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| चित्र साधार गूगल |
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एक ताज़ा सामयिक गीत
केरल से
उड़ या
मेघा बंगाल से.
खुशबू वाले
फूल
झर रहे डाल से.
हांफ रहे
हैँ हिरण
राम क्या मौसम है,
जंगल में
चिड़ियों का
कलरव बेदम है,
हंस
पियासे
झाँक रहे नभ ताल से.
पारो पोछे
सुबह
पसीना पल्लू से,
हवा गरम
आ रही
श्रीनगर, कुल्लू से,
मोर मोरनी
थके
लग रहा चाल से.
चम्पा, बेला
गुड़हल
मन से खिले नहीं,
इस मौसम
कपोत के
जोड़े मिले नहीं,
उड़ी
इत्र की महक
सभी रुमाल से.
कवि जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
एक सामयिक गीत
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| चित्र साभार गूगल |
एक ग़ज़ल-
ग़ज़ल ये गीत ये किस्सा कहानी छोड़ जाऊँगा
तुम्हारा प्यार ये चेहरा नूरानी छोड़ जाऊँगा
अभी फूलों की खुशबू झील में सुर्खाब रखता हूँ
किसी दिन गुलमोहर ये रातरानी छोड़ जाऊँगा
हमारी प्यास इतनी है कि दरिया सूख जाते हैं
किसी दिन राख, मिट्टी, आग- पानी छोड़ जाऊँगा
अभी चिड़ियों की बंदिश सुन रहा हूँ पेड़ के नीचे
कभी हल बैल ये खेती किसानी छोड़ जाऊँगा
सफ़र में आख़िरी ,नेकी ही अपने साथ जाएगी
ये शोहरत और दौलत ख़ानदानी छोड़ जाऊँगा
कभी सुनना हो मुझको तो मेरा दीवान पढ़ लेना
किताबों में मैं फूलों की निशानी छोड़ जाऊँगा
दिलों की आलमारी में हिफ़ाजत से इसे रखना
इसी घर में मैं सब यादें पुरानी छोड़ जाऊँगा
मैं मिलकर ॐ में इस सृष्टि की रचना करूँगा फिर
ये धरती ,चाँद ,सूरज आसमानी छोड़ जाऊँगा
कवि -जयकृष्ण राय तुषार
| चित्र साभार गूगल |
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| पुस्तक |
लेखक भारती राठौड़ एवं मेहेर वान
डॉ मेहेर वान और भारती राठौड़ की अभी हाल में पुस्तक पेगुइन इंडिया एवं हिन्द पॉकेट बुक्स जिसे पेगुइन ने खरीद लिया है प्रकाशित हुई है. किताब बहुत ही अच्छे शीर्षक के साथ प्रकाशित हुई है. डॉ मेहेर वान वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसन्धान परिषद में वैज्ञानिक हैँ उनकी पत्नी सहलेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैँ. विज्ञान विषय पर उत्कृष्ट लेखन हिंदी में कम हुआ है लेकिन यह पुस्तक बहुत रोचक ढंग से लिखी गयी है. जितना सुन्दर प्रामाणिक अनुसंधान हुआ है उतनी ही सुन्दर सहज भाषा में रामानुजन के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला गया है. प्रारम्भिक दिनों में मेहेर वान आकाशवाणी के युवा कार्यक्रमों से भी प्रयागराज में जुड़े रहे. महान गणितज्ञ रामानुजन के विभिन्न पहलुओं के बखूबी उकेरा गया है. आवश्यक चित्र हस्तलिपि भी पुस्तक को रोचक बनाते हैँ. मेहेर वान और भारती राठौड़ जी को इस पुस्तक के लिए बधाई और शुभकामनायें.
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| चित्र साभार गूगल |
एक ग़ज़ल -
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र -गूगल से साभार |
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| चित्र -गूगल से साभार |
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| चित्र साभार गूगल |
एक ग़ज़ल -इसी से चाँद मुक़म्मल नज़र नहीं आता
सफ़र में धुंध,ये बादल, कभी शजर आता
इसी से चाँद मुक़म्मल नहीं नज़र आता
बताता हाल मैं दरियाओं के परिंदो का
मुझे भी नाव चलाने का कुछ हुनर आता
शहर में खिड़कियाँ, पर्दे हैं आसमान कहाँ
हमारे गाँव में सूरज सुबह ही घर आता
तमाम रेत है, दरिया न पेड़ का साया
हमारी राह में कैसे कोई बशर आता
मकान रिश्ते भी पुरखों के बाँट डाले गए
खिलौना देख के बच्चा नहीं इधर आता
कवि /शायर
जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
सभी चित्र साभार गूगल
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| चित्र साभार गूगल |
एक गीत -इस चिड़िया के उड़ जाने पर
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| चित्र साभार गूगल |
| यह गीत 24 मार्च को अमर उजाला के मनोरंजन पृष्ठ पर प्रकाशित हो गया |
एक होली गीत -रंग वो क्या जो छूट गया
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| बरसाने की लट्ठमार होली चित्र साभार गूगल |
चित्र साभार गूगल एक पुराना लोकभाषा गीत लोकसंस्कृति, गाँव की रौनक़, उत्सवजीविता को, लोकपरम्परा को याद करती लोकभाषा कविता.सादर अभिवादन सहित...