Sunday, 24 March 2013

एक गीत -इन्द्रधनुष लगता गोरी का गाल कि होली आई है

चित्र -गूगल से साभार 
मित्रों आप सभी को सपरिवार होली की शुभकामनाएँ -इस बार चाह कर भी कोई गीत नहीं लिख सका ,डायरी में एक बहुत पुराना गीत मिला ,वही पोस्ट कर रहा हूँ |गाँव जा रहा हूँ अब कुछ दिन अंतर्जाल से दूर रहूँगा |आशा है आप अपना स्नेह बनाए रक्खेंगे |आभार सहित -

एक गीत -होली आई है 
हवा उड़ाती 
घर -घर रंग -
गुलाल कि होली आई है |
लाज -शरम से 
हुई दिशाएं लाल 
कि होली   आई है |

साँस -साँस में 
गीत समाये ,
नैन इशारे 
हवा बुलाये ,
नदिया गाये फाग 
कबीरा ताल
कि   होली आई है |

मौसम में 
आवारापन है ,
खिली धूप में 
क्वारापन है ,
रंगी अबीरों से 
सूनी चौपाल 
कि होली आई है |

दरपन से भी 
हंसी -ठिठोली ,
शहद हो गयी 
सबकी बोली ,
इन्द्रधनुष लगता 
गोरी का गाल 
कि होली आई है |

गली -गली 
गोकुल -बरसाने ,
बच्चे -बूढ़े 
और सयाने ,
फेंक रहे 
मछली के ऊपर जाल 
कि   होली आई है |

गीतकार 
जयकृष्ण राय तुषार 

Monday, 11 March 2013

भोपाल से प्रकाशित अन्तरा का गीत विशेषांक -एक अवलोकन

सम्पादक -नरेन्द्र दीपक 
अन्तरा का गीत विशेषांक -एक समीक्षा 

भोपाल मध्य प्रदेश की राजनैतिक राजधानी ही नहीं वरन साहित्यिक और सांस्कृतिक राजधानी भी है | इस शहर की साहित्यिक गतिविधिया समूचे देश को प्रभावित करती हैं | कुछ दिन पूर्व ही जाने -माने कवि भाई नरेन्द्र दीपक ने गीत विधा पर केन्द्रित पत्रिका अन्तरा के प्रकाशन का शुभारम्भ किया था ,जो पाठको के बीच अपनी अलग छवि बनाने में कामयाब रही है | अन्तरा का छठा अंक बहुत ही पठनीय और संग्रहनीय है |यह अंक गीत विशेषांक है | हाल ही में गीत विधा पर कई विशेषांक प्रकाशित हुए है सबकी अपनी -अपनी सम्पादकीय दृष्टि और सोच है ,इसी तरह भाई नरेन्द्र दीपक की अपनी सोच है | अन्तरा के अंक के बारे में यही कहना उचित होगा -सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर ......वास्तव में यह कोई भारी -भरकम अंक नहीं है लेकिन इस अंक में अन्य गीत अंको से बहुत कुछ अलग है | पत्रिका के आरम्भ में तीन महत्वपूर्ण आलेख हैं -हिंदी गीतों का व्यापक वितान लेखक कैलाशचन्द्र पन्त ,नवगीत गीत है पर डॉ0 भारतेन्दु मिश्र का आलेख ,गीतों की सदानीरा नदी नर्मदा पर चन्द्रसेन विराट  का आलेख | ग्यारह छायावादोत्तर प्रमुख कवियों के एक -एक गीत के साथ उन पर चर्चा [आलेख ] इस अंक को संग्रहनीय बनाता है | ये वो कवि है जिनसे गीत विधा को गौरव हासिल हुआ है -रामेश्वर शुक्ल अंचल पर दिवाकर वर्मा का आलेख ,हरिवंशराय बच्चन पर राम अधीर का आलेख ,गोपाल सिंह नेपाली पर डॉ 0 सुरेश गौतम का आलेख शिवमंगल सिंह सुमन पर श्रीराम परिहार का आलेख ,बलवीर सिंह रंग पर डॉ 0 प्रेम कुमारी कटियार का आलेख रमानाथ अवस्थी पर डॉ सुरेश गौतम का आलेख ,वीरेन्द्र मिश्र पर शिवशंकर शर्मा का आलेख पदमविभूषण गोपालदास नीरज पर डॉ0 पशुपतिनाथ उपाध्याय का आलेख ,मुकुटबिहारी सरोज पर सुमेर सिंह शैलेश का आलेख और डॉ0 शिव बहादुर सिंह भदौरिया पर मधु शुक्ला का पठनीय आलेख है | गीत खण्ड के अंतर्गत कुछ चुनिन्दा गीतकारों को ही शामिल किया गया है जिनके नाम इस क्रम में हैं -यश मालवीय ,कुमार रवीन्द्र ,शान्ति सुमन ,मधु शुक्ला ,राजकुमारी रश्मि ,दिनेश शुक्ल ,राम सेंगर ,जयकृष्ण राय तुषार ,रजनी मोरवाल ,किशोर काबरा ,जगदीश श्रीवास्तव ,सत्येन्द्र तिवारी और चन्द्रसेन विराट ,स्तम्भ के अंतर्गत ज्योत्स्ना प्रवाह का आलेख प्रेम एक गीत है पठनीय है |बिलकुल प्रारम्भ में नीरज जी का एक गीत है | कुल मिलाकर सम्पादक नरेन्द्र दीपक का यह बेजोड़ कार्य सराहनीय है और उनकी सम्पादकीय टीम साधुवाद की हक़दार है |गीतों के पतन में स्वयं गीत कवियों की भूमिका प्रमुख रही है मंचीय स्वभाव एक दूसरे पर गद्य में कुछ न लिखना ,अपने से बड़ा गीत कवि किसी को न मानना भी एक कारण है |लेकिन गीत तो प्रकृति की हर लय में समाहित है ,यह कभी ख़त्म ही नहीं हो सकता बस इसका तेवर और कलेवर बदल सकता है |यह विरहाकुल नायिका का दोस्त है तो प्रेम मग्न नायक नायिका को रिझाता है |कभी खेत में काम करते मजदूर का साथ निभाता है तो कभी क्रांति का काम करता है | गीत हमेशा जीवित रहेगा और इसे जीवित रखेगें भाई नरेन्द्र दीपक जैसे जीवट वाले सम्पादक उसे जीवित रखेगें कलम के सिपाही | वाचिक परम्परा का होने के कारण भी गीत कभी खत्म नहीं होगा | गीत की यह मशाल युगों -युगों तक जलती रहे |अन्तरा निरन्तर अपने प्रयास में दिनमान की तरह प्रकाशमान रहे |
-मेरी कलम से 


