मेरे ग़ज़ल संग्रह का द्वितीय संस्करण छप गया. नए कवर को डिजाइन किया है प्रोफ़ेसर अरुण जेतली जी ने. प्रकाशक लोकभारती. मूल्य 250 रूपये मात्र.
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| द्वितीय संस्करण |
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दिनांक 28-10-2025 को आयकर भवन प्रयागराज में हिन्दी पखवाड़ा के अंतर्गत कवि गोष्ठी का आयोजन हुआ एवं विभागीय कर्मचारियों का सम्मान. कार्यक्रम में आयकर आयुक्त श्रीमती मोना मोहंती जी. आयकर आयुक्त अपील तिवारी जी, अपर आयकर आयुक्त श्री शिव कुमार राय जी, उपनिदेशक राजभाषा हरिकृष्ण तिवारी जी, श्री मकरध्वज मौर्य जी और विभाग के श्रोतागण कविगण मौजूद रहे. प्रबुद्ध श्रोताओं के बीच एक खूबसूरत शाम का आनंद मिला.
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| आयकर आयुक्त श्रीमती मोना मोहंती को अपना ग़ज़ल संग्रह भेंट करते हुए दिनांक 28-10-2025 |
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| कवि गोष्ठी में मकरध्वज मौर्य जी मुझे सम्मानित करते हुए |
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| आयकर आयुक्त, आयकर आयुक्त अपील तिवारी जी राजभाषा उपनिदेशक हरिकृष्ण तिवारी एवं कवि गण |
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| आयकर आयुक्त महोदया से सम्मान ग्रहण करते हुए |
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| अपर निदेशक आयकर श्री शिव कुमार राय जी आयकर आयकर आयुक्त अपील श्री तिवारी जी मध्य में आयकर आयुक्त सुश्री मोना मोहंती जी |
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| प्रयागपथ |
प्रयागपथ का नया अंक मोहन राकेश पर एक अनुपम विशेषांक है. इलाहाबाद विश्व विद्यालय जगदीश गुप्त, कृष्णा सोबती,अमरकांत डॉ रघुवंश, श्रीलाल शुक्ल और मोहन राकेश की जन्मशती मना रहा है.पत्रिका के यशस्वी सम्पादक भाई हितेश कुमार सिंह ने एक अविस्मरणीय विशेषांक मोहन राकेश पर निकाला है.प्रयागपथ का हर अंक पठनीय और संग्रहणीय रहता है.इस अंक में उच्चतम न्यायालय के ख्यातिलब्ध माननीय न्यायमूर्ति आदरणीय पंकज मित्तल साहब की कविताएं भी पढ़ने को मिलीं. इस अंक में मेरी किताब *सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है *पर भाई अनिल कुमार सिंह की समीक्षा प्रकाशित है. इस अंक में स्मृतियों के अंतर्गत श्री हेरम्ब चतुर्वेदी जी और डॉ हरीश त्रिवेदी का आलेख है. यतीश कुमार और काव्या कटारे की कहानियाँ और सुभाष राय, प्रदीप कुमार सिंह, अभिमन्यु प्रताप सिंह, लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता लोकेश श्रीवास्तव, सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज, माननीय न्यायमूर्ति श्री पंकज मित्तल जी परमेश्वर फुंकवालऔर शीला चौहान की कविताएं भी हैँ. मोहन राकेश पर कलम चलाने वाले रचनाकार नामदेव निधि सिंह मुष्टाक अली, रेणु अरोड़ा, मेरी हांसदा, श्रीधर करूणानिधि, विजेंद्र प्रताप सिंह, सत्यदेव त्रिपाठी, आभा गुप्ता ठाकुर,, राजाराम भादू, कुमार वीरेंद्र, अजय वर्मा, शम्पा शाह, राहुल शर्मा, एकता मंडल, खेमकरण सोमन, रमेश प्रजापति, जमुना कृष्ण राज, मलय पानेरी, सुनीता,, उपन्यास लोक में आशुतोष कुमार सिंह, डायरी डेरा कुबेर कुमावत मधुरेश, आशुतोष, असलम हसन,. समीक्षा कालम में विजय बहादुर सिंह, राजेश मल्ल, मिताश्री श्रीवास्तव, सुलोचना दास, रंजीत सिंह और अनिल कुमार शामिल हैँ. मैं सम्पादक और समीक्षा लेखक के प्रति आभारी हूँ.
