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Saturday, 31 October 2026

नवगीत समीक्षा -सुप्रसिद्ध लेखक समीक्षक श्री रविनंदन सिंह

 मेरी नवगीत यात्रा पर आदरणीय श्री रविनंदन सिंह जी की समीक्षा 

सुप्रसिद्ध आलोचक लेखक श्री रविनंदन सिंह जी 
अपनी लेखिका जीवन संगिनी श्रीमती पारुल सिंह के साथ 

सुप्रसिद्ध लेखक और समीक्षक श्री रविनंदन सिंह 
सम्पर्क -09454257709


*        लोकजीवन, श्रम और समकालीन संवेदना के नवगीत

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मेड़ो पर वसंत -जयकृष्ण राय तुषार 


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          सुपरिचित नवगीतकार जयकृष्ण राय तुषार कुछ दिन पूर्व आवास पर पधारे। वे अपने साथ अपने तीन नवगीत-संग्रहों के अतिरिक्त माहेश्वर तिवारी, अनूप अशेष, कौशलेन्द्र, शिवबहादुर सिंह भदौरिया, डॉ. ओम प्रकाश सिंह दिनेश सिंह और बृजनाथ श्रीवास्तव जैसे महत्त्वपूर्ण नवगीतकारों के लगभग दर्जन भर संग्रह भी लेकर आए। साहित्य में पुस्तकें केवल पढ़ने की सामग्री नहीं होतीं, वे संवेदना के विस्तार, अनुभव की समृद्धि और रचनात्मक संवाद के नए अवसर भी उपलब्ध कराती हैं। तुषार जी का यह आत्मीय उपक्रम मेरे लिए केवल पुस्तकों की प्राप्ति नहीं, बल्कि समकालीन नवगीत की विविध प्रवृत्तियों, उसके रचनात्मक सरोकारों और उसकी संवेदनात्मक उपलब्धियों से परिचित होने का एक महत्त्वपूर्ण अवसर भी था। इस साहित्यिक सौजन्य ने मुझे सचमुच समृद्ध किया। इसके लिए तुषार जी के प्रति मेरी आत्मीय कृतज्ञता है।

         तुषार जी के नवगीत-संग्रहों में से एक साहित्य भंडार से प्रकाशित ‘मेड़ों पर वसंत’ को पढ़ते हुए नवगीत की रचनात्मक शक्ति, उसकी संवेदनात्मक व्यापकता और समकालीन जीवन से उसके संबंधों पर विचार करने का अवसर मिला। प्रस्तुत आलेख में इसी संग्रह के बहाने नवगीत की प्रकृति, उसकी अभिव्यक्ति-क्षमता और तुषार जी की रचनात्मक विशिष्टताओं को समझने का प्रयास किया गया है। मेरा विश्वास है कि किसी कृति का मूल्यांकन केवल उसके विषयों की पहचान या कुछ सुंदर पंक्तियों की प्रशंसा से पूरा नहीं होता, बल्कि उसके लिए उन अनुभव-सूत्रों तक पहुँचना आवश्यक है, जिनसे रचना का आंतरिक व्यक्तित्व निर्मित होता है।

           भाई जयकृष्ण राय तुषार का नवगीत-संग्रह ‘मेड़ों पर वसंत’ पढ़ते हुए सबसे पहले यह बात ध्यान में आती है कि नवगीत की शक्ति उसकी गेयता में अवश्य है, लेकिन उसका समूचा व्यक्तित्व केवल गेयता से निर्मित नहीं होता। उसके भीतर अनुभव की प्रामाणिकता, संवेदना की गहराई, भाषा की सहजता, बिंबों की नवीनता, जीवन के प्रति दृष्टिकोण और समय की पहचान भी आवश्यक है। जब नवगीत इन तत्त्वों के साथ अपने समय से संवाद करता है, तब वह निजी अनुभूति की सीमाओं को पार करके सामाजिक अनुभव का हिस्सा बन जाता है। जयकृष्ण राय तुषार के नवगीत-संग्रह ‘मेड़ों पर वसंत’ को इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह संग्रह एक ओर हिंदी गीत-परंपरा की सांस्कृतिक स्मृतियों और प्रकृति-सौंदर्य से जुड़ता है, तो दूसरी ओर समकालीन जीवन की विडंबनाओं, श्रमशील मनुष्य की पीड़ा, राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक विघटन, पर्यावरणीय संकट और मनुष्य की जिजीविषा को अपनी अभिव्यक्ति का विषय बनाता है। इस दृष्टि से संग्रह का महत्त्व केवल कुछ सुंदर और गेय रचनाओं के संकलन तक सीमित नहीं है; यह गीत की रचनात्मक संभावनाओं, उसके सामाजिक दायित्व और उसकी समकालीन प्रासंगिकता को भी रेखांकित करता है।

       जयकृष्ण राय तुषार हिंदी के सुपरिचित नवगीतकार हैं। उनका मूल नाम जयकृष्ण नारायण शर्मा है। उनका जन्म 1 जनवरी, 1969 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद के पसिका गाँव में हुआ। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से एम.ए. तथा एल-एल.बी. की शिक्षा प्राप्त की। गीत और ग़ज़ल के क्षेत्र में उनकी सक्रियता का प्रमाण उनके प्रकाशित गीत-संग्रह ‘सदी को सुन रहा हूँ मैं’, ‘कुछ फूलों के कुछ मौसम के’ और ‘मेड़ों पर वसंत’ हैं। उनकी रचनाएँ देश की अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं हैं। बी.बी.सी. हिंदी पत्रिका, साहित्य अकादेमी और भारतीय ज्ञानपीठ सहित विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थाओं के साझा संकलनों में भी उनके गीतों और ग़ज़लों को स्थान मिला है। इंटरनेट पर ‘छान्दसिक अनुगायन’ ब्लॉग के माध्यम से वे छंदोबद्ध काव्य की परंपरा से जुड़े पाठकों के बीच भी सक्रिय रहे हैं। उनकी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने उन्हें वर्ष 2017 में बलवीर सिंह ‘रंग’ सर्जना पुरस्कार से सम्मानित किया। वर्ष 2019 में कविता के माध्यम से मतदाता जागरूकता के लिए उत्तर प्रदेश चुनाव आयोग द्वारा भी उन्हें प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया गया है। साहित्य-सृजन के साथ उनका पेशेवर जीवन विधि के क्षेत्र से जुड़ा है। वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में कार्यरत रहे हैं और अधिवक्ता परिषद के आजीवन सदस्य हैं। नवगीत के प्रति उनकी प्रतिबद्धता, छंद के प्रति अनुराग तथा समकालीन जीवनानुभवों को गीतात्मक अभिव्यक्ति देने की प्रवृत्ति उन्हें हिंदी नवगीत की परंपरा में एक उल्लेखनीय रचनाकार के रूप में स्थापित करती है।

         प्रस्तुत संग्रह ‘मेड़ों पर वसंत’ के शीर्षक में ही कवि की संवेदना का एक महत्त्वपूर्ण संकेत निहित है। वसंत सामान्यतः प्रकृति के उल्लास, नवीनता, प्रेम, सौंदर्य और जीवन के पुनरुत्थान का प्रतीक माना जाता है। किंतु तुषार वसंत को किसी राजकीय उद्यान, महल के प्रांगण अथवा महानगरीय सौंदर्यबोध के सीमित परिसर में नहीं खोजते। वे उसे खेतों की मेड़ों पर प्रतिष्ठित करते हैं। मेड़ कृषि-संस्कृति का एक सामान्य किंतु अर्थवान प्रतीक है। वह खेतों को अलग भी करती है और उन्हें एक व्यापक कृषि-व्यवस्था का अंग भी बनाए रखती है। वह श्रम, स्वामित्व, सीमाओं, ग्रामीण जीवन और प्रकृति के साथ मनुष्य के संबंधों की साक्षी भी बनी रहती है। मेड़ों पर वसंत का आना इस बात का संकेत है कि जीवन का वास्तविक उल्लास उन स्थानों पर भी उपस्थित है, जिन्हें आधुनिक सभ्यता की दृष्टि प्रायः साधारण और उपेक्षणीय मानकर छोड़ देती है। शीर्षक का दूसरा महत्त्व इस बात में है कि यहाँ वसंत केवल ऋतु नहीं, एक संभावना है। वह अभावों के बीच प्रसन्नता खोजने, उजड़ते परिवेश में हरियाली की कल्पना करने और निराशा के भीतर भविष्य के लिए जगह बचाए रखने की रचनात्मक प्रवृत्ति का प्रतीक बन जाता है। संग्रह की अनेक रचनाओं में फूल, पत्ते, मेड़, नदी, झील, बादल, वंशी, चाँदनी, हरापन और मौसम जैसे शब्द बार-बार आते हैं। किंतु इनका प्रयोजन केवल प्राकृतिक दृश्य उपस्थित करना नहीं है। इनके माध्यम से कवि मनुष्य के भीतर बचे हुए सौंदर्यबोध और जीवन की पुनर्निर्माणकारी शक्ति को पहचानने का प्रयास करता है। इसीलिए ‘मेड़ों पर वसंत’ को केवल प्रकृति-केंद्रित गीत-संग्रह कहना उसके अर्थ-विस्तार को सीमित करना होगा। यह प्रकृति के माध्यम से मनुष्य और मनुष्य के माध्यम से समय को पढ़ने का प्रयास भी है।

