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चित्र साभार गूगल |
एक ग़ज़ल -इसी से चाँद मुक़म्मल नज़र नहीं आता
सफ़र में धुंध,ये बादल, कभी शजर आता
इसी से चाँद मुक़म्मल नहीं नज़र आता
बताता हाल मैं दरियाओं के परिंदो का
मुझे भी नाव चलाने का कुछ हुनर आता
शहर में खिड़कियाँ, पर्दे हैं आसमान कहाँ
हमारे गाँव में सूरज सुबह ही घर आता
तमाम रेत है, दरिया न पेड़ का साया
हमारी राह में कैसे कोई बशर आता
मकान रिश्ते भी पुरखों के बाँट डाले गए
खिलौना देख के बच्चा नहीं इधर आता
कवि /शायर
जयकृष्ण राय तुषार
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मुक़म्मल ग़ज़ल
ReplyDeleteआपका हृदय से आभार. सादर अभिवादन
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