Saturday, 13 August 2016

एक गीत -मानवता का गान रहेगा



चित्र -गूगल से साभार 



एक गीत -मानवता का गान रहेगा 

जब तक 
भारत देश रहेगा 
मानवता का गान रहेगा |
विश्व गुरू 
कहलाने लायक 
केवल हिन्दुस्तान रहेगा |

यह भारत 
दरवेशों का है 
सन्तों और फ़कीरों का ,
मातृभूमि पर 
प्राण निछावर 
करने वाले वीरों का ,
भगतसिंह 
आज़ाद तुम्हारी 
गाथा पर अभिमान रहेगा |

ज्ञान- योग ,
अध्यात्म यहीं से 
दुनिया वाले पाते हैं ,
हम यमुना 
गंगा के तट पर 
वंशी मधुर सुनाते हैं ,
सत्य -अहिंसा का 
दुनिया में 
युग -युग तक सम्मान रहेगा |

Friday, 12 August 2016

एक कविता -थर्राती स्वप्निल संध्याएँ



चित्र -गूगल से साभार 



क गीत -थर्राती स्वप्निल संध्याएँ 

लहू -लहू 
अख़बार सुबह का 
थर्राती स्वप्निल संध्याएँ |
शहर गए 
बच्चों  के खातिर 
दुआ मांगती हैं माताएं |

राजपथों पर 
आदमखोरों के 
पंजों की छाप देखिए ,
हर घटना पर 
वही पुराना जुमला 
साहब आप देखिए |
एक नहीं अब 
कई दुःशासन क्या 
होगा कल आप बताएं ?

कला -संस्कृति 
भूल गये हैं 
दरबारों के नए सभासद ,
सूर्य -राहू के 
पंजे में है आने -
वाला हर दिन त्रासद  ,
रुमालें थक गयीं 
पोंछते अब ये 
आंसू कहाँ छिपाएं |

लिखने बैठा 
प्रेम गीत तो 
शोक गीत भर गए जेहन में ,
एक तरफ़ आंतकवाद है ,
एक तरफ़ 
अपराध वतन में ,
काशी ,मगहर 
अवध सभी चुप 
नहीं सुरक्षित अब महिलाएं |

Friday, 5 August 2016

एक देशगान -यह भारत बहुत महान है







चित्र -गूगल से साभार 

सभी देशवाशियों और सीमा पर तैनात हमारे देश के वीर जवानों के लिए 
स्वतन्त्रता दिवस की शुभकामनाओं के साथ 
एक देशगान -यह भारत बहुत महान है 

लाल किले पर लगा तिरंगा 
भारत का अभिमान है |
युगों -युगों से मानवता का 
रक्षक हिन्दुस्तान है |

केसर ,चन्दन की खुशबू 
जिसकी मिटटी महकाती है ,
यह सोने की चिड़िया 
केवल गीत प्रेम का गाती है ,
लेकिन संकट आये तो 
यह दुनिया का सुल्तान है |

सरहद पर हर मुश्किल में 
जो सीना ताने गाते हैं ,
हम उन वीर जवानों के 
सम्मुख यह शीश झुकाते हैं ,
मातृभूमि के लिए जिए जो 
समझो वह भगवान है |

यहाँ का बच्चा वीर भगत 
बेटी झाँसी की रानी है ,
है यहाँ अतिथि के लिए स्वर्ग 
दुश्मन को काला पानी है ,
दुनिया भर में सम्मानित 
यह भारत बहुत महान है |

युद्ध लड़ें हम तो दुश्मन की 
परछाईं  डर जाती है,
म्रत्यु हमारे पास पहुँचने 
से पहले मर जाती है ,
सब धर्मों का मेल यहाँ पर 
यही हमारी जान है |
चित्र -गूगल से साभार 

Thursday, 23 June 2016

एक गीत -मछली तो चारा खायेगी

चित्र -गूगल से साभार 


एक गीत -मछली तो चारा खायेगी 

कोई भी 
तालाब बदल दो 
मछली तो चारा खायेगी |
एक उबासी 
गंध हवा के 
नाम वसीयत कर जायेगी |

सत्ता का शतरंज /
बिसातों पर उजले -
काले मोहरे हैं ,
आप हमें 
अनभिज्ञ न समझें 
सबके सब परिचित चेहरे हैं ,
आप सभी 
छल -छद्म करेंगे 
जिससे की सत्ता आयेगी |

आप सदन 
कहते हैं जिसको 
वह लाक्षागृह से बदतर है ,
आज प्रजा की 
चिंता किसको 
राज सभा का दिल पत्थर है ,
राजगुरू को 
लाभ मिलेगा जिससे-
वही युक्ति भायेगी | 