        जयकृष्ण राय तुषार अपने आमुख में लिखते हैं, “गीत नहीं मरता है साथी, लोकरंग में रहता है।” इस कथन को संग्रह की रचनात्मक चेतना की आधारभूमि माना जा सकता है। कवि के लिए गीत मनुष्य की सहज अभिव्यक्ति, उसकी स्मृतियों, सामूहिक अनुभवों और जीवन की लय से जुड़ा हुआ है। मनुष्य के श्रम, उत्सव, प्रेम, विरह, संघर्ष और विश्वास के साथ गीत का संबंध इतना पुराना है कि किसी साहित्यिक वर्गीकरण के आधार पर उसकी जीवन्तता का निर्णय नहीं किया जा सकता। तुषार का विश्वास है कि गीत की वास्तविक शक्ति उसकी लोक-संपृक्ति में है। लोक से उसका तात्पर्य केवल ग्रामीण जीवन, लोकभाषा अथवा पारंपरिक उत्सवों के चित्रण से नहीं है; लोक वह व्यापक मानवीय संसार है, जिसमें साधारण मनुष्य के सुख-दुःख, आशाएँ, असफलताएँ और संघर्ष शामिल हैं। आमुख में कवि गीत को “ठिठुरते आदमी की अँगीठी”, “प्यासे के लिए मीठे जल की झील” और “जीवन की अँधेरी सुरंगों में जलती हुई मशाल” कहता है। इन रूपकों में गीत के सौंदर्यात्मक और सामाजिक, दोनों पक्षों की पहचान की जा सकती है। अँगीठी ठंड से राहत देती है, झील प्यास बुझाती है और मशाल अँधेरे में रास्ता दिखाती है। इस प्रकार गीत का कार्य केवल मन को आनंदित करना नहीं, बल्कि जीवन की कठिन परिस्थितियों में मनुष्य को भावनात्मक ऊर्जा और आश्वस्ति प्रदान करना भी है। यह गीत के प्रति कवि की आस्था है, लेकिन इस आस्था को केवल विधागत आग्रह मानकर छोड़ देना उचित नहीं होगा। संग्रह की कई रचनाएँ इस विश्वास को अपनी विषयवस्तु और संवेदना के स्तर पर प्रमाणित भी करती हैं।

         यहाँ एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि गीत के प्रति कवि की प्रतिबद्धता नई कविता के प्रति किसी एकांगी विरोध पर आधारित नहीं होनी चाहिए। आमुख में तुषार स्वीकार करते हैं कि नई कविता का तिलस्म उन्हें प्रभावित नहीं कर पाया। यह उनका निजी काव्यात्मक चुनाव है। साहित्यिक दृष्टि से गीत और नई कविता को परस्पर विरोधी ध्रुवों के रूप में देखने के बजाय उनकी भिन्न अभिव्यक्ति-प्रणालियों और संभावनाओं को समझना अधिक उपयोगी होगा। मुक्तछंद में भी लय, संवेदना और सांगीतिकता के अनेक रूप संभव हैं और गीत में भी विचार, विडंबना तथा जटिल जीवनानुभवों की अभिव्यक्ति की पूरी संभावना रहती है। इसलिए गीत की श्रेष्ठता का प्रमाण केवल इस तथ्य में नहीं है कि वह गीत है, बल्कि इस बात में है कि वह अपने अनुभव को कितनी प्रामाणिकता, कलात्मकता और प्रभावशीलता के साथ व्यक्त करता है। ‘मेड़ों पर वसंत’ का मूल्यांकन भी इसी कसौटी पर अधिक सार्थक होगा।

         मेड़ों पर वसंत’ के संदर्भ में संग्रह के आमुख का महत्त्व अलग से रेखांकित करने योग्य है। आमुख में कवि ने गीत के स्वरूप, उसकी लोक-संपृक्ति, सामाजिक दायित्व, परंपरा और प्रयोग पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। यह केवल औपचारिक भूमिका नहीं है; यह संग्रह की रचनात्मक मान्यताओं का परिचय भी देती है। गीत को खुरदरी जमीन पर चलने की आवश्यकता, समकालीन विषयवस्तु को ग्रहण करने का आग्रह और महलों की नायिका के साथ श्रमशील स्त्री के सौंदर्य को पहचानने की बात कवि की व्यापक साहित्यिक दृष्टि को सामने लाती है। आमुख में व्यक्त यह विश्वास कि “गीत कभी मरता नहीं गीत कभी डरता नहीं” संग्रह के लिए एक प्रकार का रचनात्मक घोष भी है। गीत का न मरना उसकी ऐतिहासिक निरंतरता का संकेत है, जबकि उसका न डरना उन अनुभवों से जुड़ने की क्षमता का, जिन्हें व्यक्त करना आसान नहीं होता। किंतु गीत की जीवन्तता को सुनिश्चित करने के लिए केवल विश्वास पर्याप्त नहीं है। उसे नए अनुभवों, नई भाषिक संरचनाओं, सामाजिक यथार्थ की गहरी पहचान और आलोचनात्मक संवाद की आवश्यकता बनी रहती है। तुषार स्वयं अच्छे आलोचकों और नए कवियों की आवश्यकता स्वीकार करते हैं। इस प्रकार उनका आमुख गीत की प्रशंसा के साथ उसके भविष्य के लिए आवश्यक शर्तों की ओर भी संकेत करता है। 

          आमुख में कवि यह भी कहता है कि गीतों में समय-समय पर प्रयोग हुए हैं, लेकिन कुछ सार्थक और कुछ केवल चमत्कारी रहे हैं। यह टिप्पणी रचनात्मकता के एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न को सामने लाती है। प्रयोग का उद्देश्य केवल नवीनता का प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। यदि भाषा, बिंब, छंद अथवा संरचना में किया गया परिवर्तन अनुभव को अधिक गहराई, सघनता और विशिष्टता प्रदान करता है, तभी वह सार्थक होता है। केवल अपरिचित शब्दों, असामान्य संयोजनों या चौंकाने वाले कथनों से रचना दीर्घजीवी नहीं बन जाती। दूसरी ओर परंपरा का पालन भी अपने आप में श्रेष्ठता की गारंटी नहीं है। परंपरा तभी जीवित रहती है, जब रचनाकार उसके भीतर नए अनुभवों के लिए जगह बनाता है। इसलिए ‘मेड़ों पर वसंत’ में तुषार परंपरा और प्रयोग के बीच एक संतुलन साधने का प्रयास करते हैं। वे गीत की गेयता, लोक-संपृक्ति और सांस्कृतिक स्मृति को महत्त्व देते हैं, लेकिन समकालीन विषयों से भी जुड़ते हैं। इस कारण उनके गीतों में एक ओर चाँद, वंशी, तितली, नदी और वसंत के परिचित बिंब हैं, तो दूसरी ओर वायरस, प्रवासी श्रमिक, पर्यावरणीय संकट और आधुनिक विकास जैसे विषय भी हैं। यह संयोजन संग्रह को वर्तमान समय से जोड़ता है। हालाँकि इस प्रक्रिया में कहीं-कहीं परिचित गीतात्मक बिंबों और नए सामाजिक कथ्य के बीच अधिक गहरे कलात्मक संबंध की आवश्यकता अनुभव होती है। जहाँ यह संबंध स्थापित हो जाता है, वहाँ गीत अधिक प्रभावी बनता है।

          यह संग्रह कवि का हिंदी गीत और नवगीत का तीसरा संकलन है। इससे यह संकेत मिलता है कि गीत उसके लिए आकस्मिक रचनात्मक आकर्षण नहीं, बल्कि दीर्घकालीन साहित्यिक साधना का क्षेत्र है। गीत-लेखन में निरंतरता का अपना महत्त्व है, क्योंकि इस विधा में अनुभव की परिपक्वता के साथ भाषा, लय, कथ्य और बिंबों के बीच संतुलन साधना पड़ता है। पारंपरिक गीत में भावप्रवणता और सांगीतिकता का जो महत्त्व रहा है, नवगीत ने उसके भीतर समकालीन जीवन की विसंगतियों, सामाजिक तनावों और बदलती संवेदनाओं को समाहित करने का प्रयास किया है। नवगीत का अर्थ केवल पुराने गीत में नए शब्द जोड़ देना नहीं है। वह अनुभव के नए भूगोल, सामाजिक यथार्थ की नई पहचान और अभिव्यक्ति की नई संरचना की माँग करता है। तुषार के इस संग्रह में पारंपरिक गीतात्मकता और समकालीन विषयवस्तु के बीच संबंध स्थापित करने का प्रयास स्पष्ट दिखाई देता है।