सिद्ध गीतकार नरेन्द्र दीपक के सम्पादन में निकलने वाली गीतधर्मी पत्रिका अन्तरा का ताज़ा विशेषांक गीत केन्द्रित ही रखा गया है | दीपक जी की रचनात्मक प्रखर दृष्टि और संयोजन में इसे एक सर्जनात्मक चेहरा दे दिया |गीत में हमारी परम्परा और आज का गीत दोनों का ही प्रतिनिधित्व हुआ है | शिवमंगल सुमन जी से लेकर मधु शुक्ला के गीतात्मक संसार से पत्रिका हमें परिचित कराती है |निश्चित रूप से यह अपने समय में दर्ज एक रचनात्मक आन्दोलन है ,जिसकी एक विलक्षण भाव- भूमि अभिभूत करती है |
सुप्रसिद्ध गीत कवि -यश मालवीय 

एक गीत -मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार 
कवि -शिवमंगल सिंह सुमन 
मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार 
पथ ही मुड़ गया था |

गति मिली मैं चल पड़ा 
पथ पर कहाँ रुकना मना था 
राह अनदेखी ,अजाना देश 
संगी अनसुना था |
चाँद -सूरज की तरह चलता 
न जाना रात -दिन है 
किस तरह हम तुम गए मिल 
आज भी कहना कठिन है 
तन न आया मांगने अभिसार 
मन ही जुड़ गया था |

देख मेरे पंख चल ,गतिमय 
लता भी लहलहाई 
पत्र आंचल में छिपाए मुख 
कली भी मुस्कुराई |
एक क्षण को थम गए  डैने 
समझ विश्राम का पल 
पर प्रबल संघर्ष बनकर 
आ गयी आंधी सदल -बल |
डाल झूमी पर न टूटी 
किन्तु पंछी उड़ गया था |

कवि -शिवमंगल सिंह सुमन 

Wednesday, 6 March 2013

भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित चर्चित उपन्यास प्रेम की भूतकथा पर एक परिचर्चा