पत्रिका प्रयागपथ
सम्पादक -श्री हितेश कुमार सिंह
सह सम्पादक -डॉ नीतू सिंह
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| चित्र साभार गूगल |
एक ताज़ा गीत -सारा जंगल सुनता है
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
भारतीय सेना विश्व की सबसे अनुशासित और बहादुर सेना है. भारत ही नहीं इस सेना के त्याग और बलिदान की गाथा समूचे विश्व में गुंजायमान है. भारत की एकता अखंडता और विविधता इनके पुरुषार्थ और पराक्रम से सुरक्षित है. नायक वो नहीं जो फिल्मों में दिखते हैँ. देश के असली हीरो नभ. जल और थल को सुरक्षित रखने वाले हमारे सैनिक हैं. जो पर्वत, पठार, दलदल, रेगिस्तान में भी कष्ट सहकर अपने देश को सुरक्षित रखते हैं. प्रयागराज में 6 बटालियन N. C. C. में आज ऐसे ही देश के बहादुर नायक आदरणीय सूबेदार मेज़र हरविंदर सिंह जी से मुलाक़ात कर मैंने अपनी पुस्तक भेंट किया. भारतीय सेना की गाथा युगों तक गाये जाने लायक है. समूचे विश्व में मानवता के लिए जहाँ जरूरत पड़ी भारतीय सेना ने अपने साहसिक अभियानों से देश का मान बढ़ाया. जयहिंद वन्देमातरम. सत श्री अकाल
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| सूबेदार मेज़र श्री हरविंदर सिंह जी को अपनी पुस्तक भेंट करते हुए |
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| चित्र साभार गूगल |
एक गीत -मोरपँखी गीत
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| चित्र साभार गूगल |
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| समीक्षक श्री अनुपम परिहार |
मेरे ग़ज़ल संग्रह*सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है*
पर अनुपम परिहार की कलम
ग़ज़लकार जयकृष्ण राय 'तुषार' ने मुलाक़ात करके मुझे अपना ग़ज़ल संग्रह ‘सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है’ भेंट किया। इस संग्रह को मैंने आज शाम से पढ़ना शुरू किया है। पढ़ते हुए महसूस हुआ कि इन ग़ज़लों में समकालीन जीवन की विडम्बनाएँ, मनुष्य की जद्दोजहद और बदलते परिवेश के मार्मिक चित्र बड़ी सहजता से सामने आते हैं।
इन ग़ज़लों की ख़ासियत यह है कि तुषार अपने परिवेश और समाज से गहरे जुड़े हुए हैं। वे प्रतीकों और बिम्बों के सहारे पाठक को सोचने पर मज़बूर करते हैं।
आज़ादी पेड़ हरा है ये मौसमों से कहो न सूख पाएं ये परिंदों को एतबार रहे।
इन पंक्तियों में कवि ने आज़ादी को हरियाली और जीवन से जोड़कर उसकी नमी और ताज़गी बचाए रखने का संदेश दिया है।
बाज़ारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति के दबाव में बदलते घरेलू परिदृश्य का यथार्थ उनकी इन पंक्तियों में साफ़ झलकता है।
खिलौने आ गए बाज़ार से लेकिन हुनर का क्या
मेरी बेटी कहां अब शौक से गुड़िया बनाती है।
यह शेर केवल एक बच्ची की आदत के बदलने की बात नहीं है, बल्कि बदलते समय में लुप्त हो रही रचनात्मकता और सहजता की ओर भी इशारा करता है।
संग्रह में औरत की बदलती भूमिका पर भी बेहद सटीक टिप्पणी मिलती है।
न चूड़ी है, ना बिंदी है, न काजल, मांग का टीका है
यह औरत कामकाजी है, यह चेहरा इस सदी का है।
यह शेर समकालीन स्त्री के संघर्ष और आत्मनिर्भरता का स्पष्ट व सशक्त चित्रण करता है। यहाँ तुषार किसी आदर्श स्त्री की कल्पना नहीं करते, बल्कि वास्तविक जीवन से उठाए गए दृश्य को कविता में दर्ज़ करते हैं।
इस संग्रह की ग़ज़लें समाज के भीतर चल रहे छोटे-छोटे परिवर्तनों को गहरी संवेदनशीलता के साथ दर्ज़ करती हैं। तुषार की भाषा सधी हुई है और उनका शिल्प सहज। यह संग्रह निश्चय ही पाठक को अपने समय और परिवेश की पड़ताल करने को विवश करता है।
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| मेरा ग़ज़ल संग्रह |
18/08/25
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| चित्र साभार गूगल |
तमाम फूल, तितलियों में भी उदास रहा
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
एक ग़ज़ल
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
एक ग़ज़ल
साज साजिन्दे सभी महफ़िल में घबराने लगे
सब घराने आपकी मर्ज़ी से ही गाने लगे
भूल जाएगा ज़माना दादरा, ठुमरी, ग़ज़ल
अब नई पीठी को शापिंग माल ही भाने लगे
जिंदगी भी दौड़ती ट्रेनों सी ही मशरूफ़ है
आप मुद्द्त बाद आए और अभी जाने लगे
झील में पानी, हवा में ताज़गी मौसम भी ठीक
फूल में खुशबू नहीं भौँरे ये बतियाने लगे
प्यार से लोटे में जल चावल के दाने रख दिए
फिर कबूतर छत में मेरे हाथ से खाने लगे
हम भी बचपन में शरारत कर के घर में छिप गए
अब बड़े होकर ज़माने भर को समझाने लगे
बीच जंगल से गुजरते अजनबी को देखकर
आदतन ये रास्ते फिर फूल महकाने लगे
देखकर प्रतिकूल मौसम उड़ गए संगम से जो
ये प्रवासी खुशनुमा मौसम में फिर आने लगे
कवि जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
चित्र साभार गूगल एक पुराना लोकभाषा गीत लोकसंस्कृति, गाँव की रौनक़, उत्सवजीविता को, लोकपरम्परा को याद करती लोकभाषा कविता.सादर अभिवादन सहित...