Thursday, 22 January 2026

एक ताज़ा गीत -प्रेम गीत लिखने लगा फूलों में इतवार

 

चित्र साभार गूगल

एक ताज़ा गीत -फूलों में इतवार 


गीत, पपीहा 

बांसुरी 

वासंती श्रृंगार.

प्रेमगीत 

लिखने लगा 

फूलों में इतवार.


पीली -नीली 

चिट्ठियां 

वन में पढ़े पलाश,

नदी किनारे 

खाट पर 

मौसम खेले ताश,

सुबह 

हवा में उड़ रहे 

मेजों से अख़बार.


तन्हा बैठे 

फूल को 

फिर तितली की याद,

मौन मुखर 

करने लगा 

आँखों से संवाद,

राधे राधे 

बोलते 

वृन्दावन, गिरिनार.


पीली सरसों 

देखकर 

प्रमुदित हुए किसान,

तुलसी का 

मानस खुला 

ग़ालिब का दीवान,

सारंगी 

शहनाइयां 

बजने लगे सितार.


कवि /गीतकार

जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल


Tuesday, 20 January 2026

मेरी किताब पर समीक्षा. श्री श्रीप्रकाश मिश्र जी

 

प्रसिद्ध लेखक/कवि/समीक्षक श्री श्रीप्रकाश मिश्र जी
समीक्षक श्री श्रीप्रकाश मिश्र कवि कथाकर और सुप्रसिद्ध आलोचक हैं. उन्नयन पत्रिका में सम्पादक भी रहे हैं. आभार मिश्र जी का.

उर्दू ग़ज़ल है इश्क, मोहब्बत, महल में है 

जीवन का लोकरंग तो हिंदी ग़ज़ल में है।


जयकृष्ण राय ' तुषार ' जब ऐसा लिखते हैं तब साफ जाहिर होता है कि वे हिंदी और उर्दू ग़ज़ल की परंपरा को जानते हैं और उनके फर्क को भी जानते हैं। चूकि वे ग़ज़ल हिंदी की लिख रहे हैं तो उसकी परंपरा को तो वे स्वयं निभा ही रहे होंगे और पाठक को उसको ध्यान में रखकर उसे पढ़ना या सुनना चाहिए। तब हम पाते हैं कि भारतीय जीवन के लोकरंग में जो परिवर्तन तेजी से आ रहा है उसे वे छोटी -  छोटी बातों के सहारे दर्ज करते हैं। परिवर्तन के दो रंग होते हैं --शुभ और अशुभ। जो सदियों से आजमाए जीवन -मूल्यों को समृद्ध करता है, वह वरेण्य होता है, जो उसे छीजाता है, उससे किनारा करने की जरूरत होती है। इसी तरह ऐतिहासिक जीवन -प्रवाह में जो कल्मष बहता चला आया है, उसे न केवल उजागर करने की, उस पर प्रहार करने की भी जरूरत पड़ती है और उसका स्थानापन्न लखे जाने की भी जरूरत पडती है।इन चारों बातों को ध्यान में रख कर जब हम तुषार की ग़ज़लों को पढ़ते हैं तो पाते हैं कि वे अपनी बात हमारी आंखों की जद में आने वाली रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से करते हैं। इससे उनकी जीवन की समृद्धि पर सूक्ष्मता से देखने की सामर्थ्य का भान तो होता है, उनकी चिंता का क्षितिज क्या है, यह भी गोचर हो जाता है। वे आज की स्त्री की साज - सज्जा के बारे में ही बात नहीं करते, उसकी सोच की भी बात करते हैं। वे सिर्फ दलित के शोषण की ही बात नहीं करते, हर बात में अपना ही हिस्सा खोजने की मानसिकता की भी बात करते हैं। जन के पक्ष में खड़े होने वाले लोगों के कलाप की विसंगतियों की ही बात नहीं करते, उनके निजी स्वार्थों की टकराहट की बात करते हैं जो संघर्ष में एका पैदा होने नहीं देती। लिखते हैं:--


