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| चित्र साभार गूगल |
दुनिया को युद्ध से बचाना
बेला के
फूलों से
केश को सजाना.
ओ अशांति
दुनिया को
युद्ध से बचाना.
चिड़ियों के
पँख बचे
नदियों में धार रहे,
बारूदी गंध
मिटे
दुनिया में प्यार रहे,
ओ वंशीधर
अपनी
बॉसुरी बजाना.
राग बचे
रंग बचे
पानदान पान रहे,
पूरब से
पश्चिम तक
मोहक मुस्कान रहे,
झुकी हुई
नज़रों में
आग मत सजाना.
इंद्रधनुष
क्षितिजों पर
सावन में आएंगे,
झील -ताल
भींगेंगे
प्रेम गीत गाएंगे,
मिलने को
ढूंगेंगे
लोग फिर बहाना.
दम्भ लिए
चेहरों पर
कोमल सा भाव खिले,
हिंसा की
पगडण्डी को
फिर से बुद्ध मिले,
धूप के
कटोरे में
चाँदनी सजाना.
कवि -जयकृष्ण राय तुषार
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| चित्र साभार गूगल |


मैं आपके भावों से पूर्ण सहमति व्यक्त करता हूँ आदरणीय तुषार जी
ReplyDeleteआभारी हूँ आदरणीय
Deleteआपने युद्ध की सच्चाई और शांति की जरूरत बहुत साफ तरीके से रखी है। मुझे खास तौर पर वो पंक्तियाँ पसंद आईं जहाँ आपने चिड़ियों, नदियों और रंगों की बात की, क्योंकि वही असली जिंदगी है। मैं मानता हूँ कि नफरत सिर्फ विनाश लाती है और प्रेम ही दुनिया को बचा सकता है।
ReplyDeleteआभार आपका
Deleteआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 30 मार्च, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
ReplyDeleteआपका हृदय से आभार. सादर अभिवादन
Deleteसुंदर
ReplyDeleteहार्दिक आभार आपका
Deleteयुद्ध की विभीषिका से बचें और गीतों, फूलों, चिड़ियों के संग जीवन बहे, सुंदर गीत!
ReplyDeleteआपका हार्दिक आभार. नमस्ते
Deleteधूप के
ReplyDeleteकटोरे में
चाँदनी सजाना.
Wahhh
हार्दिक आभार भाई साहब. सादर अभिवादन
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