Friday, 31 October 2025

प्रयागराज आयकर भवन में हिन्दी पखवाड़ा कवि गोष्ठी

  दिनांक 28-10-2025 को आयकर भवन प्रयागराज में हिन्दी पखवाड़ा के अंतर्गत कवि गोष्ठी का आयोजन हुआ एवं विभागीय कर्मचारियों का सम्मान. कार्यक्रम में आयकर आयुक्त श्रीमती मोना मोहंती जी. आयकर आयुक्त अपील तिवारी जी, अपर आयकर आयुक्त श्री शिव कुमार राय जी, उपनिदेशक राजभाषा हरिकृष्ण तिवारी जी, श्री मकरध्वज मौर्य जी और विभाग के श्रोतागण कविगण मौजूद रहे. प्रबुद्ध श्रोताओं के बीच एक खूबसूरत शाम का आनंद मिला.

आयकर आयुक्त श्रीमती मोना मोहंती को अपना ग़ज़ल
संग्रह भेंट करते हुए दिनांक 28-10-2025

कवि गोष्ठी में मकरध्वज मौर्य जी मुझे सम्मानित करते हुए

आयकर आयुक्त, आयकर आयुक्त अपील तिवारी जी 
राजभाषा उपनिदेशक हरिकृष्ण तिवारी एवं कवि गण

आयकर आयुक्त महोदया से सम्मान ग्रहण करते हुए



काव्य पाठ सुनते श्रोतागण आयकर भवन

अपर निदेशक आयकर श्री शिव कुमार राय जी
आयकर आयकर आयुक्त अपील श्री तिवारी जी
मध्य में आयकर आयुक्त सुश्री मोना मोहंती जी

Wednesday, 17 September 2025

एक गीत -सारा जंगल सुनता है

 

चित्र साभार गूगल

एक ताज़ा गीत -सारा जंगल सुनता है

चित्र साभार गूगल



चिड़िया जब 
गाती है मन से 
सारा जंगल सुनता है.

नए बाग में 
नए फूल जब 
विविध रंग में खिलते हैं,
भौरे, तितली 
खुशबू अक्सर 
इनसे उनसे मिलते हैं,
वल्कल पहने 
मौसम 
टहनी से फूलों को चुनता है.

कभी कभी
तो सपने मन के
इंद्र धनुष हो जाते हैं,
कभी स्वनिर्मित
महासुरंगो में
जाकर खो जाते हैं,
बूढ़ी आँखों
से बुनकर मन
जाने क्या क्या बुनता है.

कलम वही जो
कविताओं में
सबकी पीड़ा लिखती है,
धुंधले पंन्नों पर
सोने के
अक्षर जैसी दिखती है,
वृंदावन अब
अपने मन की
वंशी केवल सुनता है.

कवि-जयकृष्ण राय तुषार




चित्र साभार गूगल


Wednesday, 20 August 2025

एक गीत -गा रहा होगा पहाड़ों में कोई जगजीत

 

चित्र साभार गूगल

एक गीत -मोरपँखी गीत 


इस मरुस्थल में 
चलो ढूँढ़े 
नदी को मीत.
डायरी में 
लिखेंगे 
कुछ मोरपँखी गीत.

रेत में 
पदचिन्ह होंगे 
या मिटे होंगे,
बेर से 
लड़कर 
हरे पत्ते फटे होंगे,
फूल के 
ऊपर लिखेंगे 
तितलियों की जीत.

घाटियों में 
रंग होंगे 
हरापन होगा,
जहाँ तुम 
होगी वहाँ 
कुछ नयापन होगा,
इन परिंदो 
के यहाँ 
होगा सुगम संगीत.

आदिवासी 
घाटियों में
रंग सारे हैं,
अतिथि
स्वागत में
सभी बाहें पसारे हैं,
गा रहा होगा
पहाड़ी धुन
कोई जगजीत.

कवि जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल


Monday, 18 August 2025

अनुपम परिहार की कलम से समीक्षा

 

समीक्षक श्री अनुपम परिहार


मेरे ग़ज़ल संग्रह*सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है*

पर अनुपम परिहार की कलम

ग़ज़लकार जयकृष्ण राय 'तुषार' ने मुलाक़ात करके मुझे अपना ग़ज़ल संग्रह ‘सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है’ भेंट किया। इस संग्रह को मैंने आज शाम से पढ़ना शुरू किया है। पढ़ते हुए महसूस हुआ कि इन ग़ज़लों में समकालीन जीवन की विडम्बनाएँ, मनुष्य की जद्दोजहद और बदलते परिवेश के मार्मिक चित्र बड़ी सहजता से सामने आते हैं।

