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| चित्र साभार गूगल |
एक गीत -नदी के इस पार मैं हूँ
नदी के इस पार
मैं हूँ
उस तरफ सब फूल हैं.
घना कोहरा
नाव माझी
बात में मशगूल हैं.
गन्ध पुष्पों के
बिना अब
देवता पर क्या चढ़े?
शोक में
डूबा हुआ मन
मंत्र वैदिक क्या पढ़े?
तैर भी
सकता नहीं
गहरे भंवर के कूल हैं.
रेत के टीले
इधर हैं
उधर चंदन वन घना है,
आरती के
स्वर उधर हैं
इधर मौसम अनमना है,
राम पथ में
पाँव नंगे
कांच बिखरे शूल हैं.
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| चित्र साभार गूगल श्रीराम जी |


बहुत अच्छा गीत रचा है तुषार जी आपने। अभिनंदन।
ReplyDeleteआपका हृदय से आभार भाई साहब. सादर प्रणाम
Deleteसर,पहली बार आपके किसी गीत में उदासी पढ़ रही हूॅं।
ReplyDeleteआपकी लेखन की सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार २८ जुलाई २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
बड़े दिनों के बाद
ReplyDeleteसटीक रचना
वंदन
सुंदर
ReplyDeleteकरुणा और प्रेम से भरा सुंदर गीत
ReplyDeleteबहुत ही खूबसूरत गीत !
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