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| चित्र -गूगल से साभार |
एक गीत -चांदनी थी तुम
चांदनी थी
तुम ! धुँआ सी
हो गयी तस्वीर | |
हो गयी तस्वीर | |
मन तुम्हारा
पढ़ न पाए
असद ,ग़ालिब ,मीर |
घोंसला तुमने
बनाया
मैं परिंदों सा उड़ा ,
वक्त की
पगडंडियों पर
जब जहाँ चाहा मुड़ा .
और तेरे
पांव में
हर पल रही जंजीर |
खनखनाते
बर्तनों में
लोरियों में गुम रही .
घन अँधेरे में
दिए की लौ
सरीखी तुम रही ,
आंधियां
जब भी चलीं
तुम हो गयी प्राचीर |
पत्थरों में भी
अनोखी
मूर्तियाँ गढ़ती रही ,
एक दस्तावेज
अलिखित
रोज तुम पढ़ती रही ,
अलिखित
रोज तुम पढ़ती रही ,
ताल के
शैवाल में तुम
खिली बन पुण्डीर |
