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| चित्र साभार गूगल |
दुनिया को युद्ध से बचाना
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
दुनिया को युद्ध से बचाना
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| चित्र साभार गूगल |
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घाटी में
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| चित्र साभार गूगल |
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| धुरंधर |
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| धुरंधर का धुरंधर आदित्य धर और यामी गौतम |
अद्भुत क्षण महान भजन गायक आदरणीय श्री अनूप जलोटा जी मेरी किताब पढ़ते हुए. और प्रसंशा करते हुए आदरणीया श्रीमती दीप्ती चतुर्वेदी जी के प्रति हृदय से कृतज्ञ हूँ जिनकी कृपा मुझ पर रहती है. आप सभी का दिन शुभ हो
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| पद्मश्री अनूप जलोटा जी मेरा ग़ज़ल संग्रह पढ़ते हुए |
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| पद्मश्री अनूप जलोटा जी को ग़ज़ल संग्रह भेंट 26/03/2026 |
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| चित्र -गूगल से साभार |
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| चित्र -गूगल से साभार |
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| भारत माता |
इस देश को शर्मसार करने वालों पर अब निर्णायक कार्रवाई होनी चाहिए चाहे वो नेता हों छात्र हों या किसी पार्टी के बदतमीज़ कार्यकर्ता कोई भी हों. राष्ट्र की गरिमा सर्वोपरि है. कुछ लोग लगातार विदेशों में जाकर भारत माँ की छवि धूमिल कर रहे हैं. अब कठोर क़ानून बनाना होगा.
जय हिन्द, वन्देमातरम
भारत माता के
मस्तक पर जो
हर दिन दाग लगाते हैं.
भारत की
संसद में
ऐसे गद्दार कहाँ से आते हैं.
भारत माता है
पराशक्ति
इसके त्रिनेत्र को मत खोलो,
सरहद के
अंदर रहना है तो
भारत माँ की जय बोलो,
अब उनको
दण्डित करना है
जो दुश्मन राग सुनाते हैं.
गोरी, गजनी
तैमूरों के
मत हाथों के हथियार बनो.
आज़ाद,
विवेकानंद बनो
ओ साथी मत गद्दार बनो,
जो मंत्र
शकुनियों से लेते
वो कुरुक्षेत्र बन जाते हैं.
यह धन्यभूमि
भारत माता
सौ सौ अपराध क्षमा करती,
यह ज्ञान, दान
भोजन देकर
शरणागत की झोली भरती,
इस भारत माता
के कमल पुष्प
देवों को रोज रिझाते हैं.
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| स्वामी विवेकानंद जी |
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| चित्र साभार गूगल |
एक गीत -आसपास फूलों की गंध को सजाएँ
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| चित्र साभार गूगल |
प्रयागराज एक सांस्कृतिक शहर -लेखक गुंजन अग्रवाल
आज यह पुस्तक व्हीलर की दुकान
पुस्तक का नाम -प्रयागराज एक जीवंत सांस्कृतिक नगर
लेखक -गुंजन अग्रवाल
प्रकाशक -डायमंड बुक्स,नई दिल्ली
मूल्य 400
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| चित्र साभार गूगल |
एक लोकभाषा गीत-
प्रेम क रंग निराला हउवै
सिर्फ़ एक दिन प्रेम दिवस हौ
बाकी मुँह पर ताला हउवै
ई बाजारू प्रेम दिवस हौ
प्रेम क रंग निराला हउवै
सबसे बड़का प्रेम देश की
सीमा पर कुर्बानी हउवै
प्रेम क सबसे बड़ा समुंदर
वृन्दावन कै पानी हउवै
प्रेम भक्ति कै चरम बिंदु हौ
तुलसी कै चौपाई हउवै
सूरदास,हरिदास,सुदामा
ई तौ मीराबाई हउवै
प्रेम क मन हौ गंगा जइसन
प्रेम क देह शिवाला हउवै
प्रेम मतारी कै दुलार हौ
बाबू कै अनुशासन हउवै
ई भौजी कै हँसी-ठिठोली
गुरु क शिक्षा,भाषन हउवै
बेटी कै सौभाग्य प्रेम हौ
बहिन क रक्षाबन्धन हउवै
सप्तपदी कै कसम प्रेम हौ
हल्दी,सेन्हुर,चन्दन हउवै
आज प्रेम में रंग कहाँ हौ
एकर बस मुँह काला हउवै
प्रेम न माटी कै रंग देखै
प्रेम नदी कै धारा हउवै
ई पर्वत घाटी फूलन कै
खुशबू कै फ़व्वारा हउवै
जइसे सजै होंठ पर वंशी
वइसे अनहद नाद प्रेम हौ
एके ढूँढा नहीं देह में
मन से ही संवाद प्रेम हौ
प्रेम न राजा -रंक में ढूंढा
ई गोकुल कै ग्वाला हउवै
कवि -जयकृष्ण राय तुषार
| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
सड़कें अच्छी अच्छा मौसम
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
एक ताज़ा गीत -कहाँ हैं वो खिलखिलाते गाँव
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| चित्र साभार गूगल |
एक गीत -याद करो फिर क़सम राम की
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| प्रभु श्रीराम वनवास में |
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| चित्र साभार गूगल तिरंगा |
एक देशगान.