Monday, 30 May 2016

नयी सदी के नवगीत -तृतीय खण्ड सम्पादक -डॉ ० ओमप्रकाश सिंह

नयी सदी के नवगीत -तृतीय खण्ड
सम्पादक -डॉ ० ओमप्रकाश सिंह 


नयी सदी के नवगीत -सम्पादक -डॉ ओमप्रकश सिंह 


जिस तरह विश्व विद्यालयों में ,पत्र -पत्रिकाओं में आलोचनाओं में एक साजिश के अंतर्गत हिंदी गीत को खारिज़ कर दिया गया लगा कि हिंदी गीत अब खत्म हो जायेगा |हालाँकि हिंदी गद्य कविता अपनी पीठ थपथपाती है लेकिन न कोई नागार्जुन बन सका न ही निराला न कविता आम जन में स्वीकार्य है |हिंदी गीत और गीत कवि भी दूध के धुले नहीं हैं उनमें भी आत्मश्लाघा मंच की भड़ैती और कुछ की अतिशय लोकप्रियता भी उन्हें लिखने पढ़ने से दूर करती गयी |लेकिन हाल में कई साझा नवगीत के संकलन आये जो गीत को बचाने या मुख्य धारा में जोड़ने के प्रयास में लगे रहे | तमाम  असहमतियों और विसंगतियों के साथ मैं उनके प्रयासों की सराहना करता हूँ |आदरणीय निर्मल शुक्ल ,भाई नचिकेता और राधेश्याम बंधू का प्रयास हाल के दिनों में सराहनीय रहा |दिनेश सिंह जीवन पर्यन्त नवगीत के लिए समर्पित रहे |हाल में एक उल्लेखनीय प्रयास आदरणीय ओमप्रकाश सिंह जी ने नयी सदी के नवगीत निकालकर किया है |मुझे तीसरा अंक प्राप्त हुआ है जिसमें कुल पन्द्रह गीत कवि शामिल किये गए हैं |इन गीत कवियों के आत्मकथ्य भी प्रकाशित हैं | अनिल कुमार ,रमेश दत्त गौतम ,उदय शंकर सिंह गौतम ,उदय ,बृजनाथ श्रीवास्तव ,राघवेन्द्र तिवारी ,शीलेन्द्र कुमार सिंह चौहान रमेश चन्द्र पन्त ,मधु प्रसाद ,ओम धीरज ,जय चक्रवर्ती ,अजय पाठक ,जगदीश व्योम ,यशोधरा राठौर विनय मिश्र और मैं जयकृष्ण राय तुषार |

निसंदेह अग्रज ओमप्रकाश सिंह का यह कार्य हिंदी गीत के लिए संजीवनी का कार्य करेगा |हिंदी प्रकृति की हर लय में हर कंकण -कण में समाहित है यह मजदूर को स्त्री को चरवाहे को शोक में संयोग में वियोग में उल्लास में हर जगह मनुष्य का साथी है |इसकी मोहक छाया में हमारी संस्कृति सभ्यता हमारे संस्कार तीज त्यौहार सभी पुष्पित -पल्लवित होते हैं |यह गीत कभी नहीं मरेगा जब तक हम रहेंगे हमारी धरती रहेगी तब तक हमारे होठों पर गीत भी रहेंगे ये गीत कोमल भी होंगे कठोर भी होंगे प्रेम के भी होंगे रोटी के भी होंगे |मगर हर हाल में रहेंगे गीत ही |ओमप्रकाश सिंह जी को शतायु होने की कामना के साथ |

कवि /सम्पादक डॉ ० ओमप्रकाश सिंह 

Friday, 13 May 2016

एक कविता -प्यार अकेले हो जाने का नाम है कवि -अज्ञेय

कवि -अज्ञेय 

महान कवि -सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय 

की  एक लघु कविता-

प्यार अकेले हो जाने का एक नाम है 

प्यार अकेले हो जाने का एक नाम है
यह तो बहुत लोग जानते हैं
पर प्यार 
अकेले छोड़ना भी होता है इसे
जो
वह कभी नहीं भूली
उसे
जिसे मैं कभी नहीं भूला ......नई दिल्ली 1980
[अज्ञेय संकलित कविताएँ -चयन और भूमिका नामवर सिंह प्रकाशक नेशनल बुक ट्रस्ट से 

चित्र /पेंटिंग्स गूगल से साभार 

Thursday, 7 April 2016

एक गीत -माँ भी तो गंगा सी बहती है



चित्र /पेंटिग्स गूगल से साभार 


एक गीत -माँ भी तो गंगा सी बहती है 

रिश्तों का 
दंश 
रोज सहती है |
माँ भी 
तो गंगा -
सी बहती है |

मौसम 
से भी 
पहले बदली है,
निर्गुण है 
सोहर है 
कजली है ,
दुविधा में 
कभी 
नहीं रहती है |