साहित्यिक समाचार
उपन्‍यास ‘प्रेम की भूतकथा’ पर गोष्‍ठी
इतिहासरस और किस्सागोई का अदभुत उदाहरण है प्रेम की भूतकथा- दूधनाथ सिंह 
सबसे बाएं उपन्यासकार विभूति नारायण राय ,
प्रोफ़ेसर अली अहमद फातमी ,डॉ o सरवत खान ,
प्रो० सन्तोष भदौरिया और बोलते हुए प्रो० दूधनाथ 

महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के इलाहाबाद क्षेत्रीय केंद्र द्वारा ‘ख्‍यातनाम साहित्‍यकार श्री विभूति नारायन राय के ज्ञानपीठ से प्रकाशित उपन्‍यास ^प्रेम की भूत कथा’ पर गोष्‍ठी का आयोजन किया गया। गोष्‍ठी की अध्‍यक्षता कर रहे वरिष्‍ठ साहित्‍यकार दूधनाथ सिंह ने कहा कि यह उपन्‍यास उपन्‍यासकार के अनुभव जगत में कैसे आया यह महत्‍वपूर्ण है, पढ़ कर मैं बहुत चकित हुआ विभूति नारायन राय उम्‍दा किस्‍म के किस्‍सागो हैं, उन्‍होंने प्रेम की भूतकथा में नयी डिवाइस और तकनीक का इस्‍तेमाल किया है उपन्‍यास में अदभुत कथारस है, मोड है, संरचनाएं हैं। रविन्‍द्र नाथ टैगोर ने इसे इतिहासरस कहा है। उपन्‍यास में इतिहासरस से अदभुत साक्षात्कार होता है। उन्‍होंने अपने पूर्व के उपन्‍यासों के कथा तत्‍व और शिल्‍प से स्‍पष्‍ट डिपार्चर किया है, उपन्‍यास का गद्य कवित्‍य मय है। मुख्‍य वक्‍ता प्रो. ए.ए. फातमी ने कहा कि, उपन्‍यास में न्‍याय व्‍यवस्‍था पर गहरा तंज है, प्रेम के किस्‍से के साथ जिन्दगी के कशमकश को भी साथ रखा गया है। प्रेम कथा सामाजिक सरोकार को साथ लेकर चलती है। उदयपुर की डा0 सरवत खान जिन्होंने उपन्‍यास का उर्दू में अनुवाद किया है ने कहा कि आज कल बहुत कुछ लिखा जा रहा है किन्‍तु मुहब्‍बत कि कहानिया नजर नहीं आती, विभूति जी के प्रेम चित्रण में फन झलकता है। यह उपन्‍यास जादुई यथार्थवाद का सफल नमूना है। उन्‍होंने इस उपन्‍यास को उर्दू वालों के लिए बहुत अहम बताया। उपन्‍यास के लेखक विभूति नारायन राय ने अपनी रचना प्रकिया को साझा करते हुए कहा कि, गुलेरी की कहानी उसने कहा था में प्रेम का उत्‍सर्ग मेरे लिए हमेशा रोमांचकारी रहा। उस कहानी में मेरे इस उपन्‍यास के लेखन में उत्‍प्रेरक का काम किया यह उपन्‍यास मेरे कई वर्षों के शोध का परिणाम है। उन्‍होंने इसके पढ़े जाने और पसंद किए जाने के लिए पाठक वर्ग का आभार भी व्‍यक्त किया। वक्‍ता हिमांशु रंजन ने प्रेम की भूतकथा को बडे कैनवास की कथा कहा, उन्‍होंने कहा कि उपन्‍यास कार ने इतिहास और परंपरा से ग्रहण करने का विवेक रखा है, शिल्‍प के लिहाज से उनका यह बहुत महत्वपूर्ण उपन्‍यास है। डॉ. गुफरान अहमद खान ने उर्दू वालों के लिए इस उपन्‍यास को एक जरूरी उपन्‍यास कहा। गोष्‍ठी का संयोजन एवं संचालन क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी प्रो. संतोष भदौरिया ने किया। स्‍वागत डॉ. प्रकाश त्रिपाठी ने किया। गोष्‍ठी में प्रमुख रूप से जिआउल हक, हरिश्‍चन्‍द्र पाण्‍डेय, हरिश्‍चन्‍द्र अग्रवाल, नंदल हितैषी, फखरूल करीम, जेपी मिश्रा, नीलम शंकर, संतोष चतुर्वेदी,सुरेद्र राही, असरफ अली बेग, प्रवीण शेखर, हीरालाल, अविनाश मिश्रा, रविनंदन सिंह, शैलेन्‍द्र सिंह, मनोज सिंह, अनिल भदौरिया, बी.एन. सिंह सहित बडी संख्‍या में साहित्‍य प्रेमी उपस्थित रहे।
रिपोर्ट -प्रो० सन्तोष भदौरिया 

