Sunday, 29 March 2026

एक गीत -दुनिया को युद्ध से बचाना

 

चित्र साभार गूगल 
युद्ध किसी के लिए अच्छा नहीं होता.आतंक और युद्ध दोनों मानवता के विरुद्ध अपराध हैं.दुनिया को युद्ध में धकेलने वाले महानायक नहीं बन सकते. ईरान और अमरीका दोनों को विश्व शांति की प्रक्रिया का सम्मान करना चाहिए. आतंक और जेहाद फैलाने वाले देशों पर कड़ा प्रतिबंध लगना चाहिए.प्रेम और शांति ही मानवता की रक्षा कर सकते हैं. सृजन और संहार ईश्वर का कार्य है महाकाल के कार्य में मनुष्य को दखल नहीं देना चाहिए. विश्व में शांति ही सबसे सुन्दर विकल्प है.

दुनिया को युद्ध से बचाना 


बेला के 
फूलों से 
केश को सजाना.
ओ अशांति 
दुनिया को 
युद्ध से बचाना.

चिड़ियों के 
पँख बचे 
नदियों में धार रहे,
बारूदी गंध 
मिटे 
दुनिया में प्यार रहे,
ओ वंशीधर 
अपनी 
बॉसुरी बजाना.

राग बचे 
रंग बचे 
पानदान पान रहे,
पूरब से 
पश्चिम तक 
मोहक मुस्कान रहे,
झुकी हुई
नज़रों में 
आग मत सजाना.

इंद्रधनुष 
क्षितिजों पर 
सावन में आएंगे,
झील -ताल 
भींगेंगे 
प्रेम गीत गाएंगे,
मिलने को 
ढूंगेंगे 
लोग फिर बहाना.

दम्भ लिए
चेहरों  पर 
कोमल सा भाव खिले,
हिंसा की 
पगडण्डी को 
फिर से बुद्ध मिले,
धूप के 
कटोरे में 
चाँदनी सजाना.

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 

चित्र साभार गूगल 


Friday, 27 March 2026

एक गीत -होठों पर मधुर हँसी

 

चित्र साभार गूगल 

घाटी में 

घूम लिए 
फूलों को चूम लिए.
कुछ तो है 
मौसम की 
अनकही कहानी में.

बंजर, पर्वत 
पठार, नदियों की 
संध्याएँ,
सबके हैं 
गीत अलग 
और अलग भाषाएँ.
फूल लदी 
नावों संग 
जलपंछी पानी में.

पत्रहीन पेड़ों 
के वन,
बबूल नीड़ों के,
कमरे में 
चित्र टंगे 
चाँद संग चीड़ों के,
मन का 
यायावर है 
चम्बा, कौसानी में.

होठों पर 
मधुर हँसी 
आँखों में स्वप्न सजे,
यादों की 
महफ़िल में 
फिर कहीं सितार बजे,
बचपन फिर 
खो जाए 
परियों की रानी में.

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 
चित्र साभार गूगल 


Wednesday, 25 March 2026

फ़िल्म धुरंधर पर एक गीत

 

धुरंधर 
धुरंधर पर एक गीत 

आदित्य धर का नाम धुरंधर 
देशभक्ति का काम धुरंधर 
मिथक तोड़ती फ़िल्म जगत का 
नव प्रयोग का नाम धुरंधर 

बॉलीवुड खलनायक चुप है 
नायक और महानायक चुप है 
डॉन खान के होंठ सिले हैं 
भाड़, नर्तकी सभी जले हैं 
तुष्टिकरण की लंका धू -धू 
बोल रहा श्रीराम धुरंधर.

राजमौलि ने किया प्रशंसा 
दक्षिण भारत साथ खड़ा 
रजनीकांत सरीखे नायक का 
दिल कितना साफ़, बड़ा है 
विश्व विजय की लिए पताका 
दुश्मन का कोहराम धुरंधर 

गद्दारों के मुँह पर चाँटा 
पाकपरस्तों में सन्नाटा 
सत्तर साल का भांडा फूटा 
सेकुलरिज्म के पाँव में कांटा 
भारत की सेना की ताकत 
का सुन्दर पैगाम धुरंधर.

मोदी और डोभाल की जय हो 
दुश्मन के घर हर दिन भय हो 
हर दिन मरें देश के दुश्मन 
भारत माँ की सदा विजय हो 
दुश्मन के सीने पर चढ़कर 
हर दिन पीना जाम धुरंधर.