संविधान का गर्व तिरंगा
संविधान का गर्व तिरंगा
भारत का अभिमान है.
एक -एक धागे में इसके
वीरों का बलिदान है.
शस्य श्यामला धरती
इसकी मिट्टी प्यारी है,
विविध रंग के फूलों की
यह अनुपम क्यारी है,
मानस की चौपाई सुन्दर
सामवेद का गान है.
सब तीर्थ यहाँ पर मिलते हैं
इसमें गंगा का पानी है,
ऋषियों, मुनियों का तप इसमें
यह मिट्टी ही वरदानी है,
सरहद के रक्षक सैनिक हैं
अन्नदाता यहाँ किसान है.
बहु संस्कृतियों का संगम यह
इसका हर रंग रिझाता है,
यहाँ लोकरंग का जादू है
हर मौसम गीत सुनाता है,
इसकी महिमा लिखना मुश्किल
यह भारत भूमि महान है.
चंदन वन, केसर के संग संग
यह महाकाल की ज्वाला है
यह सती, रुक्मिणी, सीता है
यह गार्गी और आपाला है,
यह शास्वत और सनातन है
यह ईश्वर का वरदान है.
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| नेताजी सुभाष चंद्र बोस |
गीत कवि
जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
एक नवगीत -जेब कटी फागुन की
जेब फटी
फागुन की
झर गए ग़ुलाल.
फूलों में
गंध नहीं
मौसम कंगाल.
चैता के
गीत कहाँ
शहरों के हिस्से,
वक़्त की
किताबों में
टेसू के किस्से,
स्मृतियों में
मृदंग
बजते करताल.
रफू किए
चुनरी में
वासंती खेत में,
हिरण
झुण्ड प्यासा है
नदियों की रेत में
मौसम की
आँखों में
टूटा है बाल.
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| चित्र साभार गूगल |
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| चित्र साभार गूगल |
एक ताज़ा गीत -फूलों में इतवार
गीत, पपीहा
बांसुरी
वासंती श्रृंगार.
प्रेमगीत
लिखने लगा
फूलों में इतवार.
पीली -नीली
चिट्ठियां
वन में पढ़े पलाश,
नदी किनारे
खाट पर
मौसम खेले ताश,
सुबह
हवा में उड़ रहे
मेजों से अख़बार.
तन्हा बैठे
फूल को
फिर तितली की याद,
मौन मुखर
करने लगा
आँखों से संवाद,
रंगमंच पर
प्रकृति के
बदल गए किरदार.
पीली सरसों
देखकर
प्रमुदित हुए किसान,
गलियाँ
होरी गा रहीं
खाकर मगही पान.
सारंगी
शहनाइयां
बजने लगे सितार.