सबसे बाएं वक्ता हिमांशु रंजन ,प्रो० दूधनाथ सिंह ,
प्रो० फ़ातमी ,डॉ 0 सरवत खान प्रो० सन्तोष भदौरिया
और बोलते हुए उपन्यासकार विभूति नारायण राय 
परिचर्चा का संचालन करते हुए प्रो० सन्तोष भदौरिया एवं अन्य वक्तागण 

Monday, 11 February 2013

एक गीत -यह जरा सी बात पूरे शहर को खलने लगी है

चित्र -गूगल से साभार 
एक गीत -यह जरा सी बात 
फिर गुलाबी 
धूप -तीखे 
मोड़ पर मिलने लगी है |
यह 
जरा सी बात पूरे 
शहर को खलने लगी है |

रेशमी 
जूड़े बिखर कर 
गाल पर सोने लगे हैं ,
गुनगुने 
जल एड़ियों को 
रगड़कर धोने लगे हैं ,
बिना माचिस 
के प्रणय की 
आग फिर जलने लगी है |

खेत में 
पीताम्बरा सरसों 
तितलियों को बुलाये ,
फूल पर 
बैठा हुआ भौंरा 
रफ़ी के गीत गाये ,
सुबह -
उठकर, हलद -
चन्दन देह पर मलने लगी है |

हवा में 
हर फूल की 
खुशबू इतर सी लग रही है ,
मिलन में 
बाधा अबोली 
खिलखिलाकर जग रही है ,
विवश होकर 
डायरी पर 
फिर कलम चलने लगी है |

कुछ हुआ है 
ख़्वाब दिन में 
ही हमें आने लगे हैं ,
पेड़ पर 
बैठे परिन्दे 
जोर से गाने लगे हैं ,
सुरमई 
सी शाम 
अब कुछ देर से ढलने लगी है |
चित्र -गूगल से साभार 

Sunday, 27 January 2013

आधुनिक सिनेमा और उर्दू शायरी के कबीर पद्मश्री निदा फ़ाज़ली और उनकी दो ग़ज़लें

सम्पर्क -09869487139
भारत सरकार द्वारा मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली को गणतन्त्र दिवस के मौके पर पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया जाना केवल निदा फ़ाज़ली का सम्मान नहीं वरन यह भारतीय संस्कृति ,हमारी गंगा -जमुनी तहजीब को भी सम्मान मिला है |निदा फ़ाज़ली आधुनिक उर्दू शायरी के कबीर हैं | निदा फ़ाज़ली चाहे अदब हो या सिनेमा शायरी को कभी हल्का नहीं होने देते हैं |निदा साहब भाषा की सहजता के भी कायल हैं |हम सभी कलमकार उनको पद्मश्री दिए जाने पर उन्हें सलाम और प्रणाम करते हैं |उनका परिचय हमारे सुनहरी कलम से ब्लॉग पर मौजूद है |हम उनके सम्मान स्वरूप उनकी दो चर्चित ग़ज़लें आपके साथ साझा कर रहे हैं |  

पद्मश्री निदा फ़ाज़ली जी की दो ग़ज़लें -

एक [पाकिस्तान से लौटकर लिखी गई ग़ज़ल ]
इन्सान तो हैवान यहाँ भी है वहां भी 
अल्लाह निगहबान यहाँ भी है वहां भी 

खूंख्वार दरिन्दों के फ़क़त नाम अलग हैं 
शहरों में बयाबान यहाँ भी है वहां भी 

रहमान की कुदरत हो या भगवान की मूरत 
हर खेल का मैदान यहाँ भी है वहां भी 

हिन्दू भी मज़े में हैं मुसलमाँ भी मज़े में 
इन्सान परेशान यहाँ भी है वहां भी 

उठता है दिलो-जां से धुआं दोनों तरफ़ ही 
ये मीर 'का दीवान यहाँ भी है वहां भी 
दो 
सफ़र में धूप तो होगी ,जो चल सको तो चलो 
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो 

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता 
मुझे गिरा के अगर तुम संभल सको तो चलो 

