Monday, 18 September 2023

लोकभाषा गीत -मेलजोल बैठकी नदारद

चित्र साभार गूगल 


लोकसंस्कृति, गाँव की रौनक़, उत्सवजीविता को, लोकपरम्परा को याद करती लोकभाषा कविता.सादर अभिवादन सहित

एक लोकभाषा गीत -मेल -जोल बैठकी नदारद 

काटै दौड़इ साँझ, भोरहरी

बिना फूल कै डाल बा.

चिरई चुनमुन गायब होय गैं

बिना कमल के ताल बा.


मेल -जोल बैठकी नदारद

बिरहा, कजरी, कव्वाली

हलुवा, पूरी के प्रसाद से

वंचित डिह, माता काली

घर में टी वी चैनल, बाहर 

बिग बजार औ मॉल बा.


पान दान हुक्का संग छूटल

किस्सागोई माई कै

आभासी दुनिया में गुम हौ

चुहुल ननद भौजाई कै

कइसे मरल आँख कै पानी

ई सौ टका सवाल बा.


भजन न जोगी सारंगी कै

कुटिया, मठ सन्नाटा हौ 

पक्की सड़क बनल हौ लेकिन

कदम, कदम पर काँटा हौ

नेता डेंगूँ कहैँ धरम के

कवन देश कै हाल बा.


खट्टी, मीठी जामुन कै रंग

याद न महुवा बारी कै

पीली पीली सरसों भूलल

भूलल धान कियारी कै 

पइसा बढ़ल गरीबी गायब

पर उत्सव कंगाल बा.


बुलबुल, मैना, पपिहा, कोयल

लरिका ना पहिचानै ल

बाप -मतारी छोड़िके

कउनो रिश्ता ना ई जानै ल 

कहाँ ओसारे, कहाँ दुवारे

गैंता और कुदाल बा.


जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल 

Thursday, 14 September 2023

एक देशगान -आखिर कब तक

चित्र साभार गूगल 


मुंबई ब्लास्ट के बाद इस गीत का सृजन हुआ था लेकिन इसमें संशोधन के साथ दुबारा पोस्ट कर रहा हूँ

सादर

वन्देमातरम. जयहिंद. जय जवान 


सत्य अहिंसा के सीने पर वार सहेंगे आखिर कब तक


सत्य अहिंसा के

सीने पर

वार सहेंगे आखिर कब तक ?

हत्यारों का

इस धरती पर भार

सहेंगे आखिर कब तक ?


आतंकी गतिविधियों से

यह धरती

रोज कराह रही,

रावल पिंडी

बिजिंग पर अब 

जनता निर्णय चाह रही,

केसर की

क्यारी में ये

अंगार रहेंगे आखिर कब तक?


उठो बुद्ध

अब ऑंखें खोलो

हर दिन हार अहिंसा की है,

भस्म करो हे

महाकाल जो

शापित धरती हिंसा की है,

हम बन करके

बालू की मीनार

ढहेंगे आखिर कब तक?


रामायण के

लंका जैसी

दुश्मन की धरती को कर दो,

धरती से अम्बर

सागर तक

प्रलयंकारी ज्वाला भर दो,

दुश्मन के

सम्मुख हम सब

लाचार रहेंगे आखिर कब तक?

जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल 


हिंदी दिवस -हजारों मील समंदर के पार है हिंदी

चित्र साभार गूगल 


एक -ग़ज़ल -हजारों मील समंदर के पार है हिंदी 


हरेक बागे अदब में बहार है हिन्दी
कहीं गुलाब कहीं हरसिंगार है हिन्दी


ये रहीम, दादू और रसखान की विरासत है
कबीर सूर और तुलसी का प्यार है हिन्दी


फिजी, गुयाना, मॉरीशस में इसकी खुश्बू है
हजारों मील समन्दर के पार है हिन्दी


महक खुलूस की आती है इसके नग्मों से
किसी हसीन की वीणा का तार है हिन्दी


जयकृष्ण राय तुषार 




चित्र साभार गूगल



Saturday, 2 September 2023

एक ग़ज़ल -इसरो और भारत माता के नाम

आदित्य एल 1


बधाई इसरो-जय हनुमान

P. S. L. V C57 के जरिए आदित्य L1 सफलता पूर्वक लांच

भारतीय वैज्ञानिकों को बहुत बहुत बधाई


एक ग़ज़ल -इसरो और भारत माता के नाम 


अब चाँद भी मुट्ठी में हथेली पे गगन है

माँ भारती के साथ में इसरो को नमन है


इसरो के चमत्कार से हैरान है दुनिया

नासा से भी कम खर्च में सूरज का मिशन है 


आदित्य उड़ा शून्य में आदित्य को पढ़ने

फिर विश्व गुरु, सोने की चिड़िया ये वतन है


ये हिन्द महासागर हिमालय की है आभा

अध्यात्म संग विज्ञान का भी इसमें मिलन है


यह योग की, विज्ञान की, दर्शन की जमीं है

इस विश्व के मंगल के लिए यज्ञ हवन है


विक्रम, कलाम, भाभा, आर्यभट्ट यहीं के

संगीत, मंत्र सिद्ध ये देवों का चमन है 


आश्रम ने रचे मंत्र गुफाओं ने चतुर्वेद 

सतलज, कावेरी,नर्मदा ये गंगो जमन है

कवि -जयकृष्ण राय तुषार

वैज्ञानिक इसरो चीफ एस.सोमनाथ 



कवि जयकृष्ण राय तुषार

Friday, 1 September 2023

एक ग़ज़ल -नाकामी कहाँ रोक सकी रस्ता हुनर का

चित्र साभार गूगल 


एक ग़ज़ल -नाकामी कहाँ रोक सकी रस्ता हुनर का 

दरिया न इधर का मेरा दरिया न उधर का

अंजाम मग़र अच्छा था कश्ती में सफऱ का


मैं चाँद को मुट्ठी में लिए बैठा हूँ कब से

नाकामी कहाँ रोक सकी रस्ता हुनर का


सहरा है बहुत दूर तलक प्यास से कह दो

ये रेत चमकती हुई धोखा है नज़र का


इक शेर भी कह पाया नहीं आज तलक जो 

उस्ताद बना बैठा है गज़लों की बहर का


महफ़िल में सदारत भी निज़ामत भी उसी की

जो फ़र्क़ समझता ही नहीं ज़ेर ओ ज़बर का


हर हारे मुसाफिर का ये पीपल है ठिकाना

मौसम की किताबों में है अफ़साना शजर का 


सहमति के बिना मिलते हैं क्या खूब सियासत

अब कैसे भरोसा हो मियाँ इनकी ख़बर का


गावों में मेरे खिलते हैं गुड़हल भी कमल भी

जहरीली हवाएं लिए मौसम है नगर का 

कवि -जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल 


Wednesday, 30 August 2023

एक ग़ज़ल -किस्सागोई चाहिए अच्छे फ़साने के लिए

चित्र साभार गूगल 


एक ग़ज़ल -किस्सागोई चाहिए अच्छे फ़साने के लिए 


काटिए मत पेड़ बस्ती को बसाने के लिए
इक परिंदा चाहिए जंगल में गाने के लिए

किस कदर बेजान हैं बच्चे खिलौनों की तरह
फूल, तितली कुछ नहीं उनको हँसाने के लिए

कौन दरिया है जहाँ तूफ़ान का खतरा नहीं
डूबना पड़ता है डूबे को बचाने के लिए

साज, साजिन्दे, सियासत की तरह दिन में अलग
शाम को बैठेंगे सब ठुमरी सुनाने के लिए

आपसी रंजिश में पेड़ों से दहकते ये धुंए
आग का क्या काम है जंगल जलाने के लिए

प्यार, धोखा, जुर्म, रंजिश और तिलस्मी ही नहीं
किस्सागोई चाहिए अच्छे फ़साने के लिए

कितनी कोशिश करते हैं हम कैमरे के सामने
एक अच्छी सी कोई तस्वीर पाने के लिए

कवि -जयकृष्ण राय तुषार
चित्र साभार गूगल 


चित्र साभार गूगल 

Tuesday, 29 August 2023

एक गीत -गीत निराला के प्रयाग का गंगाजल है

दैनिक जागरण सप्तरंग पुनर्नवा पृष्ठ पर दिनांक 28-08-2023
को प्रकाशित गीत 

 
चित्र साभार गूगल 


एक ताज़ा गीत 


गीत निराला के प्रयाग का गंगाजल है


गीत वही

जो प्यासी -

ऋतु को सावन कर दे.

गंधहीन

फूलों में

भीनी खुशबू भर दे.