इन ग़ज़लों की ख़ासियत यह है कि तुषार अपने परिवेश और समाज से गहरे जुड़े हुए हैं। वे प्रतीकों और बिम्बों के सहारे पाठक को सोचने पर मज़बूर करते हैं। 


आज़ादी पेड़ हरा है ये मौसमों से कहो  न सूख पाएं ये परिंदों को एतबार रहे।


इन पंक्तियों में कवि ने आज़ादी को हरियाली और जीवन से जोड़कर उसकी नमी और ताज़गी बचाए रखने का संदेश दिया है।


बाज़ारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति के दबाव में बदलते घरेलू परिदृश्य का यथार्थ उनकी इन पंक्तियों में साफ़ झलकता है।


खिलौने आ गए बाज़ार से लेकिन हुनर का क्या 

 मेरी बेटी कहां अब शौक से गुड़िया बनाती है।


यह शेर केवल एक बच्ची की आदत के बदलने की बात नहीं है, बल्कि बदलते समय में लुप्त हो रही रचनात्मकता और सहजता की ओर भी इशारा करता है।


संग्रह में औरत की बदलती भूमिका पर भी बेहद सटीक टिप्पणी मिलती है।


 न चूड़ी है, ना बिंदी है, न काजल, मांग का टीका है 

यह औरत कामकाजी है, यह चेहरा इस सदी का है।


यह शेर समकालीन स्त्री के संघर्ष और आत्मनिर्भरता का स्पष्ट व सशक्त चित्रण करता है। यहाँ तुषार किसी आदर्श स्त्री की कल्पना नहीं करते, बल्कि वास्तविक जीवन से उठाए गए दृश्य को कविता में दर्ज़ करते हैं।

इस संग्रह की ग़ज़लें समाज के भीतर चल रहे छोटे-छोटे परिवर्तनों को गहरी संवेदनशीलता के साथ दर्ज़ करती हैं। तुषार की भाषा सधी हुई है और उनका शिल्प सहज। यह संग्रह निश्चय ही पाठक को अपने समय और परिवेश की पड़ताल करने को विवश करता है।

मेरा ग़ज़ल संग्रह


18/08/25

Sunday, 17 August 2025

एक ग़ज़ल -यादों के आसपास रहा

 

चित्र साभार गूगल

तमाम फूल, तितलियों में भी उदास रहा 

बिछड़ने वाला ही यादों के आसपास रहा 

जहाँ भी फूल थे शाखों पे खिलखिलाते रहे 
हवा के साथ उड़ानों में बस कपास रहा 

तमाम ग़म को छिपाए हँसी की चादर से 
गुलाम मुल्क में जैसे वो क्रीत दास रहा 

जो पेड़ आज परिंदो का आशियाना है 
वसंत आने के पहले वो बेलिबास रहा 

किसी के आने की आहट थी चाँदनी की तरह 
तमाम रात अँधेरे में भी उजास रहा 

न मोर पंख न तितली,नदी, हिरण भी नहीं 
ये गाँव गाँव नहीं था ये बस नख़ास रहा 

हमेशा अजनबी रस्तों में काम आते रहे 
शिकस्त उससे मिली जो हमारा खास रहा 

सलोने रंग में उलझे जो देवदास बने
जो स्याम रंग में डूबा वो सूरदास रहा

जयकृष्ण राय तुषार 
चित्र साभार गूगल


Monday, 11 August 2025

एक ग़ज़ल -मौसम का रंग

 

चित्र साभार गूगल

एक ग़ज़ल 

तितली का इश्क़, बाग का सिंगार ले गया
खिलते ही सारे फूल वो बाज़ार ले गया 

मौसम का रंग फीका है, भौँरे उदास हैं
गुलशन का कोई शख्स कारोबार ले गया 

उसका ही रंगमंच था नाटक उसी का था 
मुझसे चुराके बस मेरा किरदार ले गया 

अपने शहर का हाल मुझे ख़ुद पता नहीं
भींगा था कोई धूप में अख़बार ले गया

दरिया के बीच जाके मुझे तैरना पड़ा 
कश्ती मैं अपने साथ में बेकार ले गया 

आँधी नहीं है फिर भी परिंदो का शोर है 
जंगल की शांति फिर कोई गुलदार ले गया 

ख्वाबों में गुलमोहर ही सजाता था जो कभी 
वो फूल देके मुझको सभी ख़ार ले गया 

इस बार भी न दोस्तों से गुफ़्तगू हुई 
साहब का दौरा अबकी भी इतवार ले गया 

कवि शायर जयकृष्ण राय तुषार 

चित्र साभार गूगल


Friday, 1 August 2025

एक ताज़ा ग़ज़ल -सब घराने आपकी मर्ज़ी से ही गाने लगे

 

