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| चित्र साभार गूगल |
एक गीत -बारिश की फुहार में भींगे
बारिश की
फुहार में भींगे
फूलों वाला गीत कहाँ है?
झुर झुर झुर झुर
हवा, नीम के
नीचे बैठा मीत कहाँ है?
कीचड़ सने
पाँव हैं लेकिन
धानी सपने हरे धान के,
सूखे घाट
बनारस वाले
किस्से सुनते रहे पान के,
सड़कों पर
कोलाहल पसरा
काशी का संगीत कहाँ है?
कालिदास के
मेघदूत की
आँखों में भी पानी कम है,
कड़ी धूप में
उजले बादल
देख देख जंगल बेदम है,
टूटी रीलों वाले
कैसेट में
गाता जगजीत कहाँ है?
पाट नदी के
सूखे सूखे
टूटी नौका चाँद निहारे,
अंजुरी भर
जल ढूंढ़ रहे हैं
जंगल जंगल हिरन कुँवारे,
साँझ ओसारे
जलते दीपक
ढूंढ रहे मनमीत कहाँ है?
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| चित्र साभार गूगल |
कवि /गीतकार
जयकृष्ण राय तुषार


आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 25 जून, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
ReplyDeleteआपका हृदय से अभार
Deleteहृदयस्पर्शी गीत है यह आपका तुषार जी
ReplyDeleteहार्दिक आभार सर. नमस्कार
Deleteबेहतरीन
ReplyDeleteहार्दिक आभार भाई.
Deleteआपकी कविता बारिश, गाँव, बनारस और बदलते समय की उदासी को बहुत सुंदर ढंग से सामने लाती है। हर पंक्ति में एक खोई हुई दुनिया की तलाश दिखाई देती है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.
ReplyDeleteअधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
धन्यवाद!
हार्दिक आभार. वकालत के पेशे में कुछ लिखने का प्रयास कर लेता हूँ यही बहुत है. सादर अभिवादन
Deleteसुंदर रचना
ReplyDeleteआपका हृदय से आभार
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