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| चित्र -साभार गूगल -पेंटिंग्स राजा रवि वर्मा |
एक गीत -
यादों में अब भी है मेहँदी जो छूट गई
सधे हुए
होंठ मगर
हाथों से छूट गई |
कल मुझको
सुनना
ये वंशी तो टूट गई |
कल शायद
झीलों में
नीलकमल खिल जाये ,
पत्तों में
छिपी हुई
मैना भी मिल जाये ,
दिल से जो
गाती थी
बुलबुल वो रूठ गई |
डायरी
तुम्हारी थी
शब्द चित्र मेरे हैं ,
धरती पर
अनगिन
रंग बाँटते सवेरे हैं ,
यादों में
अब भी है
मेहँदी जो छूट गई |
जीवन भर
भटके हम
फूलों के गन्ध द्वार ,
आँगन की
तुलसी से
कितनों ने किया प्यार ,
अपने मन
की सुगंध
दिनचर्या लूट गई |
आना कल
चंदन वन
मन का ये ताप हरे ,
कितने दिन
बीत गये
फूलों पर पाँव धरे ,
दोपहरी
ओखल में
धान हरे कूट गई |
कवि -जयकृष्ण राय तुषार
सभी चित्र -गूगल से साभार

