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| चित्र साभार गूगल |
एक गीत -जिस मिट्टी में खिलते हैं
जिस पावन मिट्टी में खिलते
ये फूल उसे महकाते हैं.
हम भारत माँ के बच्चे हैं
भारत के गीत सुनाते हैं.
ब्रह्म कमल जिसमें खिलते हैं
गंगा जिसमें बहती है,
भक्ति भाव से सरयू जिसमें
रामकथा को कहती है,
राधा जी के संग स्याम जहाँ
निधि वन में रास रचाते हैं.
इस मिट्टी का रंग सलोना
मौसम यहाँ बदलते हैं,
लोकरंग के साथ विविधता
साथ लिए हम चलते हैं,
हम आज़ादी का महापर्व
उत्सव की तरह मनाते हैं.
विंध्य, नीलगिरि और हिमांचल
खुलकर इसमें हँसते हैं,
इस नंदन कानन में जाने
कितने पंछी बसते हैं,
मोर नाचते, हिरन खेलते
झरने गीत सुनाते हैं.
भारत माँ की छवि को आओ
फिर से सोने में मढ़ते हैं,
जो भी अनगढ़ पत्थर बाकी
आओ उनको फिर गढ़ते हैं,
हम अहं तोड़ते असुरों का
लंका भी हमीं जलाते हैं
लंका हमीं जलाते हैं
कवि /गीतकार
जयकृष्ण राय तुषार
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| भारत माता चित्र साभार गूगल |


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