Friday, 1 November 2024

एक ग़ज़ल -हजार रंग के मौसम

चित्र साभार गूगल 


एक ग़ज़ल -हजार रंग के मौसम 


हज़ार रंग के मौसम सफ़र में मिलते हैं 

कहाँ ये झील -शिकारे शहर में मिलते हैं 


तिलस्म ऐसा मोहब्बत में सिर्फ़ होता है 

हमारे अक्स किसी की नज़र में मिलते हैं 


यकीन हो न तो कान्हा की बांसुरी सुन लो 

तमाम रंग सुरों के अधर में मिलते हैं 


संवर के आना ये महफ़िल बड़े अदीबों की 

लिबास सादा पहनके वो घर में मिलते हैं 


भिंगो के पँख जो संगम में उड़ के गाते रहे 

तमाम ऐसे परिंदे लहर में मिलते हैं 


अँधेरी रातों में जिद्दी दिए जो जलते रहे 

कहाँ चराग अब ऐसे सफ़र में मिलते हैं 


यूँ तुमको देख के सब तालियाँ बजाते रहे 

कुछ अच्छे शेर ही अच्छी बहर में मिलते हैं 


जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल 


Sunday, 27 October 2024

ग़ज़ल -समंदर से उठे हैं या नहीं

 

चित्र साभार गूगल


समंदर से उठे हैं या नहीं बादल ये रब जाने 
नजूमी बाढ़ का मज़र लगे खेतों को दिखलाने 

नमक से अब भी सूखी रोटियां मज़दूर खाते हैं 
भले ही कृष्ण चंदर ने लिखे हों इनपे अफ़साने 

रईसी देखनी है मुल्क की तो क्यों भटकते हो 
सियासतदां का घर देखो या फिर बाबू के तहखाने 

मुसाफिऱ छोड़ दो चलना ये रस्ता है तबाही का 
यहाँ हर मोड़ पे मिलते हैं साक़ी और मयखाने 

चलो जंगल से पूछें या पढ़े मौसम की खामोशी 
परिंदे उड़ तो सकते हैं मगर गाते नहीं गाने 

ये वो बस्ती है जिसमें सूर्य की किरनें नहीं पहुँची 
करेंगे जानकर भी क्या ये सूरज -चाँद के माने 

सफ़र में साथ चलकर हो गए हम और भी तन्हा 
न उनको हम कभी जाने न वो हमको ही पहचाने 

जयकृष्ण राय तुषार 

चित्र साभार गूगल 


Saturday, 19 October 2024

दो ग़ज़लें

 

चित्र साभार गूगल 

खौफ़ का कितना हसीं मंजर था मेरे सामने 

हर किसी के हाथ में पत्थर था मेरे सामने 


प्यार से जब खेलते बच्चे को चाहा चूमना 

मैं वक़्त का पाबंद था दफ़्तर था मेरे सामने 


अमन की बातें परिंदे कैसे मेरी मानते 

रक्त में डूबा हुआ एक पर था मेरे सामने 


अब तलक भूली नहीँ बचपन की मुझको वो सजा 

मैं खड़ा था धूप में और घर था मेरे सामने 


जन्मदिन पर तेरे कैसे भेंट करता फूल मैं 

सहरा था मेरे सामने बंजर था मेरे सामने 

कवि जयकृष्ण राय तुषार 


चित्र साभार गूगल 

समस्याओं का रोना है अब उनका हल नहीं होता 

हमारे बाजुओं में अब तनिक भी बल नहीँ होता 

समय के पंक में उलझी है फिर गंगा भगीरथ की 
सुना उज्जैन की क्षिप्रा में भी अब जल नहीं होता 

सहन में बोन्साई हैं न साया है न खुशबू है 
परिंदे किस तरह आएंगे इनमें फल नहीं होता 

नशे में शोर को  संगीत का सरगम समझते हो 
शहर की धुंध में वंशी नहीं मादल नहीं होता 

सफऱ में हम भी तन्हा हैं सफऱ में तुम भी तन्हा हो 
किसी भी मोड़ पर अब खूबसूरत पल नहीं होता 

प्रतीक्षा में तुम्हारी हम समय पर आके तो देखो 
जो जज्बा आज दिल में है वो शायद कल नहीं होता 

जिसे तुम देखकर खुश हो मरुस्थल की फ़िज़ाओं में 
ये उजले रंग के बादल हैं इनमें जल नहीं होता 


Thursday, 17 October 2024

एक ग़ज़ल -एक नग़्मा है उजाला

 