धुरंधर का धुरंधर आदित्य धर और 
यामी गौतम 


Saturday, 14 March 2026

पद्मश्री अनूप जलोटा जी मेरा ग़ज़ल संग्रह पढ़ते हुए

 अद्भुत क्षण महान भजन गायक आदरणीय श्री अनूप जलोटा जी मेरी किताब पढ़ते हुए. और प्रसंशा करते हुए आदरणीया श्रीमती दीप्ती चतुर्वेदी जी के प्रति हृदय से कृतज्ञ हूँ जिनकी कृपा मुझ पर रहती है. आप सभी का दिन शुभ हो 

पद्मश्री अनूप जलोटा जी मेरा ग़ज़ल संग्रह 
पढ़ते हुए 


पद्मश्री अनूप जलोटा जी को 
ग़ज़ल संग्रह भेंट 26/03/2026


Thursday, 26 February 2026

एक पुराना होली गीत -आम कुतरते हुए सुए से

   



चित्र -गूगल से साभार 

आप सभी को होली की बधाई एवं शुभकामनाएँ 
एक गीत -होली 

आम कुतरते हुए सुए से 
मैना कहे मुंडेर की |
अबकी होली में ले आना 
भुजिया बीकानेर की |

गोकुल ,वृन्दावन की हो 
या होली हो बरसाने की ,
परदेसी की वही पुरानी
आदत  है तरसाने की ,
उसकी आँखों को भाती है 
कठपुतली आमेर की |

इस होली में हरे पेड़ की 
शाख न कोई टूटे ,
मिलें गले से गले,
पकड़कर हाथ न कोई छूटे ,
हर घर -आंगन महके खुशबू 
गुड़हल और कनेर की |

चौपालों पर ढोल मजीरे 
सुर गूंजे करताल के ,
रुमालों से छूट न पायें 
रंग गुलाबी गाल के ,
फगुआ गाएं या फिर 
बांचेंगे कविता शमशेर की |

कवि जयकृष्ण राय तुषार
[मेरे इस गीत को आदरणीय अरुण आदित्य द्वारा अमर उजाला में प्रकाशित किया गया था मेरे संग्रह में भी है |व्यस्ततावश नया लिखना नहीं हो पा रहा है |

चित्र -गूगल से साभार 

Saturday, 21 February 2026

एक देशगान -भारत की संसद में ऐसे गद्दार कहाँ से आते हैं



भारत माता 



इस देश को शर्मसार करने वालों पर अब निर्णायक कार्रवाई होनी चाहिए चाहे वो नेता हों छात्र हों या किसी पार्टी के बदतमीज़ कार्यकर्ता कोई भी हों. राष्ट्र की गरिमा सर्वोपरि है. कुछ लोग लगातार विदेशों में जाकर भारत माँ की छवि धूमिल कर रहे हैं. अब कठोर क़ानून बनाना होगा.

जय हिन्द, वन्देमातरम 


भारत माता के 

मस्तक पर जो 

हर दिन दाग लगाते हैं.

भारत की 

संसद में 

ऐसे गद्दार कहाँ से आते हैं.


भारत माता है 

पराशक्ति 

इसके त्रिनेत्र को मत खोलो,

सरहद के 

अंदर रहना है तो 

भारत माँ  की जय बोलो,

अब उनको 

दण्डित करना है 

जो दुश्मन राग सुनाते हैं.


गोरी, गजनी 

तैमूरों के 

मत हाथों के हथियार बनो.

आज़ाद, 

विवेकानंद बनो

ओ साथी मत गद्दार बनो,

जो मंत्र 

शकुनियों से लेते 

वो कुरुक्षेत्र बन जाते हैं.


यह धन्यभूमि 

भारत माता 

सौ सौ अपराध क्षमा करती,

यह ज्ञान, दान 

भोजन देकर 

शरणागत की झोली भरती,

इस भारत माता 

के कमल पुष्प 

देवों को रोज रिझाते हैं.

स्वामी विवेकानंद जी 


एक गीत -आसपास फूलों की गंध को सजाएँ

 

चित्र साभार गूगल 

एक गीत -आसपास फूलों की गंध को सजाएँ 

आओ फिर 
फूलों में 
प्रेम गीत गाएँ.
आसपास 
फूलों की 
गंध को सजाएँ.

दरपन पे 
धूल जमी 
मेघों में चाँदनी,
गूंगों के 
घर गिरवीं 
राग और रागिनी,
डाल -डाल 
पेड़ों की 
बांसुरी बजाएँ.

