Saturday, 8 May 2021

एक गीत - फिर गुलाबी फूल ,कलियों से लदेंगी नग्न शाखें

 

चित्र -साभार गूगल 




एक गीत -
फिर गुलाबी फूल ,कलियों से लदेंगी  नग्न शाखें 

फिर  गुलाबी 
फूल ,कलियों से
लदेंगी  नग्न शाखें   |
पर हमारे 
बीच होंगी नहीं 
परिचित कई आँखें |

यह अराजक 
समय ,मौसम 
भूल जाएगा जमाना ,
फिर किताबों में 
पढ़ेंगे गाँव का 
मंज़र  सुहाना ,
देखकर 
हम मौन होंगे 
तितलियों की कटी पाँखेँ |

झील में 
खिलते कंवल,  
मछली नदी में जाल होंगे ,
नहीं होगा 
स्वर तुम्हारा 
साज सब करताल होंगे ,
गाल पर रूमाल 
होंगे 
डबडबाई हुई आँखें |

ज्ञान और विज्ञान 
का सब दम्भ 
कैसे है पराजित ,
प्रकृति के 
उपहास का यह 
लग रहा  परिणाम किंचित ,
अब घरों की 
खिड़कियाँ हैं 
जेल की जैसे सलाखें |

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 
चित्र -साभार गूगल 


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