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| चित्र साभार गूगल |
एक ग़ज़ल-
न चूड़ी है, न बिंदी है ,न काजल ,माँग टीका है
ये औरत कामकाजी है ये मंज़र इस सदी का है
बदलते दौर में अब लड़कियाँ भी जेट उड़ाती है
न अब नाज़ुक कलाई है भले चेहरा परी का है
इशारों से कभी लब से कभी आँखों से कहती है
समझदारों को समझाने का ये अच्छा तरीका है
तुम्हारे प्रश्न का उत्तर लिए हातिम सा लौटा हूँ
इसे रख लो मोहब्बत से ये गुलदस्ता अभी का है
ये जल में तैरता है और हवा में उड़ भी सकता है
इसे पिंजरे में मत रखना परिंदा यह नदी का है
तुम्हारा तर्जुमा केवल मोहब्बत करके बैठे सब
तुम्हारे पास तो घर भी चलाने का सलीका है
ये आज़ादी का जलसा था मगर धरने पे बैठे तुम
बताओ जश्न में किस मुल्क में गाना ग़मी का है
जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |

