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| चित्र साभार गूगल |
एक पुराना लोकभाषा गीत
लोकसंस्कृति, गाँव की रौनक़, उत्सवजीविता को, लोकपरम्परा को याद करती लोकभाषा कविता.सादर अभिवादन सहित
एक लोकभाषा गीत -मेल -जोल बैठकी नदारद
काटै दौड़इ साँझ, भोरहरी
बिना फूल कै डाल बा.
चिरई चुनमुन गायब होय गैं
बिना कमल के ताल बा.
मेल -जोल बैठकी नदारद
बिरहा, कजरी, कव्वाली
हलुवा, पूरी के प्रसाद से
वंचित डिह, माता काली
घर में टी वी चैनल, बाहर
बिग बजार औ मॉल बा
पान दान हुक्का संग छूटल
किस्सागोई माई कै
आभासी दुनिया में गुम हौ
चुहुल ननद भौजाई कै
कइसे मरल आँख कै पानी
ई सौ टका सवाल बा.
भजन न जोगी सारंगी कै
कुटिया, मठ सन्नाटा हौ
पक्की सड़क बनल हौ लेकिन
कदम, कदम पर काँटा हौ
नेता डेंगूँ कहैँ धरम के
कवन देश कै हाल बा.
खट्टी, मीठी जामुन कै रंग
याद न महुवा बारी कै
पीली पीली सरसों भूलल
भूलल धान कियारी कै
पइसा बढ़ल गरीबी गायब
पर उत्सव कंगाल बा.
बुलबुल, मैना, पपिहा, कोयल
लरिका ना पहिचानै ल
बाप -मतारी छोड़िके
कउनो रिश्ता ना ई जानै ल
कहाँ ओसारे, कहाँ दुवारे
गैंता और कुदाल बा.
जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
चित्र साभार गूगल


आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 10 सितंबर, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
ReplyDeleteआपका हृदय से आभार.
Deleteसुंदर
ReplyDeleteआपका हार्दिक आभार
Deleteवाह! रोचक लोकगीत
ReplyDeleteआपका हार्दिक आभार. सादर अभिवादन
Deleteसबकुछ तो पीछे छूटता जा रहा है , कवि की लेखनी ही इसे कुछ सँभाल सकती है ।
ReplyDeleteआपका हृदय से आभार. सादर नमस्ते
Deleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteसादर अभिवादन. हार्दिक आभार
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