Tuesday, 20 January 2026

मेरी किताब पर समीक्षा. श्री श्रीप्रकाश मिश्र जी

 

प्रसिद्ध लेखक/कवि/समीक्षक श्री श्रीप्रकाश मिश्र जी
समीक्षक श्री श्रीप्रकाश मिश्र कवि कथाकर और सुप्रसिद्ध आलोचक हैं. उन्नयन पत्रिका में सम्पादक भी रहे हैं. आभार मिश्र जी का.

उर्दू ग़ज़ल है इश्क, मोहब्बत, महल में है 

जीवन का लोकरंग तो हिंदी ग़ज़ल में है।


जयकृष्ण राय ' तुषार ' जब ऐसा लिखते हैं तब साफ जाहिर होता है कि वे हिंदी और उर्दू ग़ज़ल की परंपरा को जानते हैं और उनके फर्क को भी जानते हैं। चूकि वे ग़ज़ल हिंदी की लिख रहे हैं तो उसकी परंपरा को तो वे स्वयं निभा ही रहे होंगे और पाठक को उसको ध्यान में रखकर उसे पढ़ना या सुनना चाहिए। तब हम पाते हैं कि भारतीय जीवन के लोकरंग में जो परिवर्तन तेजी से आ रहा है उसे वे छोटी -  छोटी बातों के सहारे दर्ज करते हैं। परिवर्तन के दो रंग होते हैं --शुभ और अशुभ। जो सदियों से आजमाए जीवन -मूल्यों को समृद्ध करता है, वह वरेण्य होता है, जो उसे छीजाता है, उससे किनारा करने की जरूरत होती है। इसी तरह ऐतिहासिक जीवन -प्रवाह में जो कल्मष बहता चला आया है, उसे न केवल उजागर करने की, उस पर प्रहार करने की भी जरूरत पड़ती है और उसका स्थानापन्न लखे जाने की भी जरूरत पडती है।इन चारों बातों को ध्यान में रख कर जब हम तुषार की ग़ज़लों को पढ़ते हैं तो पाते हैं कि वे अपनी बात हमारी आंखों की जद में आने वाली रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से करते हैं। इससे उनकी जीवन की समृद्धि पर सूक्ष्मता से देखने की सामर्थ्य का भान तो होता है, उनकी चिंता का क्षितिज क्या है, यह भी गोचर हो जाता है। वे आज की स्त्री की साज - सज्जा के बारे में ही बात नहीं करते, उसकी सोच की भी बात करते हैं। वे सिर्फ दलित के शोषण की ही बात नहीं करते, हर बात में अपना ही हिस्सा खोजने की मानसिकता की भी बात करते हैं। जन के पक्ष में खड़े होने वाले लोगों के कलाप की विसंगतियों की ही बात नहीं करते, उनके निजी स्वार्थों की टकराहट की बात करते हैं जो संघर्ष में एका पैदा होने नहीं देती। लिखते हैं:--


सबने केवल धोखे बांटे सबने की गद्दारी जी

अबकी अपना वोट कहां पर देंगे आप तिवारी जी


जयकृष्ण आजमगढ़ के हैं ऐसे सरहदी इलाके के कि कब आजमगढ़ के हैं कब जौनपुर के, पता ही नहीं चलता। पर इसके नाते दलबदलू नहीं है, जीवन की वाचालता का पता चलता है। पढ़े हैं, बनारस में,वकालत करते हैं इलाहाबाद में। बनारस की आबोहवा में अलमस्ती अधिक है, इलाहाबाद में उसकी कसौटी थोड़ा आभिजात्य है। बनारस शहरनुमा गांव है, इलाहाबाद गांवनुमा शहर। बनारस में व्यवहार का लद्दडपन और संवेदना का खाटीपन। इलाहाबाद में रगड़ से उपजा नफासत है और विचारों का खुलापन। इलाहाबाद जो देता है वह पीढ़ियों से बसे स्थानीय लोगों के माध्यम से नहीं देता, नये आये लोगों के माध्यम से देता है। पर तभी जब वे इलाहाबाद के अखाड़े में रगड़ जाते हैं। यही कारण है कि आज बाहर से आए तमाम अकादमिक और प्रतिभासंपन्न लोग कुछ विशेष नहीं दे पा रहे हैं, क्योंकि इस रगड़ाई से भागे हुए हैं। पर तुषार दे पा रहे हैं , क्योंकि अपनी अनुकूलित निजी दुनिया से बाहर आ कर जनजीवन में भागीदार बन कर लिख रहे हैं। तभी वे देख पा रहे हैं कि


गले में क्रास पहने हैं  मगर चंदन लगाती है 

सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है


या फिर 


आसमानों के क ई रंग हैं सूरज हम तो 

एक ही रंग में पश्चिम की दिशा ढलते हैं 


इस संकलन को देखते हुए उम्मीद बनती है कि वे इलाहाबाद के साहित्यिक माहौल में जबरदस्त हस्तक्षेप तो करेंगे ही,उनका अवदान देश के स्तर पर पसरेगा। बाकी बातें संग्रह पढ़ कर तय करें।



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