कवि /गीतकार
जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |
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| प्रसिद्ध लेखक/कवि/समीक्षक श्री श्रीप्रकाश मिश्र जी |
उर्दू ग़ज़ल है इश्क, मोहब्बत, महल में है
जीवन का लोकरंग तो हिंदी ग़ज़ल में है।
जयकृष्ण राय ' तुषार ' जब ऐसा लिखते हैं तब साफ जाहिर होता है कि वे हिंदी और उर्दू ग़ज़ल की परंपरा को जानते हैं और उनके फर्क को भी जानते हैं। चूकि वे ग़ज़ल हिंदी की लिख रहे हैं तो उसकी परंपरा को तो वे स्वयं निभा ही रहे होंगे और पाठक को उसको ध्यान में रखकर उसे पढ़ना या सुनना चाहिए। तब हम पाते हैं कि भारतीय जीवन के लोकरंग में जो परिवर्तन तेजी से आ रहा है उसे वे छोटी - छोटी बातों के सहारे दर्ज करते हैं। परिवर्तन के दो रंग होते हैं --शुभ और अशुभ। जो सदियों से आजमाए जीवन -मूल्यों को समृद्ध करता है, वह वरेण्य होता है, जो उसे छीजाता है, उससे किनारा करने की जरूरत होती है। इसी तरह ऐतिहासिक जीवन -प्रवाह में जो कल्मष बहता चला आया है, उसे न केवल उजागर करने की, उस पर प्रहार करने की भी जरूरत पड़ती है और उसका स्थानापन्न लखे जाने की भी जरूरत पडती है।इन चारों बातों को ध्यान में रख कर जब हम तुषार की ग़ज़लों को पढ़ते हैं तो पाते हैं कि वे अपनी बात हमारी आंखों की जद में आने वाली रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से करते हैं। इससे उनकी जीवन की समृद्धि पर सूक्ष्मता से देखने की सामर्थ्य का भान तो होता है, उनकी चिंता का क्षितिज क्या है, यह भी गोचर हो जाता है। वे आज की स्त्री की साज - सज्जा के बारे में ही बात नहीं करते, उसकी सोच की भी बात करते हैं। वे सिर्फ दलित के शोषण की ही बात नहीं करते, हर बात में अपना ही हिस्सा खोजने की मानसिकता की भी बात करते हैं। जन के पक्ष में खड़े होने वाले लोगों के कलाप की विसंगतियों की ही बात नहीं करते, उनके निजी स्वार्थों की टकराहट की बात करते हैं जो संघर्ष में एका पैदा होने नहीं देती। लिखते हैं:--
सबने केवल धोखे बांटे सबने की गद्दारी जी
अबकी अपना वोट कहां पर देंगे आप तिवारी जी
जयकृष्ण आजमगढ़ के हैं ऐसे सरहदी इलाके के कि कब आजमगढ़ के हैं कब जौनपुर के, पता ही नहीं चलता। पर इसके नाते दलबदलू नहीं है, जीवन की वाचालता का पता चलता है। पढ़े हैं, बनारस में,वकालत करते हैं इलाहाबाद में। बनारस की आबोहवा में अलमस्ती अधिक है, इलाहाबाद में उसकी कसौटी थोड़ा आभिजात्य है। बनारस शहरनुमा गांव है, इलाहाबाद गांवनुमा शहर। बनारस में व्यवहार का लद्दडपन और संवेदना का खाटीपन। इलाहाबाद में रगड़ से उपजा नफासत है और विचारों का खुलापन। इलाहाबाद जो देता है वह पीढ़ियों से बसे स्थानीय लोगों के माध्यम से नहीं देता, नये आये लोगों के माध्यम से देता है। पर तभी जब वे इलाहाबाद के अखाड़े में रगड़ जाते हैं। यही कारण है कि आज बाहर से आए तमाम अकादमिक और प्रतिभासंपन्न लोग कुछ विशेष नहीं दे पा रहे हैं, क्योंकि इस रगड़ाई से भागे हुए हैं। पर तुषार दे पा रहे हैं , क्योंकि अपनी अनुकूलित निजी दुनिया से बाहर आ कर जनजीवन में भागीदार बन कर लिख रहे हैं। तभी वे देख पा रहे हैं कि
गले में क्रास पहने हैं मगर चंदन लगाती है
सियासत भी इलाहाबाद में संगम नहाती है
या फिर
आसमानों के क ई रंग हैं सूरज हम तो
एक ही रंग में पश्चिम की दिशा ढलते हैं
इस संकलन को देखते हुए उम्मीद बनती है कि वे इलाहाबाद के साहित्यिक माहौल में जबरदस्त हस्तक्षेप तो करेंगे ही,उनका अवदान देश के स्तर पर पसरेगा। बाकी बातें संग्रह पढ़ कर तय करें।
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| चित्र साभार गूगल |
चित्र साभार गूगल युद्ध किसी के लिए अच्छा नहीं होता.आतंक और युद्ध दोनों मानवता के विरुद्ध अपराध हैं.दुनिया को युद्ध में धकेलने वाले महानाय...