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| चित्र साभार गूगल |
एक नवगीत -जेब कटी फागुन की
जेब फटी
फागुन की
झर गए ग़ुलाल.
फूलों में
गंध नहीं
मौसम कंगाल.
चैता के
गीत कहाँ
शहरों के हिस्से,
वक़्त की
किताबों में
टेसू के किस्से,
स्मृतियों में
मृदंग
बजते करताल.
रफू किए
चुनरी में
वासंती खेत में,
हिरण
झुण्ड प्यासा है
नदियों की रेत में
मौसम की
आँखों में
टूटा है बाल.
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| चित्र साभार गूगल |


बसंत की बाट जोहते ह्रदय की एक अनकही टीस हैं रचना में! हमारी पीढ़ी ने तो विशुद्ध बसंत को देखा है जिया है, पर हमारी भावी पीढ़ियां क्या देखेंगी और कैसे जान पाएगी
ReplyDeleteउस बसंत के बारे में 🙏😟
आपका हृदय से आभार. सादर अभिवादन
Deleteआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द शनिवार 31 जनवरी , 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
ReplyDeleteआपका हार्दिक आभार
Deleteकिताबों में
ReplyDeleteटेसू के किस्से,
वाह - वाह
आपका हार्दिक आभार. सादर अभिवादन
Deleteमार्मिक पर मीठी सी रचना
ReplyDeleteहार्दिक आभार आपका. सादर अभिवादन
Deleteसुंदर
ReplyDeleteआपका हृदय से आभार. सादर अभिवादन
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