![]() |
| चित्र साभार गूगल |
साँवला सा
हो गया है
चाँदनी का रूप.
फूल -पत्तों में
खड़ी है
शाल ओढ़े धूप.
घने कोहरे
में नदी तट,
नाव सोई है,
साफ़ मौसम
की कहीं
तसवीर खोई है,
बन्द घर
पीने लगे हैं
चाय, कॉफी, सूप.
नई दिल्ली में
किताबों की
नुमाइश है,
विश्व भाषा
बने हिन्दी
यही ख़्वाहिश है,
हर विधा में
सजे सुन्दर
ज्ञान का स्तूप.
कुछ दिनों के
बाद
पीले फूल महकेंगे,
खुशबुओं का
ख़त लिए
फिर भ्रमर बहकेंगे,
फिर यही
मौसम लगेगा
इस धरा का भूप.
कवि -जयकृष्ण राय तुषार
![]() |
| चित्र साभार गूगल |


No comments:
Post a Comment
आपकी टिप्पणी हमारा मार्गदर्शन करेगी। टिप्पणी के लिए धन्यवाद |