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| चित्र -गूगल से साभार |
सूखा हो
या बाढ़
मौसमों के आधीन रहे |
मेघदूत
अब खेतों की
हरियाली छीन रहे |
परजा का दुःख
भूले आये कितने
राजा -रानी ,
आदमखोर
व्यवस्था की
कुछ बदली नहीं कहानी ,
आजादी के
सपने
कागज पर रंगीन रहे |
इंदर राजा
राजसभा में
मुजरे देख रहे ,
मौन सभासद
अपनी -अपनी
रोटी सेंक रहे ,
हम महलों के
कचराघर में
कूड़ा बीन रहे |
आंधी -पानी
तेज हवा के
झोंकों से लड़ते ,
हम हारिल
पंजे में सूखी
टहनी ले उड़ते ,
आराकश
बस पेड़
बस पेड़
काटने में तल्लीन रहे |
मेले -हाट
प्रदर्शनियाँ सब
शहरों के हिस्से ,
भूखे पेट
कहाँ तक सुनते
अम्मी के किस्से ,
अपनी दुआ
कुबूल कहाँ
उनकी आमीन रहे |
