Monday, 29 June 2020

एक गीत -मौसम में खुशबू है इतर और पान की



चित्र -साभार गूगल 

एक गीत -मौसम में खुशबू है इतर और पान की 

हाथों में 
मेहँदी है 
साड़ी शिफ़ान की |
मौसम में 
खुशबू है 
इतर और पान की |

रस्ते में
फिसलन है 
दिन है आषाढ़ का ,
नदियों का 
मंसूबा है 
शायद बाढ़ का ,
खेत में 
कछारों में 
हरियाली धान की |

घोंसले
बया के हैं
पेड़ हैं बबूलों के,
तन-मन
सब भींग रहे
वन,उपवन,फूलों के,
नाचते 
मयूरों से 
शोभा सिवान की |

हरे पेड़ 
उलझे हैं 
बिजली के तारों से ,
खिड़की के 
पाट खुले 
पुरवा बौछारों से ,

सोने की 
बाली फिर 
गुम दायें कान की |

गुड़हल के 
लाल ,पीत- 
फूल हैं कनेरों के ,
मेघों के 
घेरे में 
सूर्य हैं सवेरों के ,
रह -रह के 
बजती है 
पायल सीवान की |
कवि -जयकृष्ण राय तुषार 
चित्र -साभार गूगल 



12 comments:

  1. This comment has been removed by the author.

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 30 जून 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. बहुत खूब ,सादर नमन आपको

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  4. बहुत बढ़िया

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  5. सादर नमस्कार,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार
    (03-07-2020) को
    "चाहे आक-अकौआ कह दो,चाहे नाम मदार धरो" (चर्चा अंक-3751)
    पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है ।

    "मीना भारद्वाज"

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  6. बहुत सुंदर गीत।

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  7. सरस और मधुर ,लोक-मन से जुड़ी - पढ कर मन आनन्दित हुआ- आभार !

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  8. गुड़हल के
    लाल ,पीत-
    फूल हैं कनेरों के ,
    मेघों के
    घेरे में
    सूर्य हैं सवेरों के ,
    रह -रह के
    बजती है
    पायल सीवान की |
    बहुत ही सुंदर ,सादर नमन

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  9. भावों से ओत प्रोत बेहतरीन सृजन आदरणीय सर .

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