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प्रभु श्रीराम |
एक ग़ज़ल --
कोई मौसम कहाँ सूरज को बुझा देता है
शांत मौसम में हरा पेड़ गिरा देता है
ये वही जाने किसे, कौन सज़ा देता है
सब उजाले में शहँशाह समझते खुद को
रात में नींद में इक ख़्वाब डरा देता है
उसका घर वैसा ही है जैसा बना है मेरा
आदतन फिर भी वो शोलों को हवा देता है
बुझ गए जब भी दिए दोष हवाओं का रहा
कोई मौसम कहाँ सूरज को बुझा देता है
स्वर्ण की जलती हुई लंका ही मिलती है उसे
राम को जब कोई हैवान भुला देता है
कवि -शायर जयकृष्ण राय तुषार
सादर नमस्कार ,
ReplyDeleteआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (2-8-22} को "रक्षाबंधन पर सैनिक भाईयों के नाम एक पाती"(चर्चा अंक--4509)
पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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कामिनी सिन्हा
हार्दिक आभार आपका. सादर अभिवादन
Deleteवाह तुषार जी...पद्य की हर विधा आपकी लेखनी की कायल बन जाती है...बहुत खूब...👏👏👏
ReplyDeleteआपका हृदय से आभार सर. सादर अभिवादन
Deleteशांत मौसम में हरा पेड़ गिरा देता है
ReplyDeleteये वही जाने किसे, कौन सज़ा देता है..
गहन चिंतन .. सराहनीय रचना ।
उम्दा लेखन!
ReplyDeleteबेहतरीन।
सब उजाले में शहँशाह समझते खुद को
ReplyDeleteरात में नींद में इक ख़्वाब डरा देता
वाह!!!
बहुत ही लाजवाब गजल
बहुत सुंदर
ReplyDeleteवाह! बहुत खूब! दाद स्वीकारें.
ReplyDeleteहार्दिक आभार आपका. सादर अभिवादन
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