          संग्रह का अनुक्रम भी उसकी विषयगत विविधता का परिचय देता है। ‘टोकरी भरकर गुलाबी फूल लाऊँगा’, ‘मेड़ों पर वसंत’, ‘पानी के गीत सिर्फ गाती है’, ‘हरे धान के इन फूलों में’, ‘जंगल के फूल कहाँ’, ‘भारत की नारी’, ‘श्रमिकों के लिए’, ‘किससे कहे निमाड़’, ‘मजहब नहीं राष्ट्र से ऊपर’, ‘राष्ट्रधर्म से बड़ा नहीं कुछ’, ‘मोक्ष लिखता है रसूलाबाद’, ‘नदियों में कंचन मृग’, ‘पेड़ हरसिंगार के’, ‘फिर शांति अचंभित, विस्मित है’ और ‘यह पुण्य देवभूमि है’ जैसे शीर्षक एक ऐसे रचनाकार का परिचय देते हैं, जिसकी संवेदना किसी एक विषय अथवा भावभूमि तक सीमित नहीं है। प्रकृति, प्रेम, स्मृति, श्रम, राष्ट्रीयता, धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत, पर्यावरण, महामारी, सामाजिक विषमता और समकालीन संकट इस संग्रह के विभिन्न अनुभव-क्षेत्र हैं। इन विषयों के बीच कवि की आवाज कभी कोमल और आत्मीय होती है, कभी व्यंग्यात्मक और प्रश्नाकुल, कभी प्रतिरोधपूर्ण और कभी आशावादी। इस विविधता को संग्रह की शक्ति के रूप में देखा जा सकता है, किंतु इसके साथ एक रचनात्मक चुनौती भी जुड़ी है। इतने अलग-अलग विषयों को एक ही गीतात्मक संवेदना में समाहित करना आसान नहीं होता। प्रेम और प्रकृति के गीतों में जिस कोमलता तथा सांकेतिकता की आवश्यकता है, सामाजिक संकट और राष्ट्रीय प्रश्नों से जुड़े गीतों में वैसी ही अभिव्यक्ति पर्याप्त नहीं होती। वहाँ कथ्य की स्पष्टता, विचार की प्रामाणिकता और परिस्थितियों की विशिष्ट पहचान अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है। इस संग्रह में तुषार अनेक स्थानों पर इन भिन्न आवश्यकताओं के अनुरूप अपनी भाषा और स्वर को बदलते हैं। कहीं वे फूलों, तितलियों, चाँदनी और वंशी के माध्यम से बोलते हैं, तो कहीं श्रमिकों की विवशता, सूखती नदियों, उजड़ते जंगलों और हिंसा से आहत मानवता के प्रश्नों को सीधे सामने रखते हैं।

       इस संग्रह में प्रकृति के साथ लोकजीवन का संबंध अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। ‘मेड़ों पर वसंत’ में लोक केवल ग्रामीण परिवेश का पर्याय नहीं, बल्कि एक ऐसी सांस्कृतिक संरचना है, जिसमें श्रम, भाषा, संगीत, ऋतुचक्र, घरेलू संबंध और सामूहिक स्मृतियाँ एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। लोक का अर्थ किसी काल्पनिक निष्कलुष संसार से भी नहीं है। गाँव में सौंदर्य है तो संघर्ष भी है; आत्मीयता है तो विषमता भी; सामुदायिकता है तो स्वार्थ और वर्चस्व के रूप भी। तुषार के गीतों में लोक का उज्ज्वल पक्ष अधिक प्रमुख है, लेकिन जहाँ वे श्रमिकों, विस्थापन और पर्यावरणीय संकट की चर्चा करते हैं, वहाँ लोकजीवन की कठिन वास्तविकताओं की ओर भी संकेत मिलता है। ‘श्रमिकों के लिए’ इस संग्रह की सर्वाधिक उल्लेखनीय सामाजिक रचनाओं में से एक है। कवि लिखता है—


“अभी शहर से गाँव जा रहे 

हर मुश्किल से लड़ने बाबू ! 

ख़त लिखना फिर आ जाएंगे 

देश की मूरत गढ़ने बाबू !”

       इन पंक्तियों में प्रवासी श्रमिकों की स्थिति का चित्रण है। शहर से गाँव की ओर लौटता श्रमिक केवल अपने घर लौटने वाला व्यक्ति नहीं है। वह उस आर्थिक व्यवस्था की असमानताओं का प्रतिनिधि है, जिसमें शहर के निर्माण और विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले लोगों के पास संकट के समय सुरक्षा का पर्याप्त आधार नहीं होता। श्रमिक शहर में पुल, चौराहे, सड़कें और भवन बनाता है; पत्थरों को काटता और तराशता है; ईंट, गारा और मिट्टी ढोता है। लेकिन जब संकट आता है, तो उसी शहर में उसका जीवन असुरक्षित हो जाता है।

यहाँ‘बाबू’ का संबोधन गीत का महत्त्वपूर्ण भाषिक उपकरण है। इसमें आत्मीयता है, लोकभाषा की सहजता है और संवाद का भाव भी है। कवि श्रमिकों के बारे में दूर बैठकर कोई औपचारिक टिप्पणी नहीं करता, बल्कि उनसे सीधे संवाद करता है। वह कहता है कि अभी वे गाँव जा रहे हैं, लेकिन फिर लौटेंगे और देश की मूरत गढ़ेंगे। इस कथन में श्रमिकों के श्रम के प्रति सम्मान है। देश की मूरत गढ़ने का रूपक राष्ट्रनिर्माण की सामान्य अवधारणा को वास्तविक श्रम से जोड़ता है। राष्ट्र केवल भूगोल, ध्वज, संविधान और राजनीतिक संस्थाओं से निर्मित नहीं होता; वह उन करोड़ों श्रमिकों के हाथों से भी बनता है, जिनका श्रम अक्सर सार्वजनिक स्मृति में पर्याप्त स्थान नहीं पाता। गीत में आगे कवि कहता है—


“पुल, चौराहे, सड़क बनाये 

हीरा काटे और तराशे, 

ईंटा, गारा, मिट्टी ढोए 

खाकर लाई, चना, बताशे।”

         इन पंक्तियों में श्रम का दृश्यात्मक चित्रण है। पुल और सड़कें आधुनिक विकास के प्रतीक हैं, जबकि लाई, चना और बताशे श्रमिक के सीमित भोजन और अभावपूर्ण जीवन की ओर संकेत करते हैं। एक तरफ वह शहर की भौतिक संरचना का निर्माण करता है, दूसरी तरफ उसका अपना जीवन न्यूनतम आवश्यकताओं पर निर्भर है। यहाँ विकास की चमक और श्रमिक की वास्तविक स्थिति के बीच का अंतर सामने आता है।

आगे कवि लिखता है कि श्रमिक भूखे-नंगे धूप में निकले हैं, मानवता को पढ़ने के लिए। यह अभिव्यक्ति श्रमिकों की विवशता को मानवीय प्रश्न में बदल देती है। श्रमिकों का पलायन केवल आर्थिक घटना नहीं है; वह समाज की मानवीय संवेदना की परीक्षा भी है। यदि कोई व्यवस्था अपने निर्माणकर्ताओं को संकट में अकेला छोड़ देती है, तो उसके विकास की नैतिकता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। इस गीत के अंतिम हिस्से में बीवी, बच्चे, बाप और मतारी का उल्लेख है। यह परिवार के उस संसार को सामने लाता है, जिसे श्रमिक अपनी जीविका की तलाश में पीछे छोड़ता है। बलिया, बक्सर और पटना जैसे स्थानों के उल्लेख से गीत में पूर्वांचल और बिहार के श्रम-प्रवास का भौगोलिक संदर्भ भी जुड़ता है। यह लोक-भाषिक और भौगोलिक विशिष्टता गीत को एक ठोस सामाजिक आधार देती है।

        ‘मेड़ों पर वसंत’ में श्रम और लोकजीवन का यह सम्मान गीत के व्यापक मानवीय दृष्टिकोण से जुड़ता है। कवि अपने आमुख में कहता है कि आज के गीत को महलों की नायिका के साथ मजदूरनी के श्रम-सौंदर्य का भी ज्ञान होना चाहिए। यह कथन गीत की विषयवस्तु के विस्तार की आवश्यकता को सामने लाता है। परंपरागत गीतों में नायिका, प्रकृति, प्रेम और विरह की केंद्रीय भूमिका रही है। नवगीत ने इस परंपरा को समाप्त किए बिना उसके दायरे में आम आदमी, श्रमिक, किसान, विस्थापित और उपेक्षित समुदायों को शामिल करने की कोशिश की है। तुषार का यह आग्रह इसी व्यापक परिवर्तन का हिस्सा है।

महत्त्वपूर्ण यह है कि श्रम-सौंदर्य को केवल बाहरी दृश्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। मजदूरनी के माथे का पसीना, उसके हाथों की कठोरता और काम करते शरीर की गति तभी व्यापक अर्थ ग्रहण करती है, जब कविता उसके श्रम की सामाजिक परिस्थितियों को भी पहचानती है। सौंदर्य और शोषण को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। यदि कविता श्रमशील स्त्री को केवल आकर्षक दृश्य में बदल दे, तो वह उसके जीवन की वास्तविकता को सीमित कर देगी। तुषार का आमुख इस खतरे से परिचित दिखाई देता है, क्योंकि वे गीत को खुरदरी जमीन पर चलने और जीवन के विविध पक्षों से जुड़ने की आवश्यकता पर बल देते हैं। संग्रह की सामाजिक रचनाएँ इस विचार को अलग-अलग स्तरों पर मूर्त रूप देती हैं।