मुँह मीठे 
पान भरे 
काशी क्या बोले,
गंगा की 
गठरी की 
गांठ कौन खोले,
घाटों पर 
बँधी हुई
नाव को सजाएँ.

मन्त्रमुग्ध 
करते हैं 
आँखों में काजल,
खेतोँ को 
प्यास और 
परदेसी बादल,
आओ फिर 
नदियों को 
नींद से जगाएँ.
कवि /गीतकार 
जयकृष्ण राय तुषार 
चित्र साभार गूगल 


Tuesday, 17 February 2026

प्रयागराज एक सांस्कृतिक शहर -लेखक गुंजन अग्रवाल

 प्रयागराज एक सांस्कृतिक शहर -लेखक गुंजन अग्रवाल 

आज यह पुस्तक व्हीलर की दुकान


में दिखी तो मैंने खरीद लिया. इसके कवर पृष्ठ पर फ्लैप के स्थान पर मेरा एक गीत प्रकाशित हैजिसे अनूप जलोटा जी ने विगत वर्ष गाया है. पुस्तक में पौराणिक वर्तमान विभूतियों प्रयागराज के महत्व के साथ पत्र पत्रिकाओं का वर्णन है जो इलाहाबाद से प्रकाशित हैं. यह पुस्तक डायमंड बुक्स द्वारा प्रकाशित की गयी है. बधाई भाई गुंजन अग्रवाल जी और उनकी शानदार लेखनी को. यह पुस्तक साहित्य भंडार के प्रतिष्ठित सम्पादक स्मृति शेष सतीश चंद्र अग्रवाल जी को समर्पित है . पुस्तक पठनीय और संग्रहणीय है.


पुस्तक का नाम -प्रयागराज एक जीवंत सांस्कृतिक नगर 

लेखक -गुंजन अग्रवाल 

प्रकाशक -डायमंड बुक्स,नई दिल्ली 

मूल्य 400









Sunday, 8 February 2026

एक प्रेम गीत लोकभाषा में -प्रेम क रंग

  

चित्र साभार गूगल

एक लोकभाषा गीत-

प्रेम क रंग निराला हउवै


सिर्फ़ एक दिन प्रेम दिवस हौ

बाकी मुँह पर ताला हउवै

ई बाजारू प्रेम दिवस हौ

प्रेम क रंग निराला हउवै


सबसे बड़का प्रेम देश की

सीमा पर कुर्बानी हउवै

प्रेम क सबसे बड़ा समुंदर

वृन्दावन कै पानी हउवै

प्रेम भक्ति कै चरम बिंदु हौ

तुलसी कै चौपाई हउवै

सूरदास,हरिदास,सुदामा

ई तौ मीराबाई हउवै

प्रेम क मन हौ गंगा जइसन

प्रेम क देह शिवाला हउवै


प्रेम मतारी कै दुलार हौ

बाबू कै अनुशासन हउवै

ई भौजी कै हँसी-ठिठोली

गुरु क शिक्षा,भाषन हउवै

बेटी कै सौभाग्य प्रेम हौ

बहिन क रक्षाबन्धन हउवै

सप्तपदी कै कसम प्रेम हौ

हल्दी,सेन्हुर,चन्दन हउवै

आज प्रेम में रंग कहाँ हौ

एकर बस मुँह काला हउवै


प्रेम न माटी कै रंग देखै

प्रेम नदी कै धारा हउवै

ई पर्वत घाटी फूलन कै

खुशबू कै फ़व्वारा हउवै

जइसे सजै होंठ पर वंशी

वइसे अनहद नाद प्रेम हौ

एके ढूँढा नहीं देह में

मन से ही संवाद प्रेम हौ

प्रेम न राजा -रंक में ढूंढा

ई गोकुल कै ग्वाला हउवै

कवि -जयकृष्ण राय तुषार 


चित्र साभार गूगल
चित्र साभार गूगल


Tuesday, 3 February 2026

एक गीत -ट्रैफिक यातायात के लिए

 

चित्र साभार गूगल

सड़कें अच्छी अच्छा मौसम

सड़कें अच्छी 
अच्छा मौसम 
अच्छी मोटरकार.
यातायात 
नियम का पालन 
कर लो मेरे यार.

