Sunday, 16 August 2026

एक ग़ज़ल -चाँद की महफ़िल में

 

चित्र साभार गूगल 

चाँद की महफ़िल में हर दिन इतराता है 

प्यासा बादल ही दरिया तक आता है 


गुलशन में ही फूल, तितलियाँ मत ढूंढो 

मौसम जूड़े में भी फूल खिलाता है 


सूरदास को दरबारों से क्या लेना 

वह तो वृंदावन को गीत सुनाता है 


रिश्ते नाते गाँव -शहर में भूल गए 

गाँव का मौसम अब भी रोज बुलाता है 


वनवासी प्रभु को छोड़ा इंसानों ने 

वानर कुल मुश्किल में साथ निभाता है 


खिड़की से परदा थोड़ा सा खिसका है 

कोई होने का अहसास दिलाता है 


फूल पे बैठी तितली भौँरे चले गए 

भींगे मौसम से पत्थर बतियाता है 

महाकवि सूरदास चित्र साभार गूगल 

चित्र साभार गूगल 


10 comments:

  1. बहुत सुंदर गज़ल सर।
    सादर।
    --------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार १८ अगस्त २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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    Replies
    1. सादर अभिवादन. आपका हृदय से आभार

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  2. बहुत खूब, सुन्दर रचना
    सादर !

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  3. Replies
    1. हार्दिक आभार पल्लवी जी. सादर अभिवादन

      Delete
  4. सुंदर अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक आभार. सादर अभिवादन

      Delete

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