गीत सतपुड़ा

और नर्मदा 

की कल- कल है,

गीत

निराला के 

प्रयाग का गंगाजल है,

गीत वही

जो कृष्ण -

अधर पर वंशी धर दे.


गीत

प्रेम की नदी

परिंदो की उड़ान है,

संस्कार

उत्सव का यह

आदिम मकान है,

गीत विरह

ही नहीं

सरहदों पर भी स्वर दे.


गीत

वही जो तुलसी

विद्यापति गाते हैं,

गीत

वही जो

मीराबाई को भाते हैं,

गीत वही

जो बाल्मीकि

को पावन कर दे.


फागुन का

रंग जीवन की

उम्मीद गीत है,

बंजारों की 

हर मुश्किल में,

यही मीत है,

गीत

वही जो

भीमसेन सा जादू कर दे.

कवि -जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल 


Thursday, 24 August 2023

एक ताज़ा गीत -चंद्रयान 3 की सफलता पर

चित्र साभार गूगल 


चंद्रयान 3और इसरो के अद्भुत सफलता पर काव्यात्मक बधाई और शुभकामनायें


चाँद हमारी मुट्ठी में

जय बोलो हिंदुस्तान की.

भारत माता पुण्य भूमि है

ज्ञान और विज्ञान की.


पहले चंदा मामा थे

बस कविता और कहानी में,

दूर गगन में दिखते थे

या फिर झीलों के पानी में,

चन्द्रयान है बड़ी सफलता

इसरो के अभियान की.


अंतरिक्ष में भारत माँ का

गौरव गान तिरंगा है,

विजयी है वह जिसकी

आँखों में सपना सतरंगा है,

युग युग से यह पावन मिट्टी

ऋषियों के वरदान की.


मंगल, शनि के साथ सृष्टि की

गुत्थी हम सुलझायेंगे,

वेद मंत्र के साथ ग्रहों पर

जन गण मन भी गायेंगे,

हमने सीढ़ी भी तोड़ी है 

दुनिया के अभिमान की.

कवि जयकृष्ण राय तुषार



Monday, 14 August 2023

एक ग़ज़ल -कहीं से लौट के आऊँ


 

तिरंगा -जय हिन्द जय भारत वन्देमातरम 

एक पुरानी ग़ज़ल 

एक ग़ज़ल देश के नाम -

कहीं से लौट के आऊँ तुझी से प्यार रहे 


हवा ,ये फूल ,ये खुशबू ,यही गुबार रहे 

कहीं से लौट के आऊँ तुझी से प्यार रहे 


मैं जब भी जन्म लूँ गंगा तुम्हारी गोद रहे 

यही तिरंगा ,हिमालय ये हरसिंगार रहे 


बचूँ तो इसके मुकुट का मैं मोरपंख बनूँ 

मरूँ  तो नाम शहीदों में ये शुमार रहे 


ये मुल्क ख़्वाब से सुंदर है जन्नतों से बड़ा 

यहाँ पे संत ,सिद्ध और दशावतार रहे 


मैं जब भी देखूँ लिपट जाऊँ पाँव को छू लूँ 

ये माँ का कर्ज़ है चुकता न हो उधार रहे 


भगत ,आज़ाद औ बिस्मिल ,सुभाष भी थे यहीं 

जो इन्क़लाब लिखे सब इन्हीं के यार रहे 


आज़ादी पेड़ हरा है ये मौसमों से कहो 

न सूख पाएँ परिंदो को एतबार रहे 


तमाम रंग नज़ारे ये बाँकपन ये शाम 

सुबह के फूल पे कुछ धूप कुछ 'तुषार 'रहे 


कवि /शायर -जयकृष्ण राय तुषार 

चित्र -साभार गूगल 


चित्र -साभार गूगल -भारत के लोकरंग 


Saturday, 29 July 2023

गीत संग्रह -मेंड़ों पर वसंत


श्री पी. के. गिरी अपर महाधिवक्ता उत्तर प्रदेश शासन को
गीत संग्रह मेड़ों पर वसंत भेंट करते हुए 


शासकीय अधिवक्ता श्री आशुतोष संड जी को अपना
गीत संग्रह मेंड़ों पर वसंत भेंट करते हुए 


दो रचनाएँ करवा चौथ

  चित्र -गूगल से साभार  ये रचनाएँ दुबारा पोस्ट कर रहा हूँ सन २०१० में इन्हें पोस्ट कर चुका हूँ  एक आज करवा चौथ का दिन है आज करवा चौथ का दिन ...