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| चित्र साभार गूगल |
साँवला सा
हो गया है
चाँदनी का रूप.
फूल -पत्तों में
खड़ी है
शाल ओढ़े धूप.
घने कोहरे
में नदी तट,
नाव सोई है,
साफ़ मौसम
की कहीं
तसवीर खोई है,
बन्द घर
पीने लगे हैं
चाय, कॉफी, सूप.
नई दिल्ली में
किताबों की
नुमाइश है,
विश्व भाषा
बने हिन्दी
यही ख़्वाहिश है,
हर विधा में
सजे सुन्दर
ज्ञान का स्तूप.
कुछ दिनों के
बाद
पीले फूल महकेंगे,
खुशबुओं का
ख़त लिए
फिर भ्रमर बहकेंगे,
फिर यही
मौसम लगेगा
इस धरा का भूप.
कवि -जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |


शाल ओढ़े धूप का बड़ा सुंदर रूप शब्दों में चित्रित हुआ है
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ReplyDeleteआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 14 जनवरी 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
अथ स्वागतम शुभ स्वागतम।
शाल ओढ़े धूप - सुंदर बिम्ब
ReplyDeleteWahh