       तुषार की गीतात्मकता में प्रेम का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। ‘जिसे देखा चाँद था’, ‘बँधी हुई पोथी सा मैं’, ‘हँसो मृगनयनी’, ‘चाँदनी निहारेंगे’, ‘अच्छा सा मौसम हो’ और ‘बंजारा टीले पर बाँसुरी बजाए’ जैसी रचनाओं में प्रेम, स्मृति, सौंदर्य और आत्मीयता के अनेक रूप दिखाई देते हैं। किंतु इन गीतों में प्रेम केवल दो व्यक्तियों के बीच का संबंध नहीं है। वह प्रकृति, संस्कृति, संगीत और स्मृति के साथ भी जुड़ता है। कवि के लिए प्रेम जीवन को अधिक संवेदनशील और अर्थपूर्ण बनाने वाली शक्ति है। ‘जिसे देखा चाँद था’ में कवि लिखता है—


“मन्दिरों की सीढ़ियों पर 

आ रहा है याद कोई। 

जिसे देखा चाँद था या 

चाँद का अनुवाद कोई।”

       यहाँ स्मृति का अनुभव एक दृश्य के माध्यम से सामने आता है। मंदिर की सीढ़ियाँ, सांध्य बेला, जोगन और फूलों के वन का वातावरण एक ऐसी भावभूमि बनाते हैं, जिसमें प्रेम और आध्यात्मिकता का हल्का-सा सम्मिलन है। ‘चाँद का अनुवाद’ विशेष रूप से ध्यान देने योग्य प्रयोग है। चाँद स्वयं सौंदर्य का एक परिचित प्रतीक है, लेकिन उसका अनुवाद किसी दूसरे रूप में सौंदर्य के पुनः अनुभव का संकेत देता है। गीत के अगले हिस्से में आरती के दिए जैसी जोगन सांध्य बेला, खिलखिलाते फूलों का वन और अकेला भौंरा दिखाई देते हैं। इन बिंबों में प्रकृति और सांस्कृतिक स्मृति का एक संयोजन है। ‘मौन सी हर बाँसुरी पर लिख गया अनुनाद कोई’ में ध्वनि और मौन का संबंध भी महत्त्वपूर्ण है। बाँसुरी मौन है, फिर भी उस पर कोई अनुनाद लिख गया है। यह प्रेम की स्मृति का रूपक हो सकता है, जहाँ अनुपस्थिति भी उपस्थिति की तरह अनुभव की जाती है। गीत का सौंदर्य इसी प्रकार के सूक्ष्म संकेतों में है।

         इस संग्रह में प्रेम का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष स्मृति है। ‘यादों में अब भी है’, ‘जिसे देखा चाँद था’, ‘चिट्ठियाँ पढ़ते हुए’ और ‘मेरी माँ थी’ जैसे शीर्षक इस बात की ओर संकेत करते हैं कि कवि के लिए अतीत केवल बीत चुका समय नहीं है। वह वर्तमान की भावनात्मक संरचना में सक्रिय रहता है। स्मृति मनुष्य को उसकी जड़ों से जोड़ती है, लेकिन वह वर्तमान को समझने का माध्यम भी बन सकती है। प्रेम और विरह की स्मृतियाँ, पारिवारिक संबंधों की यादें, पुराने परिवेश के दृश्य और समय के साथ बदलते जीवन की अनुभूतियाँ कविता में प्रवेश करके निजी अनुभव को साझा संवेदना में बदल देती हैं। ‘यादों में अब भी है’ के उपलब्ध अंश में कवि कहता है—


“सधे हुए होंठ मगर 

हाथों से छूट गई। 

कल मुझको सुनना 

ये वंशी तो टूट गई।”

        यहाँ वंशी का टूट जाना केवल किसी वाद्य का टूटना नहीं है। यह संवाद, संगीत अथवा किसी आत्मीय संबंध के टूटने का संकेत भी हो सकता है। सधे हुए होंठों के बावजूद वंशी का हाथ से छूट जाना बताता है कि अभिव्यक्ति की क्षमता होने पर भी परिस्थितियाँ हमेशा हमारे नियंत्रण में नहीं रहतीं। कल सुनने का आश्वासन और वर्तमान में वंशी का टूट जाना समय की अनिश्चितता को सामने लाता है। इसके बाद झीलों में नीलकमल खिलने और पत्तों में छिपी मैना मिलने की संभावना व्यक्त की गई है, लेकिन दिल से गाने वाली बुलबुल रूठ गई है। इस विरोध में प्रकृति का सौंदर्य और निजी भावनात्मक क्षति एक साथ उपस्थित हैं। इस गीत की विशेषता यह है कि कवि ने टूटन को प्रत्यक्ष विवरण के बजाय संगीत के बिंब के माध्यम से व्यक्त किया है। वंशी, बुलबुल और नीलकमल के बीच एक ऐसी भावभूमि निर्मित होती है, जिसमें अनुपस्थिति भी अर्थवान हो जाती है। हालाँकि गीत के समग्र संदर्भ के अभाव में इसके भावार्थ को किसी एक निश्चित घटना या संबंध से जोड़ना उचित नहीं होगा। उपलब्ध अंश के आधार पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि स्मृति और विछोह यहाँ प्रकृति की सुंदरता के समानांतर चलते हैं।

        ‘मेरी माँ थी’ शीर्षक भी अपने आप में गहरी भावात्मक संभावना रखता है। इस शीर्षक में ‘है’ के स्थान पर ‘थी’ का प्रयोग अनुपस्थिति और स्मृति के बीच एक सीधा संबंध बनाता है। माँ का होना सामान्यतः जीवन की एक सहज वास्तविकता है, किंतु उसके न रहने पर वही संबंध स्मृति, अभाव और आत्मीयता का स्थायी स्रोत बन जाता है। संग्रह में इस शीर्षक की उपस्थिति बताती है कि कवि की संवेदना सार्वजनिक प्रश्नों के साथ निजी जीवन के सबसे अंतरंग संबंधों की ओर भी उन्मुख है।       

        संग्रह की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि कवि अपने समय के सार्वजनिक प्रश्नों से मुँह नहीं मोड़ता। राष्ट्रीयता, धर्म, जाति, युद्ध, शांति, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक विरासत जैसे विषयों पर लिखना आसान नहीं है, क्योंकि इन विषयों में कविता के विचार और उसकी कलात्मकता के बीच संतुलन बनाए रखना पड़ता है। राष्ट्र और धर्म से संबंधित गीतों में कवि का स्वर अपेक्षाकृत स्पष्ट, प्रत्यक्ष और उद्घोषात्मक है। यहाँ वह सांकेतिकता की अपेक्षा सीधे संबोधन और कथन को प्राथमिकता देता है। इसे उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता के रूप में देखा जा सकता है, किंतु साथ ही यह प्रश्न भी उठता है कि ऐसी रचनाओं में काव्यात्मक जटिलता और विचार की बहुस्तरीयता किस सीमा तक सुरक्षित रह पाती है। ‘राष्ट्रधर्म से बड़ा नहीं कुछ’ में कवि कहता है—


“राष्ट्रधर्म से बड़ा नहीं कुछ 

मत बेचो ईमान को। 

जाति-धर्म से उपर उठकर 

बदलो हिन्दुस्तान को।”

       इन पंक्तियों में राष्ट्रीयता का संबंध नैतिकता और सामाजिक परिवर्तन से जोड़ा गया है। ईमान को न बेचने का आग्रह बताता है कि कवि के लिए राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता केवल भावनात्मक उद्घोष नहीं, नैतिक आचरण का प्रश्न भी है। जाति और धर्म से ऊपर उठने की बात सामाजिक विभाजन के विरुद्ध जाती है। इस दृष्टि से गीत का मूल आग्रह सामूहिकता, ईमानदारी और राष्ट्रीय एकता का है। यहाँ ‘राष्ट्रधर्म’ की अवधारणा को उसके व्यापक नैतिक अर्थ में समझना आवश्यक है। राष्ट्र के प्रति दायित्व का अर्थ केवल राष्ट्र की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के अधिकारों, गरिमा, विविधता और न्याय की रक्षा करना भी है। जाति और धार्मिक पहचान से ऊपर उठने का आह्वान तभी अपनी पूरी अर्थवत्ता प्राप्त करता है, जब राष्ट्र की कल्पना किसी एक समुदाय अथवा एकरूप सांस्कृतिक पहचान तक सीमित न रहकर सभी नागरिकों के साझा जीवन का आधार बने। गीत में गंगा की धारा में विष न घोलने की बात इस संदर्भ में एक सांस्कृतिक रूपक बन जाती है। गंगा जीवनदायिनी परंपरा का प्रतीक है, जबकि विष सामाजिक विद्वेष, घृणा और विघटन का संकेत दे सकता है।

          ‘वह राम विजय ही पाएगा’ गीत में रामकथा के सांस्कृतिक आख्यान को नैतिक आदर्श के रूप में ग्रहण किया गया है—


“रावण कितना बलशाली हो 

हर युग में मारा जाएगा। 

जिसका चरित्र उज्ज्वल होगा 

वह स्वयं राम हो जाएगा।”

