Friday, 12 August 2016

एक कविता -थर्राती स्वप्निल संध्याएँ



चित्र -गूगल से साभार 



क गीत -थर्राती स्वप्निल संध्याएँ 

लहू -लहू 
अख़बार सुबह का 
थर्राती स्वप्निल संध्याएँ |
शहर गए 
बच्चों  के खातिर 
दुआ मांगती हैं माताएं |

राजपथों पर 
आदमखोरों के 
पंजों की छाप देखिए ,
हर घटना पर 
वही पुराना जुमला 
साहब आप देखिए |
एक नहीं अब 
कई दुःशासन क्या 
होगा कल आप बताएं ?

कला -संस्कृति 
भूल गये हैं 
दरबारों के नए सभासद ,
सूर्य -राहू के 
पंजे में है आने -
वाला हर दिन त्रासद  ,
रुमालें थक गयीं 
पोंछते अब ये 
आंसू कहाँ छिपाएं |

लिखने बैठा 
प्रेम गीत तो 
शोक गीत भर गए जेहन में ,
एक तरफ़ आंतकवाद है ,
एक तरफ़ 
अपराध वतन में ,
काशी ,मगहर 
अवध सभी चुप 
नहीं सुरक्षित अब महिलाएं |

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