दाएं देखो 
बाएं देखो 
देखो सिग्नल बत्ती,
पटना, काशी 
दिल्ली, दमदम 
या गोवा, कवरत्ती,
मोबाइल से 
बात न करना 
रखना कम रफ़्तार.

सीट बेल्ट हो बँधी 
जाम का कारण 
कभी न बनना,
एम्बुलेंस को 
रस्ता देना 
हूटर उसका सुनना,
घायल कोई 
मिले सड़क पर 
करवाना उपचार.

दोपहिया वाहन 
वालों की 
हेलमेट करे सुरक्षा,
हर राही के 
घर आने की 
होती रोज प्रतीक्षा,
वर्किंग डे हो 
उत्सव हो 
या हो कोई इतवार.

कवि /गीतकार 
जयकृष्ण राय तुषार 
चित्र साभार गूगल

चित्र साभार गूगल


Thursday, 29 January 2026

एक ताज़ा गीत -बांसुरी वाले अधर

 

चित्र साभार गूगल

एक ताज़ा गीत -कहाँ हैं वो खिलखिलाते गाँव 


कहाँ हैं 
वो खिलखिलाते 
गाँव वो हँसते शहर.
कहाँ हैं 
वो डाकिए 
लाते हुए अच्छी ख़बर.

रंग फागुन के 
हुए मैले 
न टेसू खिल रहे,
मोड़ पर 
तन्हा मुसाफिर 
पर कहाँ हम मिल रहे,
मौसमों की 
आँख पीली 
हो गयी धुंधली नज़र.

फूल बासी 
चढ़ रहे हैं 
देवता के माथ पर,
नहीं मेहंदी 
हलद के रंग 
चाँदनी के हाथ पर,
मिल रहे हैं 
खुशबुओं के
संग हवाओं में ज़हर.

नदी वन के 
पास कैसा 
मौन है वातावरण,
गीत बासी हैं 
किताबों में
सुभग बस आवरण,
बहुत दिन
हो गए देखे
बांसुरी वाले अधर.

कवि/गीतकार जयकृष्ण राय तुषार
चित्र साभार गूगल


Wednesday, 28 January 2026

एक गीत -भारत माँ के पुण्य धाम की

 

प्रभु श्रीराम की खड़ाऊ



एक गीत -याद करो फिर क़सम राम की

सबका साथ 
विकास सभी का 
याद करो फिर क़सम राम की.
सही राह पर 
लौटो भाई 
नहीं लड़ाई किसी काम की.

अगड़ा, पिछड़ा 
दलित छोड़ दो 
दुश्मन का षड्यंत्र तोड़ दो,
अभी सनातन की 
जय बोलो 
हर आँधी की दिशा मोड़ दो.
संतो बनो 
संत के जैसा 
महिमा घटे न चार धाम की.

सिंहासन है 
राम खड़ाऊ 
भरत, लाल सा चरित बनाओ,
राजधर्म है 
कठिन तपस्या 
मातृभूमि की महिमा गाओ,
अब भी 
सुनो अयोध्या जाकर 
सरयू कहती कथा राम की.

तुलसी को 
रैदास को समझो 
समझो दास कबीरा को,
राजमहल को 
मिट्टी समझो 
पढ़लो भाई मीरा को,
गौरव गाथा
लिखो सुनहरी
भारत माँ के पुण्य धाम की.

काशी में
गंगा के तट पर
डिम-डिम-डिम डमरू बाजे,
मुरली की
धुन यमुना तीरे
वृंदावन में भक्ति विराजे,
नदी, नर्मदा
कावेरी में
सजी रहे आरती शाम की.
प्रभु श्रीराम वनवास में


माँ नर्मदा आरती



Sunday, 25 January 2026

एक देशगान -संविधान का गर्व तिरंगा

 

चित्र साभार गूगल तिरंगा


एक देशगान.

संविधान का गर्व तिरंगा 


संविधान का गर्व तिरंगा 

भारत का अभिमान है.

एक -एक धागे में इसके 

वीरों का बलिदान है.


शस्य श्यामला धरती 

इसकी मिट्टी प्यारी है,

विविध रंग के फूलों की 

यह अनुपम क्यारी है,

मानस की चौपाई सुन्दर

सामवेद का गान है.


सब तीर्थ यहाँ पर मिलते हैं 

इसमें गंगा का पानी है,

ऋषियों, मुनियों का तप इसमें 

यह मिट्टी ही वरदानी है,

सरहद के रक्षक सैनिक हैं

अन्नदाता यहाँ किसान है.


