Sunday, 26 July 2026

एक गीत -नदी के इस पार मैं हूँ

 

चित्र साभार गूगल 

एक गीत -नदी के इस पार मैं हूँ 


नदी के इस पार 

मैं हूँ 

उस तरफ सब फूल हैं.

घना कोहरा 

नाव माझी 

बात में मशगूल हैं.


गन्ध पुष्पों के 

बिना अब 

देवता पर क्या चढ़े?

शोक में 

डूबा हुआ मन 

मंत्र वैदिक क्या पढ़े?

तैर भी 

सकता नहीं 

गहरे भंवर के कूल हैं.



रेत के टीले 

इधर हैं 

उधर चंदन वन घना है,

आरती के 

स्वर उधर हैं 

इधर मौसम अनमना है,

राम पथ में 

पाँव नंगे 

कांच बिखरे शूल हैं.

चित्र साभार गूगल श्रीराम जी 


7 comments:

  1. बहुत अच्छा गीत रचा है तुषार जी आपने। अभिनंदन।

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    Replies
    1. आपका हृदय से आभार भाई साहब. सादर प्रणाम

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  2. सर,पहली बार आपके किसी गीत में उदासी पढ़ रही हूॅं।
    आपकी लेखन की सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है।
    सादर।
    ------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार २८ जुलाई २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  3. बड़े दिनों के बाद
    सटीक रचना
    वंदन

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  4. करुणा और प्रेम से भरा सुंदर गीत

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  5. बहुत ही खूबसूरत गीत !

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