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| चित्र साभार गूगल |
खौफ़ का कितना हसीं मंजर था मेरे सामने
हर किसी के हाथ में पत्थर था मेरे सामने
प्यार से जब खेलते बच्चे को चाहा चूमना
मैं वक़्त का पाबंद था दफ़्तर था मेरे सामने
अमन की बातें परिंदे कैसे मेरी मानते
रक्त में डूबा हुआ एक पर था मेरे सामने
अब तलक भूली नहीँ बचपन की मुझको वो सजा
मैं खड़ा था धूप में और घर था मेरे सामने
जन्मदिन पर तेरे कैसे भेंट करता फूल मैं
सहरा था मेरे सामने बंजर था मेरे सामने
कवि जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
समस्याओं का रोना है अब उनका हल नहीं होता
हमारे बाजुओं में अब तनिक भी बल नहीँ होता
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