बहु संस्कृतियों का संगम यह 

इसका हर रंग रिझाता है,

यहाँ लोकरंग का जादू है 

हर मौसम गीत सुनाता है,

इसकी महिमा लिखना मुश्किल 

यह भारत भूमि महान है.


चंदन वन, केसर के संग संग

यह महाकाल की ज्वाला है

यह सती, रुक्मिणी, सीता है

यह गार्गी और आपाला है,

यह शास्वत और सनातन है

यह ईश्वर का वरदान है.

नेताजी सुभाष चंद्र बोस


गीत कवि 

जयकृष्ण राय तुषार

Saturday, 24 January 2026

एक गीत -फूलों में गंध नहीं

 

चित्र साभार गूगल

एक नवगीत -जेब कटी फागुन की 

जेब फटी 

फागुन की 

झर गए ग़ुलाल.

फूलों में 

गंध नहीं 

मौसम कंगाल.


चैता के 

गीत कहाँ 

शहरों के हिस्से,

वक़्त की 

किताबों में 

टेसू के किस्से,

स्मृतियों में

मृदंग

बजते करताल.


रफू किए

चुनरी में

वासंती खेत में,

हिरण

झुण्ड प्यासा है

नदियों की रेत में

मौसम की

आँखों में

टूटा है बाल.


चित्र साभार गूगल


Thursday, 22 January 2026

एक ताज़ा गीत -प्रेम गीत लिखने लगा फूलों में इतवार

 

चित्र साभार गूगल

एक ताज़ा गीत -फूलों में इतवार 


गीत, पपीहा 

बांसुरी 

वासंती श्रृंगार.

प्रेमगीत 

लिखने लगा 

फूलों में इतवार.


पीली -नीली 

चिट्ठियां 

वन में पढ़े पलाश,

नदी किनारे 

खाट पर 

मौसम खेले ताश,

सुबह 

हवा में उड़ रहे 

मेजों से अख़बार.


तन्हा बैठे 

फूल को 

फिर तितली की याद,

मौन मुखर 

करने लगा 

आँखों से संवाद,

रंगमंच पर

प्रकृति के

बदल गए किरदार.


पीली सरसों 

देखकर 

प्रमुदित हुए किसान,

गलियाँ

होरी गा रहीं

खाकर मगही पान.

सारंगी 

शहनाइयां 

बजने लगे सितार.


कवि /गीतकार

जयकृष्ण राय तुषार

चित्र साभार गूगल


Tuesday, 20 January 2026

मेरी किताब पर समीक्षा. श्री श्रीप्रकाश मिश्र जी

 

प्रसिद्ध लेखक/कवि/समीक्षक श्री श्रीप्रकाश मिश्र जी
समीक्षक श्री श्रीप्रकाश मिश्र कवि कथाकर और सुप्रसिद्ध आलोचक हैं. उन्नयन पत्रिका में सम्पादक भी रहे हैं. आभार मिश्र जी का.

उर्दू ग़ज़ल है इश्क, मोहब्बत, महल में है 

जीवन का लोकरंग तो हिंदी ग़ज़ल में है।


जयकृष्ण राय ' तुषार ' जब ऐसा लिखते हैं तब साफ जाहिर होता है कि वे हिंदी और उर्दू ग़ज़ल की परंपरा को जानते हैं और उनके फर्क को भी जानते हैं। चूकि वे ग़ज़ल हिंदी की लिख रहे हैं तो उसकी परंपरा को तो वे स्वयं निभा ही रहे होंगे और पाठक को उसको ध्यान में रखकर उसे पढ़ना या सुनना चाहिए। तब हम पाते हैं कि भारतीय जीवन के लोकरंग में जो परिवर्तन तेजी से आ रहा है उसे वे छोटी -  छोटी बातों के सहारे दर्ज करते हैं। परिवर्तन के दो रंग होते हैं --शुभ और अशुभ। जो सदियों से आजमाए जीवन -मूल्यों को समृद्ध करता है, वह वरेण्य होता है, जो उसे छीजाता है, उससे किनारा करने की जरूरत होती है। इसी तरह ऐतिहासिक जीवन -प्रवाह में जो कल्मष बहता चला आया है, उसे न केवल उजागर करने की, उस पर प्रहार करने की भी जरूरत पड़ती है और उसका स्थानापन्न लखे जाने की भी जरूरत पडती है।इन चारों बातों को ध्यान में रख कर जब हम तुषार की ग़ज़लों को पढ़ते हैं तो पाते हैं कि वे अपनी बात हमारी आंखों की जद में आने वाली रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से करते हैं। इससे उनकी जीवन की समृद्धि पर सूक्ष्मता से देखने की सामर्थ्य का भान तो होता है, उनकी चिंता का क्षितिज क्या है, यह भी गोचर हो जाता है। वे आज की स्त्री की साज - सज्जा के बारे में ही बात नहीं करते, उसकी सोच की भी बात करते हैं। वे सिर्फ दलित के शोषण की ही बात नहीं करते, हर बात में अपना ही हिस्सा खोजने की मानसिकता की भी बात करते हैं। जन के पक्ष में खड़े होने वाले लोगों के कलाप की विसंगतियों की ही बात नहीं करते, उनके निजी स्वार्थों की टकराहट की बात करते हैं जो संघर्ष में एका पैदा होने नहीं देती। लिखते हैं:--


