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चित्र -गूगल सर्च इंजन से साभार |
पर ज़माने को यकीं है वो मेरे प्यार में है
चल के काँटों में लिखें आज कोई ताज़ा गज़ल
फूल का ज़िक्र तो मेरे सभी अशआर में है
उससे मैं किस तरह अपने गम -ए -हालात कहूँ
आज वो खुश है बहुत दावत -ए -इफ़्तार में है
डूबना है तो चलो गहरे समन्दर में चलें
देख लें हौसला कितना मेरी पतवार में है
ऐ हरे पेड़ जरा सीख ले झुकने का हुनर
आज तूफान बहुत तेज है ,रफ़्तार में है
मेरी मुश्किल है नहीं वक्त के साँचे में ढला
ढल के पत्थर जो खिलौना हुआ बाज़ार में है
बाढ़ में बर्फ़ सा गल जायेगा ये तेरा मंका
मेरी मुश्किल है नहीं वक्त के साँचे में ढला
ReplyDeleteढल के पत्थर जो खिलौना हुआ बाज़ार में है
हर शेर लाजवाब है राय साहब , बयां करता है तबियत से लिखा है जिगर -ए- ज़ार से ...../ बमुश्किल मिलते हैं ....शुक्रिया जी /
मेरी मुश्किल है नहीं वक्त के साँचे में ढला
ReplyDeleteढल के पत्थर जो खिलौना हुआ बाज़ार में है
क्या कह गए हैं आप| वाह वाह वाह|
गज़ब की प्रभावी अभिव्यक्ति।
ReplyDeleteचल के काँटों में लिखें आज कोई ताज़ा गज़ल
ReplyDeleteफूल का ज़िक्र तो मेरे सभी अशआर में है
Bahut hee sundar!
मेरी मुश्किल है नहीं वक्त के साँचे में ढला
ReplyDeleteढल के पत्थर जो खिलौना हुआ बाज़ार में है
वाह वाह वाह
तुषार जी मतले से मक्ता तक हर एक शेर बार बार दिल से दाद दाद देने को मजबूर कर देता है
जिंदाबाद
ढल के पत्थर जो खिलौना हुआ बाज़ार में है
ReplyDeleteबहुत खूब ...पूरी गज़ल अपने में एक समग्र प्रभाव तो रखे ही हुए हैं एक एक शेर/अशआर खुद में बलंदी का अहसास कराते हैं !
Pyari gazal...badhai.
ReplyDeleteखूबसूरत ग़ज़ल...
ReplyDelete"मेरी मुश्किल है नहीं वक्त के साँचे में ढला
ढल के पत्थर जो खिलौना हुआ बाज़ार में है "
...
सुन्दर प्रस्तुति,गणेश चतुर्थी की शुभकामनायें .
ReplyDeleteडूबना है तो चलो गहरे समन्दर में चलें
ReplyDeleteदेख लें हौसला कितना मेरी पतवार में है
waah, kya baat hai
चल के काँटों में लिखें आज कोई ताज़ा गज़ल
ReplyDeleteफूल का ज़िक्र तो मेरे सभी अशआर में है.
प्रभावी अभिव्यक्ति .......
hamesha si manohar krati!
ReplyDeleteमेरी मुश्किल है नहीं वक्त के साँचे में ढला
ReplyDeleteढल के पत्थर जो खिलौना हुआ बाज़ार में है
बहुत खूब.... बेहतरीन ग़ज़ल
चल के काँटों में लिखें आज कोई ताज़ा गज़ल
ReplyDeleteफूल का ज़िक्र तो मेरे सभी अशआर में है
अद्भुत!
फूल का ज़िक्र तो मेरे सभी अशआर में है ... कितनी सहजता से आप गहरी बात कह जाते हैं।
meri mushkil hai nahi waqt ke sanche me dhala. dhal ke patthar, dhal ke patthar jo khilauna huaa bajar men hai. lajavab sher ke liye badhaee.
ReplyDeleteबहुत बढ़िया लिखा है आपने! गहरे भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार ग़ज़ल !
ReplyDeleteआपको एवं आपके परिवार को गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनायें!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://seawave-babli.blogspot.com/
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
चल के काँटों में लिखें आज कोई ताज़ा गज़ल
ReplyDeleteफूल का ज़िक्र तो मेरे सभी अशआर में है
क्या बात है, तुषार जी..
बहुत बढ़िया ग़ज़ल।
ख़ूबसूरत ग़ज़ल...
ReplyDeleteबहुत खूब ... बहुत उम्दा गज़ल है ...
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