्कृति मंत्रालय द्वारा वर्ष 2004-2005 में फेलोशिप भी दी प्रदान की गयी है | जिस तरह घुलती है काया भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित वाजदा खान का कविता संग्रह है जिसे हेमंत स्मृति सम्मान 2010 से सम्मानित किया जा चुका है |वाजदा खान ललित कला अकादमी नई दिल्ली [लाजपत नगर के पास ]बतौर स्वतंत्र कलाकार कार्यरत हैं |हम वाजदा खान की कुछ कविताएँ अंतर्जाल के माध्यम से पहुंचा रहे हैं |

कुशल चित्रकार और कवयित्री वाजदा खान की कविताएँ 
बाजार का हिस्सा हैं हम
बिना सीमा की
बिना नैतिकता की
और बिना मूल्यों की वर्जनाएं
घूम रही हैं पूरे बाजार में
उसी बाजार का हिस्सा हैं हम।

वाजदा खान बाएं सुप्रसिद्ध कथा लेखिका ममता कालिया के साथ 

नि:शब्द
उसकी आंखों में सात रंगों का
मेकअप नहीं था
सच के रंग थे
देखना उसे ध्यान से
तमाम अनिवार्य ख्वाहिशों के रंग
उन रंगों में
उगी थी वह कायनात
तनी थी जो
उसके जिस्म पर
कोरे कैनवस सा
भरकर तमाम ख्वाहिशों के रंग
बनाना चाहती थी
एक नायाब पेन्टिंग
कि तुम बरबस बोल दो
हां, यही है वह अक्स
जिनकी तलाश में
जन्म-जन्मान्तर भटक रहे शब्द
नि:शब्द।
खो गया सवेरा
किसी अंधेरे में सवेरा खो गया
कितना मासूम कितना निश्छल अंधेरा
कब चांदनी रातों में उगता है
कब उसकी पीली आंखों में
रुमानियत की लौ उगती है
कब खो जाता है
आसमान का चांद बनकर
दूर बहुत दूर
अदृश्य हो जाता
बाज वक्त के लिए
मुसलसल बैठी
कटी शाखों पर
तीतर, बटेरों, गौरैय्यों को
इंतजार रहता
आसमान के फूल खिलने का।
लकीरों की याद
बंद पलकों के अंधेरे में
यहां-वहां फुदकती चिड़िया
कुछ ढूंढती चिड़िया
तुम हरसिंगार के ढेरों फूल
तुम उगे उस शजर (वृक्ष) में
जिसके जिस्म में
रुहानी टहनियां रुहानी शाखें
और पत्तियां हैं उनमें
दर्ज हैं तमाम खूबसूरत
लकीरों की याद
पत्तियों में उभरी नसें हैं
भरा है उनमें
आंखों का पानी
जड़ों में गहराई है इतनी
गहराई कि मजबूती से जमे हों
मिट्टी में
तुम्हारी जिस्म के खुशबू के
सुरूर में डूबे गुच्छों में से
कुछ फूल चुनकर
लाली मेरे लाल की तर्ज पर
लाल रंग की आभा में
सराबोर कैनवस पर
उगा लूं
अभी तक वहां
पत्तियों का आगाज है
तवारुफ होगा उनसे तो
फूल आएंगे
शोख नारंगी /  हल्के पीले
रंग के पत्तियों का
संग हो जाएगा।
गुमराह होने से बचना
पौधे ने पनपना प्रारम्भ कर दिया
नन्हीं कोमल पत्तियां
खिल रही हैं पूरे एहसास के साथ
बढ़ते पौधे के साथ विकसित होंगी
टहनियां, फैलाव होगा पत्तियों का
आसमान तक
पत्तियों में उगी नसों और
हथेली की रेखाओं में ढूंढूगी
साम्यता, हर रेखा पीड़ा की
लोककथा बनकर बरस रही
बारिश सी
युवा होते पौधे
पर क्या पौधे का हरापन
बरकरार रह पाएगा
या छा जाएगी निम्नतम तापमान की
उदासी, कि जम जाएगा ऊर्जा का स्रोत भी
जो जीने की ताकत देता है
गुमराह होने से बचाता है
महफूज करता है चुक सकने की उदासी से
उन तमाम दीमक की तरह
चाटने वाले कीड़ों से जो नमी के साथ
उग आते हैं पौधों की जड़ों में
निरन्तर ख्याल रखना पड़ता है
सतर्क रहना पड़ता है, फिर कहीं
पसीने और आंसुओं से रची उदासीनता का
टुकड़ा पसर न जाए
कहीं जड़ों पर
बहुत मुश्किल होगा तब जड़ों को बचाना।
जिन्दगी और रंगमंच
किसी भी भूमिका का निर्वाह करना
अपने आप में कितना दुष्कर कार्य है
भूमिका चाहे जिन्दगी की हो
या रंगमंच की
उस परिवेश से प्रेरणा ग्रहण
करनी हो होती है
जिसमें हमारी सांस-सांस रची-बसी है
चाहे कितनी कटुताएं हों, कितना क्षोभ
कितनी अशान्ति
चाहे कितने अभाव हों
मुस्कराना तो है ही
संघर्ष की लम्बी राह पर
नट सा संतुलन बनाकर पांव जमाना है
रस्सी जैसी पतली पगडंडियों पर
संकल्प तो रखना है
एक क्रांतिकारी युग की
शुरुआत के लिए
उपयोग करना है उसमें अपनी
नष्ट होती ऊर्जा को
साथ-साथ आगाह करते जाना है
अवचेतन मन को
लड़खड़ाए जो पांव तुम्हारे
बिगड़ जाएगा संघर्ष और खुशी का संतुलन
इसलिए अनिवार्य है तुम मछली की
आंख पर ध्यान केंद्रित करो
और अपने अन्वेषी मन को उड़ान भरने दो
भू दृश्य के चारों ओर सपाट धरातल पर
खुद ही संरचना कर लेंगे
उन तमाम रुपाकारों का
जो उत्सर्जित होते होंगे उनकी
अपनी देह से
संभव हो तुम पा लो
चेतना का अंत:परिवर्तन
विभेद कर लो आध्यात्मिकता और
भौतिकता में
उपज सके तुम्हारे चारों ओर
वह प्रेम महरुम हो हो जिससे तुम
वैयक्तिकता को तब्दील
कर सको सौन्दर्यबोधीय
आत्म विकास में जिसका
तुममें नितान्त अभाव है।
कवयित्री वाजदा खान की कुछ मनमोहक पेंटिंग्स 
वाजदा खान की एक मोहक पेंटिंग 