सबने केवल धोखे बांटे सबने की गद्दारी जी

अबकी अपना वोट कहां पर देंगे आप तिवारी जी


जयकृष्ण आजमगढ़ के हैं ऐसे सरहदी इलाके के कि कब आजमगढ़ के हैं कब जौनपुर के, पता ही नहीं चलता। पर इसके नाते दलबदलू नहीं है, जीवन की वाचालता का पता चलता है। पढ़े हैं, बनारस में,वकालत करते हैं इलाहाबाद में। बनारस की आबोहवा में अलमस्ती अधिक है, इलाहाबाद में उसकी कसौटी थोड़ा आभिजात्य है। बनारस शहरनुमा गांव है, इलाहाबाद गांवनुमा शहर। बनारस में व्यवहार का लद्दडपन और संवेदना का खाटीपन। इलाहाबाद में रगड़ से उपजा नफासत है और विचारों का खुलापन। इलाहाबाद जो देता है वह पीढ़ियों से बसे स्थानीय लोगों के माध्यम से नहीं देता, नये आये लोगों के माध्यम से देता है। पर तभी जब वे इलाहाबाद के अखाड़े में रगड़ जाते हैं। यही कारण है कि आज बाहर से आए तमाम अकादमिक और प्रतिभासंपन्न लोग कुछ विशेष नहीं दे पा रहे हैं, क्योंकि इस रगड़ाई से भागे हुए हैं। पर तुषार दे पा रहे हैं , क्योंकि अपनी अनुकूलित निजी दुनिया से बाहर आ कर जनजीवन में भागीदार बन कर लिख रहे हैं। तभी वे देख पा रहे हैं कि


गले में क्रास पहने हैं  मगर चंदन लगाती है 

सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है


या फिर 


आसमानों के क ई रंग हैं सूरज हम तो 

एक ही रंग में पश्चिम की दिशा ढलते हैं 


इस संकलन को देखते हुए उम्मीद बनती है कि वे इलाहाबाद के साहित्यिक माहौल में जबरदस्त हस्तक्षेप तो करेंगे ही,उनका अवदान देश के स्तर पर पसरेगा। बाकी बातें संग्रह पढ़ कर तय करें।



Sunday, 18 January 2026

एक पुराना गीत -यह वसंत

 

चित्र साभार गूगल




एक गीत -यह वसंत भी प्रिये !
 तुम्हारे होठों का अनुवाद है 

तुमसे ही 
कविता में लय है 
जीवन में संवाद है |
यह वसंत भी 
प्रिये ! तुम्हारे 
होठों का अनुवाद है |

तुम फूलों के 
रंग ,खुशबुओं में 
कवियों के स्वप्नलोक में ,
लोककथाओं 
जनश्रुतियों में 
प्रेमग्रंथ में कठिन श्लोक में ,
जलतरंग पर 
खिले कमल सी 
भ्रमरों का अनुनाद है |

तुम्हें परखने 
और निरखने में 
सूखी कलमों की स्याही ,
कालिदास ने 
लिखा अनुपमा 
हम तो एक अकिंचन राही
तेरा हँसना 
और रूठना 
प्रियतम का आह्लाद है |
चित्र -गूगल से साभार 

एक गीत -दुनिया को युद्ध से बचाना

  चित्र साभार गूगल  युद्ध किसी के लिए अच्छा नहीं होता.आतंक और युद्ध दोनों मानवता के विरुद्ध अपराध हैं.दुनिया को युद्ध में धकेलने वाले महानाय...