सबने केवल धोखे बांटे सबने की गद्दारी जी

अबकी अपना वोट कहां पर देंगे आप तिवारी जी


जयकृष्ण आजमगढ़ के हैं ऐसे सरहदी इलाके के कि कब आजमगढ़ के हैं कब जौनपुर के, पता ही नहीं चलता। पर इसके नाते दलबदलू नहीं है, जीवन की वाचालता का पता चलता है। पढ़े हैं, बनारस में,वकालत करते हैं इलाहाबाद में। बनारस की आबोहवा में अलमस्ती अधिक है, इलाहाबाद में उसकी कसौटी थोड़ा आभिजात्य है। बनारस शहरनुमा गांव है, इलाहाबाद गांवनुमा शहर। बनारस में व्यवहार का लद्दडपन और संवेदना का खाटीपन। इलाहाबाद में रगड़ से उपजा नफासत है और विचारों का खुलापन। इलाहाबाद जो देता है वह पीढ़ियों से बसे स्थानीय लोगों के माध्यम से नहीं देता, नये आये लोगों के माध्यम से देता है। पर तभी जब वे इलाहाबाद के अखाड़े में रगड़ जाते हैं। यही कारण है कि आज बाहर से आए तमाम अकादमिक और प्रतिभासंपन्न लोग कुछ विशेष नहीं दे पा रहे हैं, क्योंकि इस रगड़ाई से भागे हुए हैं। पर तुषार दे पा रहे हैं , क्योंकि अपनी अनुकूलित निजी दुनिया से बाहर आ कर जनजीवन में भागीदार बन कर लिख रहे हैं। तभी वे देख पा रहे हैं कि


गले में क्रास पहने हैं  मगर चंदन लगाती है 

सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है


या फिर 


आसमानों के क ई रंग हैं सूरज हम तो 

एक ही रंग में पश्चिम की दिशा ढलते हैं 


इस संकलन को देखते हुए उम्मीद बनती है कि वे इलाहाबाद के साहित्यिक माहौल में जबरदस्त हस्तक्षेप तो करेंगे ही,उनका अवदान देश के स्तर पर पसरेगा। बाकी बातें संग्रह पढ़ कर तय करें।



Sunday, 18 January 2026

एक पुराना गीत -यह वसंत

 

चित्र साभार गूगल




एक गीत -यह वसंत भी प्रिये !
 तुम्हारे होठों का अनुवाद है 

तुमसे ही 
कविता में लय है 
जीवन में संवाद है |
यह वसंत भी 
प्रिये ! तुम्हारे 
होठों का अनुवाद है |

तुम फूलों के 
रंग ,खुशबुओं में 
कवियों के स्वप्नलोक में ,
लोककथाओं 
जनश्रुतियों में 
प्रेमग्रंथ में कठिन श्लोक में ,
जलतरंग पर 
खिले कमल सी 
भ्रमरों का अनुनाद है |

तुम्हें परखने 
और निरखने में 
सूखी कलमों की स्याही ,
कालिदास ने 
लिखा अनुपमा 
हम तो एक अकिंचन राही
तेरा हँसना 
और रूठना 
प्रियतम का आह्लाद है |
चित्र -गूगल से साभार 

गीत कुम्भ -यह प्रयाग है कवि जयकृष्ण राय तुषार


 मित्रों 2001 महाकुम्भ में इस गीत को मैंने लिखा था. आकाशवाणी कलाकारों ने इसे गाया है विडिओ भाई दिव्यांश द्विवेदी ने बनाया है. आज मौनी अमावस्या है. सभी को हार्दिक शुभ. भारत में और विश्व में सनातन आस्था अपराजेय बनी रही. लोगों का मार्गदर्शन सनातन के संत करते रहें. शुभकामनायें. आप सभी को प्रयाग का पुण्य फल मिले.



Sunday, 11 January 2026

एक गीत -शाल ओढ़े धूप

 

चित्र साभार गूगल
एक गीत मौसम का

साँवला सा 

हो गया है 

चाँदनी का रूप.

फूल -पत्तों में 

खड़ी है 

शाल ओढ़े धूप.


घने कोहरे 

में नदी तट,

नाव सोई है,

साफ़ मौसम 

की कहीं 

तसवीर खोई है,

बन्द घर 

पीने लगे हैं 

चाय, कॉफी, सूप.


नई दिल्ली में 

किताबों की 

नुमाइश है,

विश्व भाषा 

बने हिन्दी 

यही ख़्वाहिश है,

हर विधा में 

सजे सुन्दर 

ज्ञान का स्तूप.