        यहाँ राम और रावण केवल पौराणिक पात्र नहीं हैं। वे नैतिकता और अनैतिकता, मर्यादा और अहंकार, करुणा और अत्याचार के प्रतीक बनते हैं। कवि की दृष्टि में रामत्व किसी वंश, पद अथवा सत्ता से प्राप्त होने वाली स्थिति नहीं, बल्कि चरित्र और आचरण से अर्जित होने वाला मूल्य है। इसी कारण वह आगे कहता है कि राम सिंहासन का परित्याग करते हैं, अपहरण नहीं करते; वे केवट से विनती करके गंगा पार उतरते हैं। इन प्रसंगों के माध्यम से राम के चरित्र में विनम्रता, मर्यादा और साधारण मनुष्य के प्रति सम्मान को महत्त्व दिया गया है। इस गीत की सबसे महत्त्वपूर्ण पंक्ति है—


“जो सबका आँसू पोछेगा 

वह राम विजय ही पाएगा।”

        यहाँ राम की विजय को राजनीतिक अथवा सैन्य विजय तक सीमित नहीं रखा गया। उसका आधार करुणा, सेवा और मानवीय संवेदना है। जो व्यक्ति दूसरों के दुःख को समझता है और उनके आँसू पोंछने का प्रयास करता है, वही नैतिक अर्थ में रामत्व का अधिकारी है। इस प्रकार धार्मिक-सांस्कृतिक प्रतीक को कवि सामाजिक आचरण की कसौटी में बदल देता है। यह रूपांतरण गीत की सार्थक उपलब्धि है।

         तुषार के राष्ट्रीय चेतना से जुड़े गीतों में शांति और युद्ध का प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण है। ‘फिर शांति अचंभित, विस्मित है’ में कवि लिखता है—


“जागो भारत के भरतपुत्र 

सरहद पर कर दो शंखनाद। 

फिर शांति अचम्भित, विस्मित है 

फिर मानवता के घर विषाद।”

       गीत में शंखनाद का प्रयोग युद्ध अथवा संकट के समय सामूहिक चेतना को जाग्रत करने वाले प्रतीक के रूप में किया गया है। शांति का अचंभित और विस्मित होना एक विरोधाभासी दृश्य रचता है। सामान्यतः शांति स्थिरता, सुरक्षा और सह-अस्तित्व का संकेत है, किंतु यहाँ वह हिंसा के सामने असहाय दिखाई देती है। बामियान के बुद्ध, स्त्रियों और बच्चों की लाचारी का उल्लेख करते हुए कवि युद्ध की अमानवीयता को सामने लाता है। यहाँ एक वैचारिक तनाव भी मौजूद है। एक ओर गीत मानवता के विरुद्ध हिंसा का विरोध करता है, दूसरी ओर शंखनाद और वीरता के प्रतीकों के माध्यम से प्रतिरोध का आह्वान करता है। इस तनाव को विरोधाभास कहकर खारिज कर देना उचित नहीं होगा। शांति का अर्थ अन्याय के सामने निष्क्रिय रहना नहीं है और प्रतिरोध का अर्थ अनिवार्यतः हिंसा का समर्थन करना भी नहीं है। गीत के अंतिम हिस्से में कवि शिवाजी, राणा और दाहिर की महिमा को स्मरण करने का आह्वान आता है। यहाँ ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को साहस और प्रतिरोध की परंपरा के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है। 

        ‘आज़ादी का पर्व बड़ा है’, ‘बापू! रहे हिमालय’, ‘केसर का एक फूल लाना’, ‘अब बारूदी गन्ध न महके’ और ‘उस भारत का अभिनन्दन है’ जैसे शीर्षक संग्रह के इसी राष्ट्रीय-सांस्कृतिक पक्ष को विस्तार देते हैं। इन रचनाओं के पूरे पाठ के अभाव में इनके कथ्य का विस्तृत मूल्यांकन नहीं किया जा सकता, किंतु शीर्षकों से स्पष्ट है कि कवि की चिंता राष्ट्र, स्वतंत्रता, शांति, स्मृति और सांस्कृतिक पहचान के विभिन्न आयामों से जुड़ी हुई है। यहाँ यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि राष्ट्रीयता किस सीमा तक मानवीयता, लोकतांत्रिक मूल्यों और विविधता के सम्मान के साथ जुड़ती है। उपलब्ध गीतों में जाति-धर्म से ऊपर उठने, ईमान न बेचने और सबके आँसू पोंछने की जो आकांक्षा व्यक्त हुई है, वह राष्ट्रीयता को एक नैतिक और मानवीय आधार प्रदान करती है।

        इस संग्रह में धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना का एक अलग रूप प्रयाग, काशी और नदी-सभ्यता से जुड़े गीतों में दिखाई देता है। ‘मोक्ष लिखता है रसूलाबाद’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। कवि कहता है—


“हर लहर पर मोक्ष लिखता 

है रसूलाबाद। 

मौन से बस मौन का 

होता यहाँ संवाद।”

       इन पंक्तियों में रसूलाबाद का नाम एक विशिष्ट सांस्कृतिक भूगोल का निर्माण करता है। प्रयाग और उसके आसपास का क्षेत्र नदी, मृत्यु, स्मृति, साधना, साहित्य और तीर्थ-परंपरा से जुड़ा हुआ है। यहाँ मोक्ष किसी दार्शनिक अवधारणा के रूप में ही नहीं, बल्कि नदी के तट पर विकसित जीवन-संस्कृति की स्मृति के रूप में भी उपस्थित है। लहरों पर मोक्ष लिखे जाने की कल्पना एक ऐसी प्रक्रिया का संकेत देती है, जिसमें जल निरंतर बहते हुए भी स्मृतियों और विश्वासों को अपने भीतर सँजोए रहता है। ‘मौन से बस मौन का होता यहाँ संवाद’ में मौन की पुनरावृत्ति एक विशेष वातावरण रचती है। यह ऐसा स्थान है, जहाँ अनुभव हमेशा शब्दों में व्यक्त नहीं होते। कुछ स्मृतियाँ, कुछ दुःख, कुछ धार्मिक अनुभूतियाँ और कुछ ऐतिहासिक अवशेष मौन के माध्यम से ही संप्रेषित होते हैं। आगे राख ओढ़े जिल्द में संस्मरणों के रहने, सुबह पुल के देखने और नाव पर सूरज के आने जैसे दृश्य प्रस्तुत किए गए हैं। यहाँ नगर का जीवन नदी के दैनिक दृश्य और सांस्कृतिक स्मृति के साथ जुड़ता है।

        इस गीत में ‘अदब के सिर पर मुकुट सा है इलाहाबाद’ का कथन प्रयाग की साहित्यिक परंपरा की ओर संकेत करता है। इलाहाबाद केवल धार्मिक तीर्थ नहीं, आधुनिक हिंदी साहित्य, पत्रकारिता, शिक्षा, स्वतंत्रता आंदोलन और बौद्धिक जीवन का भी एक महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा है। इस सांस्कृतिक बहुलता को पहचानना आवश्यक है, क्योंकि प्रयाग की पहचान केवल धार्मिक परंपरा से निर्मित नहीं हुई। उसके भीतर अनेक भाषाओं, विचारों, साहित्यिक आंदोलनों और सामाजिक अनुभवों की साझी विरासत भी है। गीत के अंतिम हिस्से में नदियों के मिलन, भक्ति के संगीत और कुंभ के प्राचीन आह्लाद का उल्लेख आता है। यहाँ प्रयाग की सांस्कृतिक पहचान नदी और तीर्थ के माध्यम से व्यक्त होती है। कुंभ को नगर का प्राचीनतम आह्लाद कहने में सामूहिक उत्सव और धार्मिक स्मृति का भाव है। इस प्रकार ‘मोक्ष लिखता है रसूलाबाद’ केवल धार्मिक आस्था का गीत नहीं, बल्कि एक नगर की बहुस्तरीय सांस्कृतिक पहचान को लयात्मक रूप देने का प्रयास भी है।

          इस संग्रह की एक विशेष उपलब्धि यह है कि कवि की सांस्कृतिक चेतना लोक और शास्त्र के बीच संवाद स्थापित करती है। विद्यापति, सूरदास और मीरा का स्मरण हो या वेद-मंत्र और पोथी का बिंब, कवि भारतीय साहित्यिक-सांस्कृतिक परंपरा को अपने गीतों के अनुभव-संसार में शामिल करता है। लेकिन परंपरा का रचनात्मक उपयोग तभी सार्थक होता है, जब वह वर्तमान अनुभव को अधिक अर्थवान बनाए। केवल परिचित नामों और प्रतीकों की उपस्थिति से कविता की सांस्कृतिक गहराई प्रमाणित नहीं होती। उनकी आवश्यकता और प्रसंगगत भूमिका भी महत्त्वपूर्ण होती है। तुषार की कई रचनाओं में यह संबंध सहज है, जबकि कुछ शीर्षकों और उपलब्ध अंशों में परंपरा का उपयोग अधिक उद्घोषात्मक अथवा स्मृतिपरक दिखाई देता है।

