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कच्चे घर में हम
बादल
फटते रहे नशे में
कच्चे घर में हम ।
इन्दर राजा
इन्द्रलोक में
पीते होंगे रम।
कर्जदार
सूरज पच्छिम में
बड़े ताल में डूबा,
सूदखोर के
नए लठैतों का
पढ़कर मंसूबा,
बस्ती में
बस कानाफूसी
नहीं किसी को ग़म।
जूते लिए
हाथ में कीचड़-
पानी में उतरे,
खड़ी फसल को
आवारा पशु
चूहे सब कुतरे,
जितना
बोये बीज खेत में
पाए उससे कम।
दो-अज़नबी की तरह
अज़नबी की
तरह घर के लोग
ये कैसा चलन है।
हम कहाँ पर
खड़े हैं ऐ
सभ्यता तुझको नमन है।
कहकहे
दालान के चुप
मौन हँसता, मौन गाता,
सभी हैं माँ-पिता
ताऊ,बहन,
भाभी और भ्राता,
महल है
वातानुकूलित
मगर रिश्तों में गलन है।
कई दरवाजे
खुले कुछ बन्द
कुछ ताले लगे हैं,
खिड़कियों पर
धूल ,रोशनदान
पर जाले लगे हैं,
हैं नहीं
सम्वाद घर मे
ट्विटर पर
सबका मिलन है।
अब रसोईघर
नहीं उपले नहीं
खपरैल कच्चे,
लॉन में
हिलते हवा से
फूल,भौरें नहीं बच्चे,
वक्त कितना
बेरहम है
या कहें कुछ बदचलन है।
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| चित्र -साभार गूगल |

















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