Sunday, 26 July 2026

एक गीत -कत्थक की शामें

 

चित्र साभार गूगल 

एक सामयिक गीत -कत्थक की शामें अब सुनती हैं बैले 


चन्दन वन 

माटी में 

काकरोच फैले.

आँखों में 

स्वप्न सभी 

हो गए विषैले.


विकसित है 

भारत पर 

संस्कार हीन हुआ,

मीठा जल 

झरनों का कैसे 

नमकीन हुआ,

गाँव से 

नगर आकर 

हो गए बनैले.


आगजनी,

हिंसा है 

पूनम की रातों में,

सम्मोहन 

लुप्त हुआ 

मौसम की बातों में,

मीठे 

झरबेरों के 

स्वाद हैं कसैले.


टूटते कुटुंबों 

के दरपन 

भी टूट गए,

संग शुष्क 

नदियों से 

हिरनों के छूट गए,

कत्थक की 

शामें अब 

देख रहीं बैले.

चित्र साभार गूगल 


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