ग़ज़ल संग्रह "सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है"की समीक्षा आज अमर उजाला में साहित्यिक पेज मनोरंजन में छपी है. लेखक श्री श्री चित्रसेन रजक जी सम्पादक श्री देव प्रकाश चौधरी जी का हृदय से आभार
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एक ग़ज़ल -चाँद की महफ़िल में
चित्र साभार गूगल चाँद की महफ़िल में हर दिन इतराता है प्यासा बादल ही दरिया तक आता है गुलशन में ही फूल, तितलियाँ मत ढूंढो मौसम जूड़े में भ...
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चित्र -साभार गूगल एक ग़ज़ल-चाँदनी का रंग भी सादा न था प्यार करने का कोई वादा न था पर तेरी नफ़रत का अंदाजा न था बाद की जंगों में रावण बच गए...
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चित्र -गूगल से साभार प्यार के हम गीत रचते हैं इन्हीं कठिनाइयों में खिल रहा है फूल कोई धान की परछाइयों में | सो रहे खरगोश से दिन पर्...
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चित्र साभार गूगल एक ग़ज़ल ग़ुम हुए अपनी ही दुनिया में सँवरने वाले हँसके मिलते हैं कहाँ राह गुजरने वाले घाट गंगा के वही नाव भी केवट भी वह...



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