हर इक सफ़र को है महफूज़ रास्तों की तलाश 
हिफ़ाज़तों की रिवायत बदल सको तो चलो 

यही है ज़िन्दगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें 
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो 

किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं 
तुम अपने आपको खुद ही बदल सको तो चलो 

Wednesday, 16 January 2013

एक गीत -फिर नया दिनमान आया

चित्र -गूगल से साभार 
एक गीत -फिर नया दिनमान आया 
पर्वतों का 
माथ छूकर 
टहनियों का 
हाथ छूकर 
फिर नया दिनमान आया |
नया संवत्सर 
हमारे घर 
नया मेहमान आया |

सूर्यमुखियों के 
खिले चेहरे 
हमें भी दिख रहे हैं ,
कुछ नई 
उम्मीद वाले 
गीत हम भी लिख रहे हैं ,
ज़ेहन में 
भुला हुआ फिर से 
कोई उपमान आया |

पेड़ पर 
ऊंघते परिन्दे 
जाग कर उड़ने लगे हैं ,
नए मांझे 
फिर पतंगों की
तरफ बढ़ने लगे हैं ,
घना कोहरा 
चीरकर मन में 
नया  अरमान  आया |

नई किरणों 
से नई आशा 
नई उम्मीद जागे ,
पत्तियों के 
साथ ताज़े फूल 
गूँथे नए धागे ,
खुशबुओं का 
शाल ओढ़े 
फिर नया पवमान आया |

खूंटियों पर 
टंगे कैलेन्डर 
हवा में झूलते हैं ,
हम इन्हीं 
को देखकर 
बीता हुआ कल भूलते हैं ,
चलो मिलकर 
पियें काफ़ी 
किचन से फ़रमान आया |
[यह गीत दिनांक 28-01-2013 को दैनिक जागरण के सप्तरंग पुनर्नवा साहित्यिक पृष्ठ पर प्रकाशित हो गया है |हम सम्पादक व सुप्रसिद्ध कथाकार राजेन्द्र राव जी के विशेष आभारी हैं ]
चित्र -गूगल से साभार 

Friday, 21 December 2012

एक गीत नववर्ष के आगमन पर -खूंटियों पर टंगे कैलेण्डर नये हैं

चित्र -गूगल से साभार 
नया वर्ष शांति और समृद्धि लाए  ,भ्रष्टाचार आतंक और अत्याचार मिटाए |

एक गीत -खूंटियों पर टंगे कैलेण्डर नये हैं 
दुधमुंहा 
दिनमान पूरब के 
क्षितिज से आ रहा है |
नया संवत्सर 
उम्मीदों की 
प्रभाती गा रहा है |

डायरी के 
गीत बासी हुए 
उनको छोड़ना है ,
अब नई 
पगडंडियों की 
ओर रुख को मोड़ना है ,
एक अंतर्द्वंद 
मन को 
आज भी भटका रहा है |

फिर हवा में 
फूल महकें 
धूप में आवारगी हो ,
पर्व -उत्सव 
के सुदिन लौटें 
मिलन में सादगी हो ,
नया मौसम 
नई तारीखें 
नशा सा छा रहा है |

गर्द ओढ़े 
खूटियों पर 
टंगे कैलेण्डर नये हैं ,
विदा लेकर 
अनमने से 
कुछ पुराने दिन गये हैं ,
तितलियों के 
पंख फूलों से 
कोई सहला रहा है |

फिर समय की 
सीढियों पर 
हो कबीरा की लुकाठी ,
स्वस्ति वाचन
करें निर्भय
मंदिरों में वेदपाठी ,
फिर
जलोटा के सुरों में
भजन संगम गा रहा है |
संगम इलाहाबाद -चित्र गूगल से साभार 

Wednesday, 19 December 2012

एक गीत -स्याह चांदनी चौक हो गया

चित्र -गूगल से साभार 
एक कविता -स्याह चांदनी चौक हो गया 
[यह सिर्फ़ एक कविता नहीं जनाक्रोश है ]
यमुना में 
गर चुल्लू भर 
पानी हो दिल्ली डूब मरो |
स्याह 
चाँदनी चौक हो गया 
नादिरशाहों तनिक डरो |

नहीं राजधानी के 
लायक 
चीरहरण करती है दिल्ली ,
भारत माँ 
की छवि दुनिया में 
शर्मसार करती है दिल्ली ,
संविधान की 
क़समें 
खाने वालों कुछ तो अब सुधरो |

तालिबान में ,
तुझमें क्या है 
फ़र्क सोचकर हमें बताओ ,
जो भी 
गुनहगार हैं उनको 
फांसी के तख्ते तक लाओ ,
दुनिया को 
क्या मुंह 
दिखलाओगे नामर्दों शर्म करो |

क्रांति करो 
अब अत्याचारी 
महलों की दीवार ढहा दो ,
कठपुतली 
परधान देश का 
उसको मौला राह दिखा दो ,
भ्रष्टाचारी 
हाकिम दिन भर 
गाल बजाते उन्हें धरो |

गोरख पांडे का 
अनुयायी 
चुप क्यों है मजनू का टीला ,
आसमान की 
झुकी निगाहें 
हुआ शर्म से चेहरा पीला ,
इस समाज 
का चेहरा बदलो 
नुक्कड़ नाटक बन्द करो |

गद्दी का 
गुनाह है इतना 
उस पर बैठी बूढी अम्मा ,
दु:शासन हो 
गया प्रशासन 
पुलिस तन्त्र हो गया निकम्मा ,
कुर्सी 
बची रहेगी केवल 
इटली का गुणगान करो |

Tuesday, 18 December 2012

एक गीत -सूरज लगा सोने पहाड़ों में

चित्र गूगल से साभार 
एक गीत -सुबह अब देर तक सूरज लगा सोने पहाड़ों में 
सुबह अब 
देर  तक सूरज 
लगा सोने पहाड़ों में |
हमें भी 
आलसी, मौसम 
बना देता है जाड़ों में |

गुलाबी होंठ 
हाथों में 
लिए काफी जगाते हैं ,
लिहाफों में 
हम बच्चों की 
तरह ही कुनमुनाते हैं ,
न चढ़ती है 
न खुलती 
सिटकिनी ऊँचे किवाड़ों में |

कुहासे में 
परिंदे राह 
मीलों तक भटक जाते ,
कभी गिरकर के 
पेड़ों की 
टहनियों में अटक जाते ,
कोई कुश्ती में 
धोबी पाट 
दिखलाता अखाड़ों में |

नदी में 
चोंच से
लड़ते हुए पंछी लगे तिरने ,
गगन में 
सूर्य के घोड़े 
कुहासे में लगे घिरने ,
हवा का 
शाल पश्मीना 
चिपक जाता है ताड़ों में |

किसी को भी 
बुलाओ तो 
नहीं अब सुन रहा कोई ,
नया आलू 
अंगीठी में 
पलटकर भुन रहा कोई ,
खनक 
वैसी नहीं अब 
रात में बजते नगाड़ों में |

Thursday, 13 December 2012

एक गीत -शायद मुझसे ही मिलना था

चित्र -गूगल से साभार 
एक गीत -शायद मुझसे ही मिलना था  
बहुत दिनों से 
गायब कोई पंछी 
ताल नहाने आया |
चोंच लड़ाकर 
गीत सुनाकर 
फिर -फिर हमें रिझाने आया |

बरसों से 
सूखी टहनी पर 
फूल खिले ,लौटी हरियाली ,
ये उदास 
सुबहें फिर खनकीं 
लगी पहनने झुमके ,बाली ,
शायद मुझसे 
ही मिलना था 
लेकिन किसी बहाने आया |

धूल फांकती 
खुली खिड़कियाँ 
नये -नये कैलेण्डर आये ,
देवदास के 
पागल मन को 
केवल पारो की छवि भाये ,
होठों में 
उँगलियाँ फंसाकर 
सीटी मौन बजाने आया |

सर्द हुए 
रिश्तों में खुशबू  लौटी 
फिर गरमाहट आई ,
अलबम खुले 
और चित्रों को 
दबे पांव की आहट भाई ,
कोई पथराई 
आँखों को 
फिर से ख़्वाब दिखाने आया |

दुःख तो 
बस तेरे हिस्से का 
सबको साथी गीत सुनाना ,
कोरे पन्नों 
पर लिख देना 
प्यार -मोहब्बत का अफ़साना ,
मैं तो रूठ गया था 
ख़ुद से 
मुझको कौन मनाने आया |
चित्र -गूगल से साभार 

एक गीत -शरद पूर्णिमा पर

  शरद पूर्णिमा चित्र साभार गूगल  ओ शरद की  पूर्णिमा  स्वागत तुम्हारा है. आज का  मौसम अलौकिक  और प्यारा है. खीर के  सुंदर कटोरे  छतों पर रखना...