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| चित्र -साभार गूगल |
एक ग़ज़ल -
नदी प्यासे परिंदो को तो बस पानी पिलाती है
ज़माने भर को मलबा और पत्थर कब दिखाती है
नदी प्यासे परिंदो को तो बस पानी पिलाती है
बहुत गुस्से जब हो तब भँवर में खींच लेती है
वगरना डूबती कश्ती,मुसाफ़िर को बचाती है
भले वह मायके में हो हरेक बर्तन में हँसती है
मेरी यादों की इक बुलबुल हमारे साथ गाती है
हवा संग धूल भी लाता है पर मैंने खुला रक्खा
इस रौशनदान में आकर मुझे चिड़िया जगाती है
हमारी ख़्वाहिशें रहती हैं बस सोने के फ्रेमों में
ये चिड़िया घर बनाने के लिए तिनका जुटाती है
तुम्हें दिल्ली पहुँचना है तो कैसे हमसफ़र होंगे
हमारी ट्रेन नौचंदी ,मुरादाबाद जाती है
अगर हो हौसला दिल में अपाहिज मत उसे कहना
सुधा चन्द्रन जमाने को भरतनाट्यम सिखाती है
बदलते दौर में खंज़र कमर से बाँधकर रखना
भली लड़की को यह दुनिया ही बेचारी बनाती है