Saturday, 10 November 2012

एक गीत -मैं दिया पगडंडियों का

चित्र -गूगल से साभार 
 आप सभी के लिए दीपावली मंगलमय हो 


एक गीत -मैं दिया पगडंडियों का 
आरती में 
और होंगे 
थाल में उनको सजाओ |
मैं दिया 
पगडंडियों का 
मुझे पथ में ही जलाओ |

सिर्फ दीवाली 
नहीं मैं 
मुश्किलों में भी जला हूँ ,
रौशनी को 
बाँटने में 
मोम बनकर भी गला हूँ ,
तम न 
जीतेगा हंसो 
फिर  रौशनी के गीत गाओ |

लौ हमारी 
खेत में ,
खलिहान में फैली हुई है ,
यह
हवाओं में  
नहीं बुझती ,नहीं मैली हुई है ,
धुआं भी 
मेरा ,नयन की 
ज्योति है काजल बनाओ |

गहन तम
में भी जगा हूँ 
नींद में सोया नहीं हूँ ,
मैं गगन के 
चंद्रमा की 
दीप्ति में खोया नहीं हूँ ,
देखकर 
रुकना न मुझको 
मंजिलों के पास जाओ |

राह में 
चलते बटोही की 
उम्मीदें ,हौसला हूँ ,
दीप का 
उत्सव जहाँ हो 
रौशनी का काफिला हूँ ,
ओ सुहागन !
मुझे आंचल में 
छिपाकर मत रिझाओ |
चित्र -गूगल से साभार 

Thursday, 1 November 2012

एक नवगीत -इस सूरज से कुछ मत मांगो

चित्र -गूगल से साभार 
एक नवगीत -इस सूरज से कुछ मत मांगो 
क्रांति करो 
अब चुप मत बैठो 
राजा नहीं बदलने वाला |
आग हुई 
चूल्हे की ठंडी 
अदहन नहीं उबलने वाला |

मंहगाई के 
रक्तबीज अब 
दिखा रहे हैं दिन में तारे ,
चुप बैठे हैं 
सुविधा भोगी 
जन के सब प्रतिनिधि बेचारे ,
कैलेन्डर की 
तिथियों से अब 
मौसम नहीं बदलने वाला |

कुछ ही दिन में 
कंकड़ -पत्थर 
मुंह के लिए निवाले होंगे ,
जो बोलेगा 
उसके मुंह पर 
कम्पनियों के ताले होंगे ,
भ्रष्टाचारी 
केंचुल पहने 
अजगर हमें निगलने वाला |

राजव्यवस्था 
ए०सी० घर में 
प्रेमचन्द का हल्कू कांपे ,
राजनीति का 
वामन छल से 
ढाई पग में हमको नापे ,
युवा हमारा 
अपनी धुन में 
ड्रम पर राग बदलने वाला |

हर दिन 
उल्का पिंड गिराते 
आसमान से हम क्या पाते ?
आंधी वाली 
सुबहें आतीं 
चक्रवात खपरैल उड़ाते ,
इस सूरज से 
कुछ मत मांगो 
शाम हुई यह ढलने वाला |
[आज रविवार 04-11-2012 को यह गीत अमर उजाला के साहित्य पृष्ठ शब्दिता में प्रकाशित हो गया है |सम्पादक साहित्य जाने -माने कवि/उपन्यासकार भाई  अरुण आदित्य जी का आभार ]

एक पुरानी ग़ज़ल -पत्रा में लग्न खूब थे

  चित्र साभार गूगल  एक पुरानी ग़ज़ल - पत्रा में लग्न खूब थे  सूखे में कहीं बाढ़ में फसलें थी धान की  फिर भी अमीन लाये हैं नोटिस लगान की  पत्रा ...