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| चित्र साभार गूगल |
एक गीत -आसपास फूलों की गंध को सजाएँ
आओ फिर
फूलों में
प्रेम गीत गाएँ.
आसपास
फूलों की
गंध को सजाएँ.
दरपन पे
धूल जमी
मेघों में चाँदनी,
गूंगों के
घर गिरवीं
राग और रागिनी,
डाल -डाल
पेड़ों की
बांसुरी बजाएँ.
मुँह मीठे
पान भरे
काशी क्या बोले,
गंगा की
गठरी की
गांठ कौन खोले,
घाटों पर
बँधी हुई
नाव को सजाएँ.
मन्त्रमुग्ध
करते हैं
आँखों में काजल,
खेतोँ को
प्यास और
परदेसी बादल,
आओ फिर
नदियों को
नींद से जगाएँ.
कवि /गीतकार
जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |


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