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एक गीत -बाढ़ की विभीषिका पर
डूब गए
पानी में
पेड़ हरसिंगार के।
स्वप्न गिरे
औंधे मुँह
पूजा और प्यार के ।
द्वार-द्वार
गंगा और
जमुना की लहरें हैं,
बस्ती में
नावें हैं
मदद और पहरे हैं,
कजली चुप
फीके रंग
सावनी फुहार के ।
नदियों के
पेटे में
एक नया प्रयाग है,
चूल्हों में
पानी है
बुझी हुई आग है,
मछली सा
तैर रहे
आदमी कछार के ।
जिनके
घर-बार
हुए वो भी बंजारों से,
खतरा है
नदियों के
टूटते किनारों से,
चाँदनियों
के चेहरे
हैं बिना सिंगार के ।
कवि-जयकृष्ण राय तुषार
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चित्र साभार गूगल |
जी नमस्ते ,
ReplyDeleteआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज शनिवार (१४-०८-२०२१) को
"जो करते कल्याण को, उनका होता मान" चर्चा अंक-४१५६ (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
हार्दिक आभार आपका।सादर नमस्कार
Deleteबाढ़ की विभीषिका पर हृदय स्पर्शी सृजन।
ReplyDeleteबहुत सुंदर।
हार्दिक आभार आपका।सादर अभिवादन
Deleteबाढ़ की विभीषिका पर कितनी गहराई से लिखा है | पूरा दृश्य जैसे आँख के सामने तैर गया ,जो लोग बढ़ में फंसे हैं उनकी कल्पना करते ही आँख नम हो गई |
ReplyDeleteहार्दिक आभार आपका।सादर अभिवादन
Deleteहृदय को विदीर्ण कर देने वाली कविता रची है तुषार जी आपने। आपकी लेखनी से प्रायः मन में सुंदर-सुकोमल अनुभूतियां जागृत करने वाली कविताएं प्रवाहित होती हैं। आज यथार्थ को प्रदर्शित करती आपकी इस कविता का पारायण करते समय मुझे यह अनुभव हुआ कि आपका रचना-धर्म किसी सीमा में बंधा हुआ नहीं है।
ReplyDeleteआपकी टिप्पणी में मेरी अतिशय प्रशंसा शायद मुझसे अगाध स्नेहवश हो जाती है।कवि तो निमित्त मात्र होता है लिखती तो वाग्देवी है।जिससे जो चाहे लिखवा ले ।आपके प्रति हृदय से आभार ।सादर प्रणाम
Deleteहृदय स्पर्शी सृजन
ReplyDeleteहार्दिक आभार आपका
Deleteबहुत ही मार्मिक और हृदयस्पर्शी रचना!
ReplyDeleteहार्दिक आभार आपका
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