दीपावली अभी दूर है लेकिन एक ताज़ा ग़ज़ल 

सादर 


ग़ज़ल 

एक नग़्मा है उजाला इसे गाते रहिए 

इन चरागों को मोहब्बत से जलाते रहिए 


फूल, मिष्ठान, अगरबत्ती, हवन, पूजा रहे 

राम की नगरी अयोध्या को सजाते रहिए 


चाँद को भी है मयस्सर कहाँ ये दीवाली 

शिव की काशी में गगन दीप जलाते रहिए 


भारतीय संस्कृति की पहचान हैँ मिट्टी के दिए 

घर के आले में या आँगन में जलाते रहिए 


पर्व यह ज्योति,पटाखों का, सफाई का भी 

दिल के पर्दों पे जमीं धूल हटाते रहिए 


सबके घर कामना मंगल की, सनातन है यही 

जो भी दुख -दर्द में हैँ उनको हँसाते रहिए 


आज अध्यात्म के श्रृंगार की अमावस्या 

आप भी चाँद सा मुखड़ा ये दिखाते रहिए 

कवि जयकृष्ण राय तुषार



Wednesday, 14 August 2024

एक ग़ज़ल -यही हिमालय, तिरंगा ये हरसिंगार रहे

 

तिरंगा 

आज 15 अगस्त है भारत की आजादी /स्वतंत्रता का स्वर्णिम दिन. करोड़ों भारतीयों के बलिदान के बाद यह आजादी हमें मिली है. हम भाग्यशाली हैँ जिस देश मेँ गंगा है हिमालय है, गीता है,, रामायण है, प्रभु श्रीराम हैँ. यह असंख्य जीवनदायिनी नदियों का ऋषियों का देश है. समस्त देशवासियों प्रवासी भारतीयों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनायें शुभकामनायें. यह तिरंगा सदैव अपराजेय रहे. वन्देमातरम 


 


तिरंगा -जय हिन्द जय भारत वन्देमातरम 

एक पुरानी ग़ज़ल 


एक ग़ज़ल देश के नाम -


कहीं से लौट के आऊँ तुझी से प्यार रहे


हवा ,ये फूल ,ये खुशबू ,यही गुबार रहे 

कहीं से लौट के आऊँ तुझी से प्यार रहे 


मैं जब भी जन्म लूँ गंगा तुम्हारी गोद रहे 

यही तिरंगा ,हिमालय ये हरसिंगार रहे 


बचूँ तो इसके मुकुट का मैं मोरपंख बनूँ 

मरूँ  तो नाम शहीदों में ये शुमार रहे 


ये मुल्क ख़्वाब से सुंदर है जन्नतों से बड़ा 

यहाँ पे संत ,सिद्ध और दशावतार रहे 


मैं जब भी देखूँ लिपट जाऊँ पाँव को छू लूँ 

ये माँ का कर्ज़ है चुकता न हो उधार रहे 


भगत ,आज़ाद औ बिस्मिल ,सुभाष भी थे यहीं 

जो इन्क़लाब लिखे सब इन्हीं के यार रहे 


आज़ादी पेड़ हरा है ये मौसमों से कहो 

न सूख पाएँ परिंदो को एतबार रहे 


तमाम रंग नज़ारे ये बाँकपन ये शाम 

सुबह के फूल पे कुछ धूप कुछ 'तुषार 'रहे 


कवि /शायर -जयकृष्ण राय तुषार 

झाँसी की रानी 


चित्र -साभार गूगल 


चित्र -साभार गूगल -भारत के लोकरंग

Sunday, 30 June 2024

एक गीत -मन किसी को याद करता है

 

चित्र साभार गूगल 
एक गीत -मन किसी को याद करता है 

जब गुलाबी फूल खिलते हैं 

मौसमों से रंग मिलते हैं 

पोछता हूँ धूल जब तस्वीर से 

मन किसी को याद करता है.


हाथ जब मेंहदी रचाते हैं 

पेड़ पंछी गुनगुनाते हैं 

धूप को जब छाँह मिलती है 

सुरमई जब शाम ढलती है 

खिड़कियों पर टांगकर पर्दे 

मौन भी संवाद करता है 

मन किसी को याद करता है.


चिट्ठियों के दिन कहाँ खोये 

कब हँसे हम और कब रोये 

मन लिखे भूली कथाओं को 

प्रेम की पावन ऋचाओं को 

प्रेम और वैराग्य का स्वागत 

यह इलाहाबाद करता है.

मन किसी को याद करता है.


पथ कभी छूटे नहीं मिलते 

हर समय गुड़हल नहीं खिलते 

वक्त ही हमको नई आवाज़ देता है

आम्रपाली को वही सुर साज देता है 

गीत लिखते हम मगर जादू 

साज पर नौशाद करता है

मन किसी को याद करता है.

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 

चित्र साभार गूगल 


Monday, 3 June 2024

एक प्रेम गीत -वीणा के साथ तुम्हारा स्वर हो

  

चित्र साधार गूगल 


एक गीत -वीणा के साथ तुम्हारा स्वर हो 

फूलों की 
सुगंध वीणा के 
साथ तुम्हारा स्वर हो.
इतनी सुन्दर 
छवियों वाला 
कोई प्यारा घर हो.

