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| सफऱ के बाहर ग़ज़ल संग्रह कवि /प्रकाशक अरुण कुमार |
रोशनी की तलाश करते हैं
अब ये मंज़र उदास करते हैं
या ग़र थोड़ी औकात बड़ी हो जाती है
रिश्तों से सौगात बड़ी हो जाती है
या
लूट के समान से घर भर गए
छोड़िये इंसान कितने मर गए
आपने फेंके थे जितनी दूर तक
उससे भी आगे बहुत पत्थर गए
या
गुलों से ख़ार का किस्सा अलग है
मेरे किरदार का किस्सा अलग है
यह संग्रह ग़ज़ल समीक्षक डॉ नित्यानंद श्रीवास्तव जी को समर्पित है
मैं गज़लकार और प्रकाशक अरुण कुमार को इस संग्रह के लिए बधाई और शुभकामनायें देता हूँ. पाठकों के बीच यह लोकप्रिय हो
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| परिचय |
सफऱ के बाहर
मूल्य-250
प्रकाशक-भूमिजा समस्तीपुर, बिहार
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