         तुषार के गीतों में भाषा का प्रश्न विशेष रूप से विचारणीय है। वे मुख्यतः सहज हिंदी, लोकप्रचलित शब्दों, ग्रामीण संबोधनों और सांस्कृतिक स्मृतियों का उपयोग करते हैं। ‘बाबू’, ‘मतारी’, ‘लाई-चना’, ‘मेड़’, ‘ओसारा’, ‘कजली’, ‘उबटन’, ‘मेंहदी’ और ‘वंशी’ जैसे शब्द गीतों को जीवन की ठोस जमीन से जोड़ते हैं। दूसरी ओर ‘वेदमंत्र’, ‘मोक्ष’, ‘राष्ट्रधर्म’, ‘मानवता’, ‘संजीवनी’ और ‘विकास’ जैसे शब्द उनके सांस्कृतिक तथा वैचारिक संसार का विस्तार करते हैं। इस शब्द-संसार में लोक और शास्त्र, गाँव और शहर, निजी भाव और सार्वजनिक विचार के बीच आवागमन बना रहता है। गीत की भाषा में सहजता का महत्त्व निर्विवाद है, लेकिन सहजता और सपाटपन एक ही बात नहीं हैं। अच्छी गीतात्मक भाषा वह है, जो सामान्य शब्दों से भी नया अनुभव पैदा कर सके। तुषार की कई रचनाओं में परिचित शब्द नए संबंधों के कारण अर्थपूर्ण बनते हैं। ‘चाँद का अनुवाद’, ‘धुन्ध की किताबें’, ‘नदिया के पानी के गीत’ और ‘निर्वसन पतझार’ जैसी अभिव्यक्तियों में इसी प्रकार की काव्यात्मक संभावना दिखाई देती है। दूसरी ओर जहाँ कवि सीधे निष्कर्षात्मक वाक्यों अथवा सामान्यीकृत कथनों का सहारा लेते हैं, वहाँ गीत का अनुभव कभी-कभी वक्तव्य के निकट पहुँच जाता है। यह अंतर नवगीत के मूल्यांकन में महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उसकी शक्ति विचार को केवल कह देने में नहीं, उसे एक विशिष्ट कलात्मक अनुभव में बदलने में निहित होती है। तुषार की भाषा का एक अन्य गुण उसकी गेयता है। गीत में लय केवल छंद की गणना अथवा तुकांत शब्दों की उपस्थिति से निर्मित नहीं होती। वह वाक्य-रचना, शब्दों के उच्चारण, विराम, ध्वनि-संयोजन और भाव के आरोह-अवरोह से भी बनती है। ‘टोकरी भरकर गुलाबी फूल लाऊँगा’, ‘मेड़ों पर वसंत का मौसम स्वप्न सजाता है’ और ‘राष्ट्रधर्म से बड़ा नहीं कुछ’ जैसी पंक्तियों में कथ्य की स्पष्टता और लयात्मकता का संबंध सहज दिखाई देता है। इनमें ऐसे पदबंध हैं, जिन्हें पढ़ते समय स्वर का स्वाभाविक उतार-चढ़ाव अनुभव किया जा सकता है। गीत की यह मौखिकता उसे पाठ के साथ-साथ श्रवण का भी अनुभव बनाती है।

         ‘मेड़ों पर वसंत’ के संदर्भ में भाषा और संस्कृति के संबंध पर भी विचार आवश्यक है। हिंदी गीत की परंपरा में लोकभाषाओं, बोलियों और क्षेत्रीय अभिव्यक्तियों का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा है। गीत की भाषा में जो आत्मीयता और गेयता आती है, उसका संबंध केवल शब्दों की सरलता से नहीं, बल्कि उस जीवन-संसार से भी है, जिससे शब्द आए हैं। तुषार के गीतों में पूर्वांचल की बोलचाल, ग्रामीण संबोधन और लोकजीवन से जुड़े शब्द इस सांस्कृतिक संबंध को पुष्ट करते हैं। ‘बाबू’, ‘मतारी’, ‘लाई’, ‘चना’, ‘बताशे’ और ‘कजली’ जैसे शब्द पाठक को एक विशिष्ट लोक-संसार में ले जाते हैं। इस भाषिक संसार का महत्त्व यह है कि यह कविता को कृत्रिम साहित्यिकता से बचाता है। 

       तुषार की रचनाओं में बिंब-विधान का भी अपना महत्त्व है। बिंब कविता में केवल दृश्य उपस्थित नहीं करते, वे विचार और अनुभूति को मूर्त रूप देते हैं। ‘धुन्ध की किताबें’, ‘चाँद का अनुवाद’, ‘निर्वसन पतझार’, ‘हर लहर पर मोक्ष लिखना’, ‘बँधी हुई पोथी’ और ‘नदियों के जूड़े’ जैसे प्रयोगों में परिचित वस्तुओं को नए संबंधों में रखकर अर्थ उत्पन्न करने का प्रयास किया गया है। इनमें कहीं दृश्यात्मकता है, कहीं प्रतीकात्मकता और कहीं सांस्कृतिक स्मृति का सहारा। ‘नदियों के जूड़े’ और ‘तितली के पंख सजाने’ की कल्पना प्रकृति को स्त्री-सौंदर्य के रूपकों के माध्यम से प्रस्तुत करती है। यह भारतीय काव्य-परंपरा का परिचित तरीका है, जिसमें प्रकृति और मानवीय सौंदर्य एक-दूसरे के रूपक बन जाते हैं। किंतु आधुनिक संवेदना में यह प्रश्न भी उठता है कि क्या प्रकृति को केवल मानवीय शरीर और सौंदर्य के रूपकों में समझना पर्याप्त है? प्रकृति की अपनी स्वतंत्र सत्ता, उसकी पारिस्थितिक जटिलता और मनुष्य से परे उसका अस्तित्व भी महत्त्वपूर्ण है। तुषार के पर्यावरण-संबंधी गीत इस सीमा को कुछ हद तक संतुलित करते हैं, क्योंकि वहाँ प्रकृति केवल सौंदर्य का विषय नहीं, संकटग्रस्त जीवन-व्यवस्था भी है। 

         गीत में बिंबों की सार्थकता के साथ उनकी नवीनता का प्रश्न भी जुड़ा हुआ है। चाँद, तितली, फूल, वंशी, झील और बादल भारतीय काव्य-परंपरा में अत्यंत प्रचलित प्रतीक हैं। इनके प्रयोग से बचना आवश्यक नहीं है; प्रश्न यह है कि कवि इनके माध्यम से नया अनुभव कैसे पैदा करता है। पुराने बिंब भी नई संवेदना के कारण नए हो सकते हैं। दूसरी ओर, केवल अपरिचित शब्दों अथवा चमत्कारपूर्ण संयोजनों से कविता नवीन नहीं बन जाती। तुषार के गीतों में जहाँ बिंब जीवन की विशिष्ट परिस्थिति से जुड़ते हैं, वहाँ उनकी अर्थवत्ता अधिक स्पष्ट होती है। जहाँ परिचित बिंब केवल सौंदर्यात्मक वातावरण बनाने के लिए आते हैं, वहाँ वे अपेक्षाकृत पारंपरिक प्रभाव उत्पन्न करते हैं।

          इस संग्रह की एक बड़ी विशेषता उसका आशावादी जीवनबोध है। ‘टोकरी भरकर गुलाबी फूल लाऊँगा’, ‘हो न हो मौसम बदल जाये’, ‘छाँह लौटेगी हरापन भी’ और ‘वह राम विजय ही पाएगा’ जैसी रचनाओं में निराशा के बावजूद भविष्य के प्रति विश्वास दिखाई देता है। यह विश्वास अंधी सकारात्मकता नहीं है, क्योंकि कवि अपने समय की समस्याओं को भी पहचानता है। श्रमिकों का पलायन, सूखती नदियाँ, जंगलों का संकट, युद्ध, महामारी और सामाजिक विघटन उसके गीतों में उपस्थित हैं। किंतु वह इन समस्याओं को मनुष्य की नियति मानकर स्वीकार नहीं करता। उसके भीतर परिवर्तन की संभावना बची रहती है। 

          वस्तुतः आशा और यथार्थ का संबंध साहित्य में हमेशा जटिल रहा है। यदि आशा वास्तविक संकट को छिपाने का साधन बन जाए, तो वह रचना को सतही बना सकती है। इसके विपरीत यदि कविता केवल निराशा और विघटन का चित्रण करे, तो वह जीवन की पुनर्निर्माणकारी शक्तियों की उपेक्षा भी कर सकती है। तुषार का आग्रह इन दोनों स्थितियों के बीच संतुलन खोजने का है। उनके गीतों में पतझर के साथ वसंत, प्यास के साथ जल की स्मृति, टूटन के साथ संगीत और संकट के साथ संघर्ष की संभावना बनी रहती है। यही संतुलन उनके रचनात्मक व्यक्तित्व का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। इस संबंध में कवि अपने आमुख में लिखता हैं कि गीत को वसंत के साथ पतझर और सावन के साथ ग्रीष्म की तपिश का भी आत्मज्ञान होना चाहिए। यह कथन संग्रह के मूल्यांकन की एक उपयोगी कसौटी प्रदान करता है। जीवन केवल उत्सव नहीं है और न ही केवल दुःख। उसमें प्रसन्नता और पीड़ा, उपलब्धि और विफलता, मिलन और वियोग, आशा और संशय एक साथ उपस्थित रहते हैं। कविता की परिपक्वता इसी में है कि वह इनमें से किसी एक को संपूर्ण सत्य घोषित न कर दे। ‘मेड़ों पर वसंत’ का शीर्षक स्वयं इस संतुलन की ओर संकेत करता है। वसंत की उपस्थिति का अर्थ पतझर का निषेध नहीं है; वह पतझर के बाद भी जीवन की संभावना बने रहने का संकेत है। इसी संदर्भ में ‘फिर सोने की माटी होगी’ और ‘कहीं तो होगा हरापन’ जैसे शीर्षकों की अर्थवत्ता समझी जा सकती है। मिट्टी का सोना बनना केवल कृषि-समृद्धि का रूपक नहीं, बल्कि जीवन के पुनरुत्थान की आकांक्षा भी हो सकता है। हरापन केवल पत्तियों का रंग नहीं, बल्कि आशा, जीवन्तता और संवेदना का प्रतीक है। यदि संग्रह के अनेक गीतों में यह आशावादी प्रतीक-योजना दिखाई देती है, तो उसका कारण कवि की वह आस्था है, जो जीवन को केवल वर्तमान संकटों से परिभाषित नहीं करना चाहती। वह भविष्य के लिए भी जगह बचाए रखना चाहती है।