कुछ दिनों के 

बाद 

पीले फूल महकेंगे,

खुशबुओं का 

ख़त लिए 

फिर भ्रमर बहकेंगे,

फिर यही 

मौसम लगेगा 

इस धरा का भूप.

कवि -जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल


Friday, 9 January 2026

पुस्तक समीक्षा -सफऱ के बाहर

 

सफऱ के बाहर ग़ज़ल संग्रह
कवि /प्रकाशक अरुण कुमार
कल डाक से कवि /प्रकाशक अरुण कुमार समस्तीपुर द्वारा भेजा ग़ज़ल संग्रह मिला अच्छी गज़लों का संकलन है इसमें 127 ग़ज़लें हैँ. अरुण कुमार की ग़ज़लें खूबसूरत हैं. इन्होने अपना प्रकाशन भी शुरू किया है. प्रकाशन का नाम भूमिजा है. रेखांकन भी बढ़िया है जिसे अरुण जी ने स्वयं बनाया है.


रोशनी की तलाश करते हैं 

अब ये मंज़र उदास करते हैं 

या ग़र थोड़ी औकात बड़ी हो जाती है 

रिश्तों से सौगात बड़ी हो जाती है 

या 

लूट के समान से घर भर गए 

छोड़िये इंसान कितने मर गए 

आपने फेंके थे जितनी दूर तक 

उससे भी आगे बहुत पत्थर गए 

या 

गुलों से ख़ार का किस्सा अलग है 

मेरे किरदार का किस्सा अलग है 

यह संग्रह ग़ज़ल समीक्षक डॉ नित्यानंद श्रीवास्तव जी को समर्पित है

मैं गज़लकार और प्रकाशक अरुण कुमार को इस संग्रह के लिए बधाई और शुभकामनायें देता हूँ. पाठकों के बीच यह लोकप्रिय हो

परिचय
पुस्तक-ग़ज़ल संग्रह

सफऱ के बाहर

मूल्य-250

प्रकाशक-भूमिजा समस्तीपुर, बिहार
.

Saturday, 3 January 2026

चलो मुश्किलों का हल ढूंढे खुली किताबों में

 

आदरणीय श्री रमेश ग्रोवर जी और श्री आमोद माहेश्वरी जी



एक पुराना गीत सन 2011 में लिखा गया

 चलो मुश्किलों का हल ढूँढें खुली किताबों में 

मित्रों दिल्ली में विश्व पुस्तक मेला 10 जनवरी से 18 जनवरी को लगने वाला है. पुस्तकें सच्ची मित्र होती हैं.


बीत रहे हैं 

दिन सतरंगी 

केवल  ख़्वाबों में |

चलो मुश्किलों 

का हल ढूँढें 

खुली  किताबों में |


इन्हीं किताबों में 

जन- गण -मन 

तुलसी की चौपाई ,

इनमें ग़ालिब -

मीर ,निराला 

रहते हैं परसाई ,

इनके भीतर 

जो खुशबू वो 

नहीं  गुलाबों में |


इसमें कई 

विधा के गेंदें  -

गुड़हल खिलते हैं ,

बंजर  मन  

को इच्छाओं  के  

मौसम मिलते हैं |

लैम्पपोस्ट में 

पढ़िए या फिर 

दफ़्तर, ढाबों में |


तनहाई से 

हमें किताबें 

दूर भगाती हैं ,

ज्ञान अगर 

खुद सो जाए 

तो उसे जगाती हैं ,

इनमें  जो 

परवाज़ ,कहाँ 

होती सुर्खाबों में ?


इनको पढ़कर 

कई घराने 

गीत सुनाते हैं ,

इनकी  जिल्दों में 

जीवन के रंग 

समाते हैं ,

ये न्याय सदन ,

संसद के सारे 

प्रश्न -जबाबों में |





Wednesday, 31 December 2025

एक गीत -नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ

 

चित्र साभार गूगल


एक गीत -खूंटियों पर टंगे कैलेण्डर नये हैं 

दुधमुंहा 
दिनमान पूरब के 
क्षितिज से आ रहा है |
नया संवत्सर 
उम्मीदों की 
प्रभाती गा रहा है |

डायरी के 
गीत बासी हुए 
उनको छोड़ना है ,
अब नई 
पगडंडियों की 
ओर रुख को मोड़ना है ,
एक अंतर्द्वंद 
मन को 
आज भी भटका रहा है |