धान -पान के 
साथ भींगना 
मेड़ों पर चलना,
चिट्ठी पत्री 
लिखना -पढ़ना 
हॅसकर के मिलना,
मीनाक्षी आंखें 
संध्या की 
पाटल सदृश अधर हो,

ताल-झील 
नदियों से 
पहले हम बतियाते थे,
कुछ बंजारे 
कुछ हम 
अपना गीत सुनाते थे,
हर राधा के 
स्वप्नलोक में 
कोई मुरलीधर हो.

इंद्रधनुष की 
आभा नीले 
आसमान में निखरी,
चलो 
बैठकर पढ़ें 
लोक में प्रेम कथाएँ बिखरी,
रिमझिम 
वाले मौसम में 
फिर से साथ सफ़र हो.

सबकी चिंता 
सबका सुख दुःख 
मिलकर जीते थे,
निर्गुण गाते हुए 
ओसारे 
हुक्का पीते थे,
ननद भाभियों की 
गुपचुप फिर 
घर में इधर उधर हो.

कवि जयकृष्ण राय तुषार 
चित्र साधार गूगल 


Sunday, 2 June 2024

एक सामयिक गीत -केरल से उड़ या मेघा बंगाल से

 

चित्र साधार गूगल 

एक ताज़ा सामयिक गीत 


केरल से 

उड़ या 

मेघा बंगाल से.

खुशबू वाले 

फूल 

झर रहे डाल से.


हांफ रहे 

हैँ हिरण 

राम क्या मौसम है,

जंगल में 

चिड़ियों का 

कलरव बेदम है,

हंस 

पियासे 

झाँक रहे नभ ताल से.


पारो पोछे 

सुबह 

पसीना पल्लू से,

हवा गरम 

आ रही 

श्रीनगर, कुल्लू से,

मोर मोरनी 

थके 

लग रहा चाल से.


चम्पा, बेला

गुड़हल

मन से खिले नहीं,

इस मौसम 

कपोत के 

जोड़े मिले नहीं,

उड़ी 

इत्र की महक 

सभी रुमाल से.

कवि जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साधार गूगल 


Saturday, 1 June 2024

एक गीत -गर्म तवे सी धरती

 

चित्र साभार गूगल 

एक सामयिक गीत 

आज 10जून को दैनिक जागरण 
में यह गीत प्रकाशित 



गर्म तवे सी 
धरती 
पत्ते -फूल सभी मुरझाए.
इस दुरूह 
मौसम में 
कोई राग मल्हार सुनाए.

गाद भरी 
नदियों झीलों में 
सिर्फ नयन भर जल है,
अनियंत्रित 
विकास मौसम के 
साथ स्वर्ण मृग छल है,
जल विहीन 
बादल चातक की 
कैसे प्यास बुझाए.

पीपल, नीम 
उपेक्षित 
आँगन सजे बोनसाई,
क़ातिल 
लगने लगा 
सुहाना मौसम कैसे भाई,
भोर, साँझ 
दिन -रात 
एक सा पारा हमें रुलाए.

पंखा झलते 
उँटी, चम्बा 
औली, कुल्लू मनाली,
बरखा रानी 
की आभा से 
दसों दिशाएं खाली,
मैना 
सूखी हुई डाल पर 
अपनी पीठ खुजाए.

कवि जयकृष्ण राय तुषार 

चित्र साभार गूगल 


Tuesday, 21 May 2024

एक पुरानी ग़ज़ल -ग़ज़ल, ये गीत, ये किस्सा

 

 

चित्र साभार गूगल


एक ग़ज़ल-

ग़ज़ल ये गीत ये किस्सा कहानी छोड़ जाऊँगा

तुम्हारा प्यार ये चेहरा नूरानी छोड़ जाऊँगा


अभी फूलों की खुशबू झील में सुर्खाब रखता हूँ

किसी दिन गुलमोहर ये रातरानी छोड़ जाऊँगा


हमारी प्यास इतनी है कि दरिया सूख जाते हैं

किसी दिन राख, मिट्टी, आग- पानी छोड़ जाऊँगा


अभी चिड़ियों की बंदिश सुन रहा हूँ पेड़ के नीचे

कभी हल बैल ये खेती किसानी छोड़ जाऊँगा


सफ़र में आख़िरी ,नेकी ही अपने साथ जाएगी

ये शोहरत और दौलत ख़ानदानी छोड़ जाऊँगा


कभी सुनना हो मुझको तो मेरा दीवान पढ़ लेना 

किताबों में मैं फूलों की निशानी छोड़ जाऊँगा 


दिलों की आलमारी में हिफ़ाजत से इसे रखना 

इसी घर में मैं सब यादें पुरानी छोड़ जाऊँगा 


मैं मिलकर ॐ में इस सृष्टि की रचना करूँगा फिर 

ये धरती ,चाँद ,सूरज आसमानी छोड़ जाऊँगा 


कवि -जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल 


एक प्रेमगीत -गीत होठों पर सजाकर

  चित्र साभार गूगल  एक पुराना गीत  एक प्रेम गीत-बाँसुरी मैं छोड़ दूँगा गीत अधरों पर सजाकर आलमारी में कहीं फिर भागवत रख दो सजाकर । पास में  बै...