भोलापन 
उसकी 
कमजोरी है ,
लोककथा 
बच्चों की 
लोरी है ,
गीता है 
माँ !
सच ही कहती है |

सब अपने 
ही
उसको छलते हैं ,
थके हुए
पांव
मगर चलते हैं ,
अपना दुःख 
कब 
किससे कहती है |


Monday, 4 April 2016

एक गीत -चांदनी थी तुम

चित्र -गूगल से साभार 



एक गीत -चांदनी थी तुम 
चांदनी थी 
तुम ! धुँआ सी 
हो गयी तस्वीर | |
मन तुम्हारा 
पढ़ न पाए 
असद ,ग़ालिब ,मीर |

घोंसला  तुमने 
बनाया 
मैं परिंदों सा उड़ा ,
वक्त की 
पगडंडियों पर 
जब जहाँ चाहा मुड़ा .
और तेरे 
पांव में 
हर पल रही जंजीर |

खनखनाते 
बर्तनों में 
लोरियों में गुम रही .
घन  अँधेरे में 
दिए की लौ 
सरीखी तुम रही ,
आंधियां 
जब भी चलीं 
तुम हो गयी प्राचीर |

पत्थरों में भी 
अनोखी 
मूर्तियाँ गढ़ती रही ,
एक दस्तावेज 
अलिखित 
रोज तुम पढ़ती रही ,
ताल के 
शैवाल में तुम 
खिली बन पुण्डीर |

Friday, 1 April 2016

एक गीत -शायद ऐसा मीत नहीं है

चित्र -गूगल से साभार 




क गीत -शायद ऐसा मीत नहीं है 

फूल -तितलियाँ 
खुशबू भी है 
लेकिन मन में गीत नहीं है |
जो हँसता -रोता हो 
संग -संग 
शायद ऐसा  मीत नहीं है |

आँखे -नींद 
यामिनी सुंदर 
लेकिन सपने टूट गए  हैं,
दूर निकल जाने 
की जिद में 
परिचित रस्ते छूट गए हैं ,
अब न हारने का 
कोई ग़म और 
जीत भी जीत नहीं है |

शहर फूस के 
और सुलगती 
सिगरेटों के आसमान हैं ,
ओहदों की 
कुण्डी लटकाए 
रिश्ते -नाते घर -मकान हैं ,
हंसी -ठहाके 
महफ़िल सब है 
लेकिन वह संगीत नहीं है |
चित्र -गूगल से साभार 

Wednesday, 24 February 2016

गंगा पर कुछ दोहे -कवि बुद्धिसेन शर्मा

वरिष्ठ हिंदी कवि बुद्धिसेन शर्मा 


माँ गंगा पर कवि -बुद्धिसेन शर्मा के कुछ दोहे 

सदा रही है विश्व में भारत -भूमि अनन्य 
गंगा ने आकर किया इसे और भी धन्य 

पल पल मिलता है मुझे माँ तेरा मकरंद 
मेरे चिन्तन में घुली गंगाजल की गंध 

मिटे सदा के वास्ते दुखी हृदय की पीर 
आप कभी आकर बसे गंगा माँ के तीर 

कर फैलाते घाट पर निर्धन औ धनवान 
जो माँगा सबको दिया आन-बान सम्मान 

गंगा माँ तो है अमर कवि भी समयातीत 
हम दोनों रह जायेंगे समय जायेगा बीत 

माँ सुरसरि के तीर पर पड़े हजारों लोग 
हर लेती है माँ सदा जैसा भी हो रोग 

गंगाजल जिनके लिए जीवन का पाथेय 
तीन लोक की संपदा उनके आगे हेय 

श्रृंगवेरपुर में लगा कवियों का दरबार 
बुद्धिसेन चन्दन घिसें टीका करें तुषार 

दिनांक 22-02-2016 को श्रृंगवेरपुर रामवन गमन का स्थान में एक कवि सम्मेलन हुआ जिसमे गंगा पर ही कविता पढ़ना था |आयोजन E.Z.C.C.KOLKATA का था |संचालन श्लेष गौतम का था |चित्र -गूगल और गुफ्तगू से साभार ]

एक पुराना लोकभाषा गीत -चुहुल ननद भौजाई कै

  चित्र साभार गूगल  एक पुराना लोकभाषा गीत  लोकसंस्कृति, गाँव की रौनक़, उत्सवजीविता को, लोकपरम्परा को याद करती लोकभाषा कविता.सादर अभिवादन सहित...