फिर हवा में 
फूल महकें 
धूप में आवारगी हो ,
पर्व -उत्सव 
के सुदिन लौटें 
मिलन में सादगी हो ,
नया मौसम 
नई तारीखें 
नशा सा छा रहा है |

गर्द ओढ़े 
खूटियों पर 
टंगे कैलेण्डर नये हैं ,
विदा लेकर 
अनमने से 
कुछ पुराने दिन गये हैं ,
तितलियों के 
पंख फूलों से 
कोई सहला रहा है |

फिर समय की 
सीढियों पर 
हो कबीरा की लुकाठी ,
स्वस्ति वाचन
करें निर्भय
मंदिरों में वेदपाठी ,
फिर
जलोटा के सुरों में
भजन संगम गा रहा है |

जयकृष्ण राय तुषार
संगम इलाहाबाद -चित्र गूगल से साभार 

Saturday, 27 December 2025

मेरे ग़ज़ल संग्रह की समीक्षा -समीक्षक श्री जगदीश बरनवाल कुंद

 

श्री जगदीश बरवाल कुंद समीक्षक और वरिष्ठ साहित्यकार
आज़मगढ़

गीतों और गजलों के क्षेत्र में नये प्रयोगों के लिए जाने जाने वाले प्रयागराज के प्रख्यात कवि श्री जयकृष्ण राय 'तुषार 'ने मेरे पुत्र अवनीश कुमार बरनवाल एडवोकेट,उच्च न्यायालय,प्रयागराज के माध्यम से अपनी सद्यःप्रकाशित कृति" सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है "(गजल संग्रह)मुझे उपलब्ध कराया है।144पृष्ठीय इस गजल संग्रह में प्रेम, राष्ट्रभक्ति,प्रकृति,पर्यावरण,वर्तमान समय में वोट की राजनीति,होली,कुशीनगर,प्रयागराज,वाराणसी,लखनऊ की संस्कृति,माँ का महत्व,जनहित की भावना,आदि विविध विषयों से समन्वित 132गजलें हैं ।पुस्तक का प्रकाशन,राजकमल प्रकाशन समूह के प्रमुख प्रकाशक 'लोक भारती प्रकाशन प्रयागराज 'से हुआ है।सरल,सरस शब्दों में पठनीय एवं रोचक शैली में लिखी गयीं सभी गजलें महत्वपूर्ण हैं ।

सियासत भी इलाहाबाद में
संगम नहाती है


       गजल को परिभाषित करते हुए कवि ने लिखा-

       शोख इठलाती हुई परियों का है ख्वाब गजल।

       झील के पानी में उतरे तो है महताब     गजल।

       कूचा-ए-जानाॅ,भी मजदूर भी,साकी ही नहीं  ।

       एक शायर की ये दौलत यही असबाब  गजल।

यही नहीं,बल्कि गजल को धूप में शामियाना बताते हुए तथा इसे  दर्द,तनहाई,गरीबी से भी,जोडते हुए

उन्होंने लिखा-

       कुछ हकीकत कुछ फसाना है गजल ।

       धूप में इक शामियाना है        गजल। 

       दर्द,तनहाई,गरीबी, मुफलिसी 

       सरफरोशी का  तराना   है     गजल ।

कवि की भावनायें राष्ट्रीयता से ओतप्रोत हैं ।वह कहता है -

      मैं जब भी जन्म लूॅ गंगा तुम्हारी गोद रहे।

      यही तिरंगा,हिमालय ये हरसिंगार    रहे ।

      ये मुल्क ख्वाब से सुन्दर है जन्नतों से बडा।

      यहाँ पे सन्त,सिद्ध और दशावतार   रहे  ।

देश की वर्तमान राजनीति ढपोरशंखी हो गयी है।उनके वादों और जमीनी सच्चाइयों में कोई तालमेल नहीं है।द्रष्टव्य हैं-

     इलेक्शन में हुनर जादूगरी सब देखिये  इनकी  ।

     ये हर भाषण में सडकें  और टूटे पुल बनाते हैं  ।

     हमारे वोट से संसद में नाकाबिल पहुॅचते   हैं,

     जो काबिल हैं गुनाहों से हमारे हार  जाते   हैं   ।

     ये संसद हो गयी बाजार इसके माइने क्या  हैं,

     बिके प्यादों से हम सरकार का बहुमत जुटाते हैं ।

नित्य प्रति वृक्षों के काटे जाने से उत्पन्न पर्यावरणीय संकट पर भी कवि की दृष्टि जाती है-

