Tuesday, 23 February 2010

गंगा हमको छोड़ कभी मत इस धरती से जाना

चित्र गूगल से साभार 
गंगा हमको छोड़ कभी मत
इस धरती से जाना।
तू जैसे कल तक बहती थी
वैसे बहती जाना।

तू है तो ये पर्व अनोखे
वेद मंत्र सन्यासी,
तुझसे कनखल हरिद्वार है
तुझसे पटना काशी,
जहॉं कहीं हर हर गंगे हो
पल भर तू रुक जाना

भक्तों के उपर जब भी
संकट गहराता है
सिर पर तेरा हाथ
और आंचल लहराता है
तेरी लहरों पर है मॉं
हमको भी दीप जलाना

तू मॉं नदी सदानीरा हो
कभी न सोती हो
गोमुख से गंगासागर तक
सपने बोती हो
जहॉं कहीं बंजर धरती हो
मॉं तुम फूल खिलाना।

राजा रंक सभी की नैया
मॉं तू पार लगाती
कंकड  पत्थर शंख सीपियॉं
सबको गले लगाती
तेरे तट पर बैठ अघोरी
सीखे मंत्र जगाना

छठे छमासे मॉं हम
तेरे तट पर आयेंगे
पान फूल सिन्दूर चढ़ाकर
दीप जलायेंगे
मझधारों में ना हम डूबें
मॉं तू पार लगाना।

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