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| चित्र -गूगल से साभार |
एक गीत -थर्राती स्वप्निल संध्याएँ
लहू -लहू
अख़बार सुबह का
थर्राती स्वप्निल संध्याएँ |
शहर गए
बच्चों के खातिर
दुआ मांगती हैं माताएं |
राजपथों पर
आदमखोरों के
पंजों की छाप देखिए ,
हर घटना पर
वही पुराना जुमला
साहब आप देखिए |
एक नहीं अब
कई दुःशासन क्या
होगा कल आप बताएं ?
कला -संस्कृति
भूल गये हैं
दरबारों के नए सभासद ,
सूर्य -राहू के
पंजे में है आने -
वाला हर दिन त्रासद ,
रुमालें थक गयीं
पोंछते अब ये
आंसू कहाँ छिपाएं |
लिखने बैठा
प्रेम गीत तो
शोक गीत भर गए जेहन में ,
एक तरफ़ आंतकवाद है ,
एक तरफ़
अपराध वतन में ,
काशी ,मगहर
अवध सभी चुप
नहीं सुरक्षित अब महिलाएं |
