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| चित्र साभार गूगल |
घाटी में
घूम लिए
फूलों को चूम लिए.
कुछ तो है
मौसम की
अनकही कहानी में.
बंजर, पर्वत
पठार, नदियों की
संध्याएँ,
सबके हैं गीत अलग
और अलग भाषाएँ.
फूल लदी
नावों संग
जलपंछी पानी में.
पत्रहीन पेड़ों
के वन,
बबूल नीड़ों के,
कमरे में
चित्र टंगे
चाँद संग चीड़ों के,
मन का
यायावर है
चम्बा, कौसानी में.
होठों पर
मधुर हँसी
आँखों में स्वप्न सजे,
यादों की
महफ़िल में
फिर कहीं सितार बजे,
बचपन फिर
खो जाए
परियों की रानी में.
कवि -जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |


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