         ‘मेड़ों पर वसंत’ में स्मृति और वर्तमान का संबंध भी उल्लेखनीय है। संग्रह के कई गीतों में पुराने मौसम, छूटे हुए दृश्य, नदी-तट, गाँव, लोकगीत, पारिवारिक संबंध और सांस्कृतिक परंपराएँ वर्तमान के अनुभव को अर्थ प्रदान करती हैं। स्मृति का यह स्वर केवल अतीत के प्रति मोह नहीं है। वह वर्तमान में मौजूद अभावों को पहचानने का माध्यम भी है। जब कवि पूछता है कि सुबहें और शामें कहाँ चली गईं, जब वह नदियों के किनारे बदलते जीवन को देखता है या जब वह टूटती वंशी की स्मृति को व्यक्त करता है, तब अतीत वर्तमान के मूल्यांकन का आधार बन जाता है। लेकिन स्मृति का एक दूसरा पक्ष भी है। अतीत को हमेशा अधिक सुंदर और वर्तमान को अधिक कुरूप मान लेना भी एक प्रकार का भावनात्मक सरलीकरण हो सकता है। गाँव का जीवन केवल आत्मीयता और प्रकृति का संसार नहीं था; वहाँ अभाव, जातिगत असमानता, सामाजिक बंधन और अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ भी थीं। इसी तरह आधुनिक जीवन में केवल विघटन नहीं, स्वतंत्रता, शिक्षा, संचार और नए अवसरों की संभावनाएँ भी हैं। इसलिए स्मृति की रचनात्मक सार्थकता तब अधिक बढ़ती है, जब वह अतीत के सौंदर्य को स्वीकार करते हुए उसकी सीमाओं को भी पहचान सके। तुषार के संग्रह में लोक और प्रकृति के प्रति गहरा अनुराग है; इस अनुराग की आलोचनात्मक परिपक्वता इसी संतुलन से और समृद्ध हो सकती है।

         संग्रह में नगर और गाँव के संबंध को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। ‘मेड़ों पर वसंत’ का शीर्षक ग्रामीण परिवेश की ओर संकेत करता है, जबकि ‘मोक्ष लिखता है रसूलाबाद’ और ‘अच्छा सा मौसम हो’ जैसे गीतों में नगर, नदी-तट और सांस्कृतिक जीवन के दृश्य भी उपस्थित हैं। ‘श्रमिकों के लिए’ में गाँव और शहर के बीच प्रवास का प्रश्न है। इस प्रकार गाँव और शहर दो अलग-अलग, परस्पर असंबद्ध संसार नहीं हैं। श्रमिक गाँव से शहर जाता है, शहर का निर्माण करता है और संकट के समय गाँव लौटता है। शहर का विकास गाँव के श्रम पर निर्भर है, जबकि गाँव की अर्थव्यवस्था शहर से जुड़ी हुई है। यह परस्पर निर्भरता आधुनिक भारत के सामाजिक यथार्थ का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। इसलिए ‘मेड़ों पर वसंत’ को केवल ग्रामीण सौंदर्य का संग्रह नहीं कहा जा सकता। ग्रामीण बिंबों के भीतर आधुनिक विकास, पलायन, पर्यावरणीय संकट और सामाजिक असमानता के प्रश्न भी मौजूद हैं। कवि का लोकबोध तब अधिक व्यापक अर्थ ग्रहण करता है, जब उसे इस बदलती हुई सामाजिक संरचना के संदर्भ में पढ़ा जाए।

           तुषार के नवगीतों में विचार और भाव के संबंध का प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण है। गीत मूलतः भावप्रधान विधा मानी जाती रही है, लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि उसमें विचार की कोई स्वतंत्र भूमिका नहीं होती। श्रेष्ठ गीत में विचार भाव के भीतर इस तरह समाहित होता है कि वह किसी बाहरी उपदेश की तरह नहीं लगता। ‘पानी के गीत सिर्फ गाती है’ में नदी और प्यास का विरोध, ‘किससे कहे निमाड़’ में जंगल और पहाड़ का मौन तथा ‘श्रमिकों के लिए’ में शहर के निर्माणकर्ता श्रमिक की विवशता इसी प्रकार विचार को संवेदना में रूपांतरित करते हैं।


इसके विपरीत ‘राष्ट्रधर्म से बड़ा नहीं कुछ’ और ‘यह पुण्य देवभूमि है’ जैसी रचनाओं में विचार अधिक प्रत्यक्ष है। वहाँ कवि अपनी मान्यता को स्पष्ट रूप में सामने रखता है। प्रत्यक्ष कथन का भी साहित्य में महत्त्व है, विशेषतः तब जब गीत किसी सार्वजनिक अवसर, सामूहिक चेतना अथवा प्रेरक प्रसंग से जुड़ा हो। किंतु साहित्यिक मूल्यांकन की दृष्टि से यह देखना आवश्यक है कि कथन के भीतर कितना नया अनुभव है और वह किस सीमा तक पाठक की स्वतंत्र विचार-प्रक्रिया को सक्रिय करता है। संग्रह की सबसे प्रभावी रचनाएँ वे प्रतीत होती हैं, जिनमें कवि का विचार किसी दृश्य, वस्तु, परिस्थिति अथवा अनुभव के भीतर से उभरता है। ‘नदियों में कंचन मृग’, ‘पानी के गीत सिर्फ गाती है’, ‘पेड़ हरसिंगार के’ और ‘श्रमिकों के लिए’ में इस प्रवृत्ति के अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं। इन गीतों में पाठक को केवल निष्कर्ष नहीं दिया जाता; उसे एक स्थिति के सामने खड़ा किया जाता है, जिससे वह स्वयं अर्थ ग्रहण कर सके। दूसरी ओर उद्घोषात्मक गीतों में कथ्य की स्पष्टता अधिक है, लेकिन अर्थ की बहुस्तरीयता अपेक्षाकृत कम हो सकती है। संग्रह की विविधता को समझने के लिए इस अंतर को पहचानना आवश्यक है।

          तुषार के रचनात्मक व्यक्तित्व का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे गीत को साहित्यिक प्रतिष्ठा की प्रतिस्पर्धा से अलग करके देखने का आग्रह करते हैं। आमुख में उनका विश्वास है कि गीत आलोचना के षड्यंत्र का शिकार हुआ है और उसे अच्छे आलोचकों तथा नए कवियों की आवश्यकता है। इस कथन में गीत की उपेक्षा को लेकर एक असंतोष दिखाई देता है। हिंदी साहित्य के इतिहास में विभिन्न विधाओं और काव्य-आंदोलनों की प्रतिष्ठा समय-समय पर बदलती रही है। छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता, जनवादी कविता और नवगीत जैसी धाराओं के बीच वैचारिक तथा सौंदर्यात्मक मतभेद रहे हैं। लेकिन किसी विधा की उपेक्षा अथवा प्रतिष्ठा का प्रश्न केवल षड्यंत्र के आधार पर नहीं समझा जा सकता। गीत के प्रति आलोचना की उदासीनता जहाँ रही है, वहाँ उसे रचनात्मक और तर्कपूर्ण आलोचना के माध्यम से संबोधित करना आवश्यक है। गीत को अपनी उपलब्धियों का प्रमाण स्वयं अपनी रचनाओं से देना होगा। इसी प्रकार आलोचना को भी विधागत पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर गीत की संरचना, लय, भाषा, बिंब, विचार और सामाजिक अनुभव का मूल्यांकन करना चाहिए। तुषार का यह आग्रह कि गीत के लिए अच्छे आलोचकों और नए कवियों की आवश्यकता है, इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वह गीत की निरंतरता को साहित्यिक संवाद से जोड़ता है। सच है कि कोई भी विधा केवल अपने अतीत के गौरव से जीवित नहीं रहती; उसे वर्तमान में नए अनुभवों और नई अभिव्यक्ति-पद्धतियों के साथ सक्रिय रहना पड़ता है।

