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| चित्र साभार गूगल |
साँवला सा
हो गया है
चाँदनी का रूप.
फूल -पत्तों में
खड़ी है
शाल ओढ़े धूप.
घने कोहरे
में नदी तट,
नाव सोई है,
साफ़ मौसम
की कहीं
तसवीर खोई है,
बन्द घर
पीने लगे हैं
चाय, कॉफी, सूप.
नई दिल्ली में
किताबों की
नुमाइश है,
विश्व भाषा
बने हिन्दी
यही ख़्वाहिश है,
हर विधा में
सजे सुन्दर
ज्ञान का स्तूप.
कुछ दिनों के
बाद
पीले फूल महकेंगे,
खुशबुओं का
ख़त लिए
फिर भ्रमर बहकेंगे,
फिर यही
मौसम लगेगा
इस धरा का भूप.
कवि -जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |


आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 12 जनवरी 2026 को लिंक की जाएगी है....
ReplyDeletehttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
!
आपका हृदय से आभार
Deleteशाल ओढ़े धूप का बड़ा सुंदर रूप शब्दों में चित्रित हुआ है
ReplyDeleteआपका हृदय से आभार. सादर अभिवादन
Delete
ReplyDeleteआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 14 जनवरी 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
अथ स्वागतम शुभ स्वागतम।
आपका हृदय से आभार. सादर अभिवादन
Deleteशाल ओढ़े धूप - सुंदर बिम्ब
ReplyDeleteWahh
हार्दिक आभार. सादर अभिवादन
Deleteसुंदर प्रस्तुति
ReplyDeleteहार्दिक आभार. सादर प्रणाम
DeleteBahut sundar bani hai kavita
ReplyDeleteआपका हृदय से आभार. सादर अभिवादन
Deleteबहुत सुंदर गीत
ReplyDeleteआपका हृदय से आभार. सादर अभिवादन
Deleteइस गीत की प्रशंसा हेतु शब्द कम पड़ रहे हैं तुषारजी
ReplyDeleteआपका ह्रदय से आभार. सादर अभिवादन सर
Deleteसुन्दर
ReplyDeleteहार्दिक आभार आपका
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