      ऑधियों से अब दरख्तों को बचाना चाहिए ।

      हमको मीठे फल परिन्दों को ठिकाना चाहिए ।

         ××                 ××

      तरक्की की कुल्हाडों ने हजारो पेड काटे  हैं  ।

      जरूरत को कहाँ कोई नफा नुकसान दिखता है।

संस्कारों से विमुख होते जा रहे समाज को देख कर कवि द्रवित है।वह छल,कपट,लोभ से मुक्त एक सत्समाज की रचना करना चाहता है:

      छल कपट और  लोभ का यदि संवरण हो जाएगा।

      स्वर्ग सा इस देश का वातावरण     हो     जाएगा  ।

      आप पश्चिम के ही दर्शन में अगर  डूबे     रहे,

       वेद,गीता,उपनिषद का  विस्मरण  हो   जाएगा    ।

पुस्तक की प्रत्येक गजल नैतिकता से, नारों  से पूरित है।सभी में प्रेम,मुहब्बत,अपनापन एवं नव निर्माण विषयक कोई न कोई सन्देश छिपा है।इस अच्छे गजल संग्रह के लिए श्री तुषार जी को बहुत बहुत बधाई ।

       श्री जयकृष्ण राय तुषार मूल रूप से जनपद आजमगढ़ के विकास खण्ड ठेकमा के ग्राम पसिका के मूल निवासी हैं ।वह सम्प्रति प्रयाग उच्च न्यायालय में अधिवक्ता,राज्य विधि अधिकारी,उ0प्र0सरकार हैं ।पूर्व में उनके तीन कविता संकलन,सदी को सुन रहा हूँ मैं,कुछ फूलों के कुछ मौसम के तथा मेडों पर बसन्त प्रकाशित हैं ।भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित तथा श्री रवीन्द्र कालिया द्वारा सम्पादित "हिन्दी की बेहतरीन गजलें "एवं साहित्य अकादमी से प्रकाशित एवं श्री माधव कौशिक द्वारा सम्पादित "समकालीन हिन्दी गजल"आदि कई साझा संकलनों में उनकी गजलें प्रकाशित हो चुकी हैं । पत्र पत्रिकाओं में भी  उनकी रचनायें प्रकाशित होती रहती हैं ।उ0प्र0हिन्दी संस्थान एवं अन्य अनेक संगठनों/संस्थाओं द्वारा उन्हें पुरस्कृत,सम्मानित किया गया है ।


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Sunday, 14 December 2025

एक देशगान -कितना सुन्दर कितना प्यारा देश हमारा है

 

लाल किला -चित्र गूगल से साभार 


चित्र साभार गूगल



एक देशगान -कितना सुन्दर, कितना प्यारा 
देश हमारा है 

कितना सुंदर 
कितना प्यारा 
देश हमारा है |
नीलगगन के 
सब तारों में 
यह ध्रुवतारा है |

पर्वत -घाटी 
तीर्थ, सलोना 
इसे बनाते हैं ,
सारे पावन 
ग्रन्थ यहाँ की 
महिमा गाते हैं ,
लोकरंग में 
गीत सुनाता 
यह बंजारा है |

सत्य -अहिंसा 
दया -धर्म का 
इससे नाता है ,
युद्ध थोपने वालों 
को यह 
सबक सिखाता है ,
इसका प्रहरी 
पर्वत है 
सागर की धारा है |

हर मौसम के 
रंग यहाँ 
फूलों की घाटी है ,
अनगिन 
वीर शहीदों की 
यह पावन माटी है ,
सत्यमेव जयते 
इसका 
सदियों से नारा है |

गीतकार-जयकृष्ण राय तुषार
चित्र -गूगल से साभार 

एक ताज़ा गीत -प्रेम गीत लिखने लगा फूलों में इतवार

  चित्र साभार गूगल एक ताज़ा गीत -फूलों में इतवार  गीत, पपीहा  बांसुरी  वासंती श्रृंगार. प्रेमगीत  लिखने लगा  फूलों में इतवार. पीली -नीली  चिट...