चित्र साभार गूगल

एक ग़ज़ल 

साज साजिन्दे सभी महफ़िल में घबराने लगे 

सब घराने आपकी मर्ज़ी से ही गाने लगे 


भूल जाएगा ज़माना दादरा, ठुमरी, ग़ज़ल 

अब नई पीठी को शापिंग माल ही भाने लगे 


जिंदगी भी दौड़ती ट्रेनों सी ही मशरूफ़ है 

आप मुद्द्त बाद आए और अभी जाने लगे 


झील में पानी, हवा में ताज़गी मौसम भी ठीक 

फूल में खुशबू नहीं भौँरे ये बतियाने लगे


प्यार से लोटे में जल चावल के दाने रख दिए

फिर कबूतर छत में मेरे हाथ से खाने लगे


हम भी बचपन में शरारत कर के घर में छिप गए

अब बड़े होकर ज़माने भर को समझाने लगे


बीच जंगल से गुजरते अजनबी को देखकर

आदतन ये रास्ते फिर फूल महकाने लगे


देखकर प्रतिकूल मौसम उड़ गए संगम से जो

ये प्रवासी खुशनुमा मौसम में फिर आने लगे

कवि जयकृष्ण राय तुषार 

चित्र साभार गूगल


Thursday, 31 July 2025

नई किताब हिन्दी ग़ज़ल व्यापकता और विस्तार -श्री ज्ञानप्रकाश विवेक

 

 नई किताब

आदरणीय श्री ज्ञानप्रकाश विवेक जी


हिन्दी ग़ज़ल व्यापकता और विस्तार-लेखक श्री ज्ञान प्रकाश विवेक

हिन्दी ग़ज़ल पर वाणी प्रकाशन से आदरणीय ज्ञानप्रकाश विवेक की बेहतरीन आलोचनात्मक पुस्तक प्राप्त हुई. 371 पेज की यह पुस्तक है इसमें विशद आलेख हैं. मुझे भी शामिल किया गया है. बहुत मेहनत के साथ कुल पांच वर्षों के अथक प्रयास से यह पुस्तक प्रकाशित हुई है.इस पुस्तक में कुल तीन खण्ड हैं बहुत बहुत बधाई आदरणीय ज्ञान प्रकाश जी



पुस्तक -हिन्दी ग़ज़ल व्यापकता और विस्तार 

लेखक -श्री ज्ञान प्रकाश विवेक 

प्रकाशक वाणी प्रकाशन नई दिल्ली 

मूल्य सजिल्द -795

Monday, 28 July 2025

एक गीत -सारंगी को साधो जोगी

 

चित्र साभार गूगल

एक ताज़ा गीत -

सारंगी को 

साधो जोगी 

बन्द घरों की खिड़की खोलो.

टूटे दिल 

उदास मन वालों के 

संग कुछ क्षण बैठो बोलो.


झाँक रहे 

दिन भर यन्त्रों में 

गमले में चंपा मुरझाई,

भूल गया 

मौसमी गीत मन 

किसे पता कब चिड़िया गाई,

धूल भरे आदमकद 

दरपन को 

आँचल से पोछो धो लो.


बखरी हुई

उदास ग़ुम हुई

दालानों की हँसी-ठिठोली,

रंगोली के

रंग कृत्रिम हैं

पान बेचता कहाँ तमोली,

कहाँ गए

वो हँसने वाले

याद करो उनको फिर रो लो.


महुआ, पीपल

नीम-आम के

नीचे कजरी बैठ रम्भाती,

पीकर पानी

नदी-ताल का

वन में खाते नमक चपाती,

डांट पिता की

याद करो फिर

माँ की यादों के संग हो लो.

कवि

जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल

Saturday, 19 July 2025

एक ग़ज़ल -अब तो बाज़ार की मेंहदी लिए बैठा सावन

  

चित्र साभार गूगल

एक ग़ज़ल 


ग़ुम हुए अपनी ही दुनिया में सँवरने वाले 

हँसके मिलते हैं कहाँ राह गुजरने वाले 


घाट गंगा के वही नाव भी केवट भी वही 

अब नहीं राम से हैं पार उतरने वाले 


फैसले होंगे मगर न्याय की उम्मीद नहीं 

सच पे है धूल गवाहान मुकरने वाले 


अब तो बाज़ार की मेंहदी लिए बैठा सावन

रंग असली तो नहीं इससे उभरने वाले


ढूँढता हूँ मैं हरेक शाम अदब की महफ़िल

जिसमें कुछ शेर तो हों दिल में उतरने वाले



कवि जयकृष्ण राय तुषार

सभी चित्र साभार गूगल

एक गीत -दीपावली -रेशम के घूँघट में चाँदनी

  चित्र साभार गूगल  प्रतिष्ठित अभिनेत्री साई पल्लवी जी  आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें  एक गीत -रेशम के घूँघट में  रेशम के  घूँघट ...