Saturday, 20 August 2022

एक गीत -हज़ारों फूल खिलते थे

चित्र साभार गूगल 


एक गीत -हजारों फूल खिलते थे


कोई भी

मूड,मौसम हो

मग़र हम साथ चलते थे.

यही वो रास्ते

जिन पर

हज़ारों फूल खिलते थे.


कहाँ संकोच से

नज़रें मिलाना

मुस्कुराना है,

कहाँ अब 

रूठने वाला कोई

किसको मनाना है,

यही मन्दिर था

जिसमें प्यार के

भी दिए जलते थे.


कहाँ अब

इत्र,खुशबू

तितलियों सा दिन सुहाना है,

कहाँ चेहरा

बदलकर

आईने का दिल लुभाना है,

यही ऑंखें थीं

जिनमें नींद

भी थी,ख़्वाब पलते थे.


कहाँ बज़रे पे

अब मौसम

कोई भी गीत सुनता है,

तुम्हारी

उँगलियों से

वक़्त अब स्वेटर न बुनता है,

कभी वो

चाँदनी,हम

रात तारों से निकलते थे

कवि -जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल 


12 comments:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (21-8-22} को "मस्तक का अँधियार हरो"(चर्चा अंक 4528) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    ------------
    कामिनी सिन्हा

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  2. सुंदर प्रस्तुति.

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    Replies
    1. हार्दिक आभार आपका.सादर अभिवादन

      Delete
  3. हजारों फूल खिलते थे।
    बहुत सुंदर प्रस्तुति।
    यही जीवन है जो खिलता -मुरझाता है

    ReplyDelete
  4. बहुत ही प्यारी सी कविता

    ReplyDelete

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