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| चित्र साभार गूगल |
एक गीत-हरे धान के इन फूलों में
हरे धान के
इन फूलों में
चावल होंगे काले-गोरे ।
बादल-बिजली
धूप-छाँह में
हँसते हैं,बतियाते हैं ये,
चिकनी,भूरी
करइल,दोमट
सबमें गीत सुनाते हैं ये,
बच्चे उड़ते
पंख लगाकर
दूध -भात के देख कटोरे ।
कभी मूँगारी
हो जाते हैं कभी
जलप्रलय में बहते हैं,
पक जाने पर
रंग सुनहरे
लिए हमेशा ये रहते हैं,
इनकी आमद से
भर जाते कितने
कोठिला,कितने बोरे ।
मजदूरिन
होठों की लाली
इनसे ही कंगन औ बाली,
चिरई -चुनमुन
कजरी गैया
सबकी भरती इनसे थाली,
अक्षत,तिलक
यजन की वेदी
रस्म निभाते चावल कोरे ।
कवि-जयकृष्ण राय तुषार
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