          संग्रह के शीर्षकों की विविधता भी इस दृष्टि की पुष्टि करती है। ‘टोकरी भरकर गुलाबी फूल लाऊँगा’ से आरंभ होकर ‘यह पुण्य देवभूमि है’ तक पहुँचने वाली रचनात्मक यात्रा में कवि का संसार लगातार बदलता है। कहीं फूल और सुगंध हैं, कहीं खेत और मेड़, कहीं नदी और प्यास, कहीं श्रमिक का विस्थापन, कहीं राम और राष्ट्र, कहीं प्रयाग की सांस्कृतिक स्मृति और कहीं युद्ध से आहत मानवता। यह विविधता केवल विषयों का विस्तार नहीं है; यह गीत के सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र को व्यापक बनाने का प्रयास भी है। इस संग्रह को पढ़ते हुए एक और प्रश्न सामने आता है कि नवगीत की समकालीनता किसमें निहित है। क्या समकालीन विषयों का उल्लेख कर देना पर्याप्त है, अथवा समकालीनता का संबंध जीवन को देखने की दृष्टि से भी है? किसी गीत में वायरस, शहर, विकास या प्रवासी श्रमिक का उल्लेख उसे स्वतः समकालीन नहीं बना देता। समकालीनता तब अधिक गहरी होती है, जब रचना वर्तमान जीवन की उन स्थितियों और अंतर्विरोधों को पहचानती है, जिनका प्रभाव मनुष्य की चेतना, संबंधों और व्यवहार पर पड़ता है। इस दृष्टि से ‘श्रमिकों के लिए’ और ‘किससे कहे निमाड़’ जैसे गीत उल्लेखनीय हैं, क्योंकि उनमें समकालीन संकट केवल विषय नहीं रहता, बल्कि जीवन-व्यवस्था के भीतर मौजूद विडंबना का रूप लेता है। संग्रह के प्रेम और प्रकृति के गीत भी समकालीन हैं, क्योंकि उनमें आज के मनुष्य की भावनात्मक स्थितियाँ, संबंधों की जटिलता और जीवन के बदलते अनुभव भी व्यक्त हुए हैं। आधुनिक जीवन की थकान, अकेलापन, असुरक्षा और आत्मीयता की तलाश को व्यक्त करने के लिए किसी नए तकनीकी शब्द की आवश्यकता नहीं है। चाँद, वंशी, झील और फूल जैसे पुराने प्रतीक भी वर्तमान अनुभव के वाहक बन सकते हैं। ‘अच्छा सा मौसम हो’ और ‘हो न हो मौसम बदल जाये’ जैसी रचनाओं में यह संभावना दिखाई देती है। यहाँ  आधुनिक जीवन की थकान के बीच सहज सौंदर्य और आत्मीयता की तलाश में समकालीनता भी निहित है।

           संग्रह की उपलब्धियों का समग्र आकलन करते हुए यह कहा जा सकता है कि इसकी पहली विशेषता विषयगत व्यापकता है। प्रकृति, प्रेम, श्रम, लोकजीवन, राष्ट्रीयता, पर्यावरण, धार्मिक-सांस्कृतिक स्मृति और सामाजिक संकट जैसे विषय इसमें एक साथ उपस्थित हैं। दूसरी विशेषता गीत के प्रति कवि की प्रतिबद्धता है, जो केवल छंद और तुक तक सीमित नहीं, बल्कि गीत की सांस्कृतिक तथा सामाजिक भूमिका से भी जुड़ी है। तीसरी विशेषता सहज भाषा और लोक-संपृक्ति है, जिसके कारण अनेक रचनाएँ पाठक के निकट आती हैं। चौथी विशेषता आशावादी जीवनबोध है, जो संकटों के बीच भी पुनर्निर्माण की संभावना खोजता है। पाँचवीं विशेषता यह है कि कवि गीत को केवल निजी भावुकता का माध्यम न मानकर समकालीन समाज के प्रश्नों से जोड़ना चाहता है। इन उपलब्धियों के साथ संग्रह की सीमाएँ भी हैं। कुछ रचनाओं में परिचित बिंबों और प्रतीकों की पुनरावृत्ति का प्रभाव दिखाई देता है। कुछ गीतों में विचार और निष्कर्ष इतने प्रत्यक्ष हो जाते हैं कि काव्यात्मक व्यंजना की संभावनाएँ सीमित हो जाती हैं। राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक गौरव से जुड़े कुछ कथनों में जटिल सामाजिक यथार्थ की अपेक्षा आदर्शीकरण अधिक दिखाई देता है। प्रकृति और प्रेम के कुछ बिंबों में नवीनता की अपेक्षा पारंपरिक गीतात्मकता प्रमुख रहती है। लेकिन इन सीमाओं को संग्रह के समग्र रचनात्मक प्रयत्न से अलग करके नहीं देखना चाहिए। वे उस व्यापक चुनौती का हिस्सा हैं, जिसका सामना प्रत्येक गीतकार को करना पड़ता है—परंपरा को बचाते हुए उसे नया बनाना, भाव को व्यक्त करते हुए विचार को समाहित करना और गेयता बनाए रखते हुए अनुभव की जटिलता को सुरक्षित रखना।

         ‘मेड़ों पर वसंत’ का वास्तविक महत्त्व इसी प्रयास में है। यह संग्रह गीत को किसी बीते हुए साहित्यिक समय की स्मृति बनाकर नहीं रखता, बल्कि उसे वर्तमान जीवन की अनेक स्थितियों से जोड़ने की कोशिश करता है। यहाँ मेड़ पर वसंत है, लेकिन उसी संसार में सूखी नदियाँ भी हैं; फूलों की सुगंध है, लेकिन जंगल में हिरनों की चीखें भी हैं; प्रेम की वंशी है, लेकिन श्रमिकों की विवश यात्रा भी है; राम की मर्यादा है, लेकिन युद्ध और हिंसा से आहत मानवता का प्रश्न भी है। इस तरह संग्रह में सौंदर्य और संकट, स्मृति और वर्तमान, लोक और आधुनिकता तथा आशा और विडंबना एक-दूसरे के समानांतर चलते हैं। 

           इस संग्रह को पढ़ते हुए यह भी अनुभव होता है कि गीत की जीवन्तता उसके विषयों की नवीनता से ही नहीं, बल्कि मनुष्य के प्रति उसकी संवेदनशीलता से निर्मित होती है। कोई रचना तभी सार्थक होती है, जब वह अपने समय की परिस्थितियों को पहचानने के साथ मनुष्य के भीतर बची हुई संभावनाओं को भी देख सके। तुषार का गीत-संसार इस विश्वास से संचालित है कि मनुष्य संकटों के बावजूद जीवन को सुंदर बनाने की इच्छा नहीं छोड़ता। वह फूल लाना चाहता है, हवा को सुगंधित करना चाहता है, टूटती वंशी के बावजूद संगीत की स्मृति बचाए रखना चाहता है और पतझर के बीच हरापन लौटने की संभावना पर विश्वास करना चाहता है। 

       समग्रता में देखें तो जयकृष्ण राय तुषार का यह संग्रह हिंदी नवगीत की उस परंपरा का प्रतिनिधि है, जो गीत की मूल सांगीतिकता और लोक-संपृक्ति को बनाए रखते हुए उसे समकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्नों से जोड़ने का प्रयास करती है। इसके गीतों में कहीं प्रकृति की कोमलता है, कहीं प्रेम की आत्मीयता, कहीं लोकजीवन की गंध, कहीं श्रमिक के श्रम का सम्मान, कहीं पर्यावरणीय संकट की चिंता और कहीं राष्ट्रीय-सांस्कृतिक चेतना का उद्घोष। इन सबके बीच कवि का मूल आग्रह जीवन के प्रति विश्वास बनाए रखने का है। यह विश्वास जीवन की कठिनाइयों को नकारने से नहीं, बल्कि उन्हें पहचानते हुए भी मनुष्य की रचनात्मक और नैतिक संभावनाओं को स्वीकार करने से निर्मित होता है। भाई तुषार का यह संग्रह इस बात की ओर संकेत करता है कि नवगीत की यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है तथा उसके सामने नए अनुभवों, नए बिंबों और नई संवेदनाओं की व्यापक दुनिया खुली हुई है। 

        इसलिए‘मेड़ों पर वसंत’ को पढ़ने के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण बात यही समझ में आती है कि वसंत केवल ऋतु का नाम नहीं है। वह मनुष्य के भीतर बची हुई उस शक्ति का नाम भी है, जो टूटन के बाद फिर जुड़ना चाहती है, सूखे के बाद फिर हरियाली की कल्पना करती है और अँधेरे के बीच भी प्रकाश की संभावना तलाशती है। जयकृष्ण राय तुषार अपने गीतों के माध्यम से इसी संभावना को बचाए रखने का प्रयास करते हैं। उनकी रचनाओं में जब मेड़ों पर वसंत आता है, तब वह केवल फूल नहीं खिलाता, वह लोक-स्मृति, श्रम-सम्मान, प्रेम, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय आशा के लिए भी जगह बनाता है। यही इस संग्रह की केंद्रीय संवेदना है और यही उसका सबसे स्थायी रचनात्मक संकेत भी।

सुप्रसिद्ध लेखक समीक्षक श्री रविनंदन सिंह जी 
अपनी कवयित्री जीवनसंगिनी श्रीमती पारुल सिंह के साथ 



                (रविनंदन सिंह)

नवगीत समीक्षा -सुप्रसिद्ध लेखक समीक्षक श्री रविनंदन सिंह

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